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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: बोलने, असहमत होने और सत्ता से सवाल करने का अधिकार

Dr. Chayanika Uniyal Dr. Chayanika Uniyal | 1h ago · 7 min read
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: बोलने, असहमत होने और सत्ता से सवाल करने का अधिकार

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चुनौती यह है कि हम उस नागरिक साहस को सुरक्षित रखें जो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछ सके।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा अक्सर संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से शुरू होती है। लेकिन मैं अपनी बात संविधान से नहीं, एक छोटी-सी घटना से शुरू करना चाहती हूँ।

एक महिला जवाहरलाल नेहरू के सामने आईं और उनका गिरेबान पकड़कर सवाल किया—

“भारत आज़ाद हो गया, तुम देश के प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन मुझ बुढ़िया को क्या मिला?”

कहा जाता है कि नेहरू ने जवाब दिया—

“आपको यह मिला है कि आप देश के प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़कर खड़ी हैं।”
Credit- WikiMedia


इस घटना की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर अलग से चर्चा हो सकती है, लेकिन इसके भीतर छिपा लोकतांत्रिक विचार बहुत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र की उपलब्धि केवल यह नहीं है कि सत्ता किसके हाथ में है।

लोकतंत्र की असली उपलब्धि यह है कि सत्ता के सामने खड़ा नागरिक कितना स्वतंत्र है।

क्या वह प्रधानमंत्री से सवाल पूछ सकता है?

क्या वह सरकार की आलोचना कर सकता है?

क्या वह बहुमत से असहमत हो सकता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या ऐसा करने के बाद भी वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है? यहीं से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ शुरू होता है।

भारत में यह विचार अचानक 26 जनवरी 1950 को पैदा नहीं हुआ था। और इसकी एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा है। 26 जनवरी को संविधान लागू करने से पहले यह दिन 1930 से स्वतंत्रता दिवस के रूप में जाना जाता था। इस दिन संविधान लागू करने का अर्थ ही यही था कि स्वतत्रता संग्राम और नए संविधान के बीच में संबंधों को किस तरह से दर्शाया जाये। क्यूंकि भारतीय संविधान का निर्माण सिर्फ ढाई वर्षों में नहीं हुआ, बल्कि यह एक लम्बी प्रक्रिया है जो सदियों से चली आ रही थी। इसकी शुरुआत उस दिन हुई थी जिस दिन अंग्रेजों से भारत को मुक्त करने के लिए और संवैधानिक व उत्तरदायी सरकार देने के लिए इस देश के लोगों ने संघर्ष शुरू किया था। उसी संघर्ष के अंदर इस संविधान की प्रक्रिया छुपी हुई है। सबसे पहले जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का निर्माण हुआ तो कांग्रेस शब्द में एक राजनीतिक चेतना छुपी है क्यूंकि अमेरिकन संसद का लोअर हाउस कांग्रेस के नाम से जाना जाता है।

Credit- Down To Earth


गांधी का संघर्ष आम भारतीयों के लिए था, कुछ चुनिंदा भारतीयों के लिए नहीं। और सबसे बड़ी चीज या है कि औपनिवेशिक भारत में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी थी और नेताओं ने इसके लिए अनवरत संघर्ष किया। इसमें बाल गंगाधर तिलक को हम नहीं भूल सकते, जिन्होंने अपने समाचार पत्रों केसरी, मराठा से इस जागृति को फैलाने की कोशिश ही नहीं की बल्कि इस संघर्ष के लिए कई बार कीमत भी चुकाई।

आर्काइव


बहुत सारी अन्य पत्र-पत्रिकाएं- लीडर, बॉम्बे क्रानिकल, आनंद बाजार पत्रिका, हिंदुस्तान टाइम्स, द हिन्दू, ट्रिब्यून, अमृत बाजार पत्रिका जैसे समाचार पत्र केवल खबरें नहीं छाप रहे थे; वे एक राजनीतिक चेतना का निर्माण कर रहे थे। ये सभी सवतंत्रता संग्राम के संघर्ष में सहयोगी रही और यही इतिहास आगे चलकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को मूल अधिकारों में जोड़ने में सहायक सिद्ध हुआ।

