भगत सिंह की शहादत पर बाबा साहब अम्बेडकर का संपादकीय
इंग्लैंड के कंज़र्वेटिव नेताओं का क्रोध मोल न लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दी गई।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फाँसी क्यों दी, इसकी व्याख्या करते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 13 अप्रैल 1931 को अपने समाचार पत्र ‘जनता’ में ‘तीन बली' शीर्षक से एक संपादकीय लिखा था। हम वह संपादकीय यहाँ पुनः प्रकाशित कर रहे हैं।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंततः फाँसी दे दी गई। उन पर सॉन्डर्स नामक एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी और चमन सिंह नामक एक सिख पुलिस सिपाही की हत्या का आरोप था। इसके अलावा तीन-चार अन्य आरोप भी थे, जैसे बनारस में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या का प्रयास, असेंबली में बम फेंकना, मौलिमिया गांव में एक घर में डकैती डालना और वहां का कीमती सामान लूटना।
भगत सिंह असेंबली में बम फेंकने का आरोप पहले ही स्वीकार कर चुके थे। इस अपराध के लिए उन्हें और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सज़ा भी सुनाई जा चुकी थी। भगत सिंह के साथियों में से एक जयगोपाल ने स्वीकार किया था कि उसने और भगत सिंह सहित अन्य क्रांतिकारियों ने सॉन्डर्स की हत्या की थी। इसी बयान के आधार पर सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों के विरुद्ध मुकदमा दायर किया था।
हालांकि, तीनों अभियुक्तों में से कोई भी मुकदमे की सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ। उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों का एक विशेष न्यायाधिकरण गठित किया गया। उसने मामले की सुनवाई की और सर्वसम्मति से तीनों को फाँसी की सजा सुनाया गया।
भगत सिंह के पिता ने वायसराय के यहाँ दरख्वास्त भी की और अनुरोध किया था कि फाँसी न दिया जाए और आवश्यकता हो तो उसे अंडमान में आजीवन कारावास में बदल दिया जाए। प्रमुख नेताओं सहित अनेक लोगों ने भी इस मामले में सरकार से अपील करने की कोशिश की। संभव है कि गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच हुई बातचीत में भगत सिंह के फाँसी का मुद्दा उठा हो।
हालाँकि लॉर्ड इरविन ने भगत सिंह की जान बचाने का कोई निश्चित आश्वासन नहीं दिया था, लेकिन इस बीच गांधी के भाषण से यह आशा जगी थी कि इरविन इन तीन युवकों की जान बचाने के लिए अपने अधिकार में जो कुछ संभव होगा, वह करेंगे। लेकिन ये सारी आशाएं, अनुमान और अपीलें निष्फल साबित हुईं। 23 मार्च 1931 को शाम सात बजे लाहौर के सेंट्रल जेल में उन्हें फाँसी देकर मार दिया गया। उनमें से किसी ने भी अपनी जान बख्शने की अपील नहीं की थी।
लेकिन, जैसा कि पहले ही प्रकाशित हो चुका है, भगत सिंह ने गले में फंदा डालकर फाँसी देने के बजाय गोली मारकर मृत्यु देने की इच्छा व्यक्त की थी। उनकी यह अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं की गई और न्यायाधिकरण के फ़ैसले को अक्षरशः लागू किया गया।

फ़ैसला था कि उन्हें गले में फंदा डालकर तब तक लटकाया जाए, जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए। यदि उन्हें गोली मारकर मारा जाता, तो मृत्युदंड न्यायाधिकरण के फ़ैसले के बिल्कुल अनुरूप नहीं होता। न्याय की देवी के आदेश का पूरी तरह पालन किया गया और तीनों को उसी तरीके से मारा गया, जो उन्होंने निर्धारित किया था।
यह फाँसी किसके लिए?
यदि ब्रिटिश सरकार यह सोचती है कि न्याय की देवी के प्रति उसकी भक्ति और उसके आदेश के कठोर पालन से लोग प्रभावित होंगे और इस हत्या को उचित मानेंगे, तो यह उसकी घोर नादानी है। कोई नहीं मानता कि ब्रिटिश न्याय की देवी को स्वच्छ और निष्कलंक बनाए रखने के लिए यह बलि दी गई। सरकार स्वयं भी इस स्पष्टीकरण पर विश्वास नहीं कर पाएगी। फिर वह न्याय की देवी की यह ओट लेकर दूसरों को कैसे विश्वास दिला पाएगी?