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गाँधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना। गांधी के लोकतांत्रिक विचार की एक खूबसूरत मिसाल 1942 के बंबई अधिवेशन में दिखाई देती है। भारत छोड़ो प्रस्ताव लगभग सर्वसम्मति से पारित हुआ। केवल तेरह कम्युनिस्ट सदस्यों ने उसके विरुद्ध मतदान किया। सोचिए—देश निर्णायक आंदोलन की दहलीज पर खड़ा है। गांधी के नेतृत्व में इतना बड़ा प्रस्ताव सामने है। केवल तेरह लोग विरोध में हैं।

साभार- नेहरू आर्काइव

गांधी क्या करते हैं? वे उन्हें देश-विरोधी नहीं कहते। वे उन्हें कांग्रेस-विरोधी कहकर अपमानित नहीं करते। वे यह नहीं कहते कि जब पूरा देश एक तरफ है तो तुम्हें चुप हो जाना चाहिए। बल्कि गांधी उन तेरह लोगों को बधाई देते हैं।

क्यों? क्योंकि वे कहते हैं कि हमने बीस वर्षों में यह सीखा है कि जब हम निराशाजनक रूप से अल्पमत में हों, जब लोग हमारा मजाक उड़ाएँ, तब भी यदि हमें अपने विचार पर विश्वास है तो हमें उस पर टिके रहने का साहस रखना चाहिए।
ध्यान दीजिए—गांधी उनके विचार से सहमत नहीं थे। लेकिन उनके असहमत होने के साहस का सम्मान करते थे।

मेरे लिए यही लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण परिभाषाओं में से एक है— असहमति का सम्मान करने का अर्थ असहमति से सहमत होना नहीं है। लोकतंत्र में बहुमत को सरकार बनाने का अधिकार मिलता है; सत्य पर एकाधिकार नहीं।

यही विचार जवाहरलाल नेहरू में भी दिखाई देता है। 1940 में उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पर कहा था कि-

यदि हम केवल वही छपने दें जो हमें पसंद है, तो ऐसी स्वतंत्रता को कोई तानाशाह भी स्वीकार कर सकता है। असली स्वतंत्रता का अर्थ है—जो हमें पसंद नहीं है, उसे भी प्रकाशित होने देना और अपनी आलोचना को सहन करना।

यह वाक्य आज शायद पहले से अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परीक्षा उस भाषण से नहीं होती जिससे हम सहमत हैं। उससे हमें कोई समस्या ही नहीं है।

Freedom of Speech की असली परीक्षा उस आवाज़ से होती है जो हमें असुविधाजनक लगती है।

आज हम सोशल मीडिया के युग में हैं। हर व्यक्ति के हाथ में एक मंच है। सरकार की आलोचना कुछ मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, विपक्ष, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, मीडिया—कोई भी सार्वजनिक संस्था आलोचना से पूरी तरह बाहर नहीं रह सकती।

लेकिन इसके साथ एक खतरनाक प्रवृत्ति भी पैदा हुई है—असहमति को पहचान से जोड़ देना। आप सरकार की किसी नीति से असहमत हैं तो क्या आप राष्ट्र के विरुद्ध हैं? आप विपक्ष की आलोचना करते हैं तो क्या आप सत्ता के समर्थक हो जाते हैं? आप किसी आंदोलन से असहमत हैं तो क्या आपको आंदोलनकारियों के बोलने के अधिकार का भी विरोध करना चाहिए?