ब्रिटिश सरकार सहित पूरी दुनिया जानती है कि इस बलिदान के पीछे न्याय की देवी के प्रति भक्ति नहीं, बल्कि इंग्लैंड में कंज़र्वेटिव पार्टी और वहाँ की जनमत का भय था। उन्हें लगा कि गांधी जैसे राजनीतिक बंदियों की बिना शर्त रिहाई और गांधी की पार्टी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने से साम्राज्य की प्रतिष्ठा को चोट पहुँची है। कंज़र्वेटिव पार्टी के कुछ कट्टर नेताओं ने यह कहते हुए अभियान छेड़ दिया था कि इसके लिए तत्कालीन लेबर पार्टी की कैबिनेट और उसके इशारे पर चलने वाले वायसराय ज़िम्मेदार हैं। ऐसी स्थिति में यदि लॉर्ड इरविन एक अंग्रेज अधिकारी की हत्या के दोषी ठहराए गए राजनीतिक क्रांतिकारियों पर दया दिखाते, तो यह विपक्षी नेताओं के हाथों में जलती मशाल थमा देने जैसा होता।
वैसे भी लेबर पार्टी की स्थिति स्थिर नहीं थी। ऐसे में यदि इन कंज़र्वेटिव नेताओं को यह कहने का बहाना मिल जाता कि लेबर सरकार ने एक अंग्रेज के हत्यारों को क्षमादान दिया है, तो सरकार के विरुद्ध जनमत भड़काना कितना आसान होता! इस आसन्न संकट को टालने और कंज़र्वेटिव नेताओं के मन में सुलग रही आग को और भड़कने से रोकने के लिए ये फाँसियाँ दी गईं।
इस प्रकार यह कदम न्याय की देवी को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि इंग्लैंड की जनता को प्रसन्न करने के लिए उठाया गया। यदि बात लॉर्ड इरविन की व्यक्तिगत पसंद या नापसंद की होती, तो फाँसी की सजा रद्द करके उसके स्थान पर आजीवन कारावास देने का अधिकार उनके पास था। इंग्लैंड की लेबर कैबिनेट भी इस निर्णय में लॉर्ड इरविन का समर्थन करती। गांधी-इरविन समझौते के संदर्भ में यहाँ अनुकूल जनमत बनाए रखना आवश्यक था।

देश छोड़ते समय लॉर्ड इरविन निश्चित ही यह सद्भावना अर्जित करना चाहते होंगे। लेकिन उन्हें इंग्लैंड में अपने कंज़र्वेटिव साथियों के क्रोध और उसी जातिवादी मानसिकता से भरी भारतीय नौकरशाही के बीच पिसना पड़ता। इसलिए यहाँ के जनमत की उपेक्षा करते हुए लॉर्ड इरविन की सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दे दी—वह भी कांग्रेस के कराची अधिवेशन से केवल दो से चार दिन पहले।
भगत सिंह और उनके साथियों की फाँसी तथा उसका समय, दोनों गांधी-इरविन समझौते को आघात पहुँचाने और उसे सफल बनाने के प्रयासों को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त थे। यदि लॉर्ड इरविन इस समझौते को विफल करना चाहते, तो उन्हें इससे बेहतर तरीका नहीं मिलता। इस दृष्टि से, और जैसा कि गांधी ने भी महसूस किया, ब्रिटिश सरकार ने बहुत बड़ी भूल की।
संक्षेप में,
इंग्लैंड के कंज़र्वेटिव नेताओं का क्रोध मोल न लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी दे दी गई। गांधी-इरविन समझौते का क्या होगा, इसकी परवाह किए बिना यहाँ के जनमत की उपेक्षा की गई। ब्रिटिश सरकार को याद रखना चाहिए कि वह इस तथ्य पर चाहे जितना पर्दा डाले या उसे चाहे जितना सँवार कर पेश करे, इसे कभी छिपा नहीं पाएगी।
(मूल मराठी से आनंद तेलतुंबडे द्वारा अंग्रेज़ी में अनूदित। हिन्दी अनुवाद हमारा)
सौजन्य: फॉरवर्ड प्रेस, 22 मार्च, 2018