मेरा उत्तर है—नहीं।

सरकार राष्ट्र नहीं है।

सत्ता संविधान नहीं है।

आलोचना देशद्रोह नहीं है।

और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं है।

लेकिन इसी के साथ एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। Freedom of Speech का अर्थ किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़काने की असीमित स्वतंत्रता नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बनाया जा सकता।

यही कारण है कि हमारे संविधान ने Article 19(1)(a) के साथ Article 19(2) भी दिया। इसलिए लोकतांत्रिक प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या मुझे बोलने की आज़ादी है?”

प्रश्न यह भी होना चाहिए—क्या मेरे राजनीतिक विरोधी को बोलने की आज़ादी है?

यदि मैं अपने लिए Freedom of Speech मांगती हूँ लेकिन अपने विरोधी के लिए Censorship चाहती हूँ, तो मैं Freedom of Speech की नहीं, अपने Speech की freedom की बात कर रही हूँ।

यही अंतर लोकतंत्र और राजनीतिक सुविधा के बीच है। और इसमें मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता मूलतः मिशन की पत्रकारिता थी। उसने राजनीतिक चेतना पैदा की, सामाजिक प्रश्न उठाए और औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी। लेकिन आज मीडिया के सामने केवल राजनीतिक सत्ता का दबाव ही चुनौती नहीं है; बाजार, कॉरपोरेट स्वामित्व, विज्ञापन, TRP और Paid news भी उसकी स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं। मेरे अध्ययन में भी मैंने इसी बदलाव को रेखांकित किया है—जहाँ खबर धीरे-धीरे सार्वजनिक सरोकार से हटकर एक 'Product' में बदलने लगती है।

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इसलिए प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ केवल State versus Media नहीं है।

हमें पूछना होगा—

पत्रकार किससे स्वतंत्र है?

सरकार से?

मालिक से?

विज्ञापनदाता से?

राजनीतिक दल से?

TRP से?

या सोशल मीडिया की भीड़ से?

क्योंकि स्वतंत्र प्रेस के बिना Informed Citizen नहीं बन सकता और Informed Citizen के बिना लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित होकर रह जाएगा।

नेहरू से अमेरिकी पत्रकार नॉर्मन कज़िन्स ने एक बार पूछा था कि वे अपनी कौन-सी विरासत छोड़कर जाना चाहेंगे। नेहरू से जुड़ा प्रसिद्ध उत्तर है—

“40 करोड़ भारतीय, जो स्वयं अपना शासन करना जानते हों।”

यह लोकतंत्र की शायद सबसे बड़ी चुनौती है। Self-government का अर्थ केवल अपनी सरकार चुनना नहीं है। इसका अर्थ है—

सवाल करना सीखना। तर्क करना सीखना ।असहमत होना सीखना। दूसरे की असहमति सुनना सीखना। और सत्ता को बिना भय के जवाबदेह बनाना।

इसलिए मैं अपनी बात वहीं समाप्त करना चाहूँगी जहाँ से शुरू की थी।

यदि लोकतंत्र में एक सामान्य महिला देश के प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़कर उससे पूछ सकती है—“मुझे क्या मिला?”—तो लोकतंत्र का उत्तर केवल सरकारी योजनाओं की सूची नहीं हो सकता।

उसका एक उत्तर यह भी है—

आपको सवाल पूछने का अधिकार मिला। आपको असहमत होने का अधिकार मिला। आपको सत्ता की आलोचना करने का अधिकार मिला।

और शायद सबसे महत्वपूर्ण— आप प्रजा नहीं रहे, नागरिक बन गए।

आज चुनौती केवल इस अधिकार को संविधान की किताब में सुरक्षित रखने की नहीं है।

चुनौती यह है कि हम उस नागरिक साहस को सुरक्षित रखें जो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सवाल पूछ सके—और उस लोकतांत्रिक उदारता को भी, जो उस सवाल को सुन सके।
Dr. Chayanika Uniyal

Dr. Chayanika Uniyal

डॉ चयनिका उनियाल दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की असोसिएट प्रोफेसर हैं और जेंडर मुद्दों की प्रखर प्रवक्ता