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रिपोर्ट: The Credible News के लोकार्पण समारोह में प्रेस क्लब के हॉल में कुर्सियां पड़ गई कम

TCN Desk TCN Desk | 12 Aug, 2026 · 5 min read
रिपोर्ट: The Credible News के लोकार्पण समारोह में प्रेस क्लब के हॉल में कुर्सियां पड़ गई कम

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में The Credible News का लोकार्पण समारोह

अगस्त क्रांति दिवस के दिन जब द क्रेडिबल न्यूज वेबसाइट का लोकार्पण हो रहा था उस वक्त प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के हॉल में जितने लोग अंदर थे करीब उतने ही लोग बाहर थे। हॉल में दरअसल कुर्सियां कम पड़ गई थी। उम्मीद से ज्यादा भीड़ और सभी के चेहरों पर इस कार्यक्रम के हर पल की गवाही बनने का उत्साह चरम पर था। तय कार्यक्रम के तहत 9 अगस्त को शाम के 6 बजे कार्यक्रम के लिए अतिथियों का आना शुरू हो गया था। उमस और गर्मी के बावजूद कुछ ही देर में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के हॉल में लगी सभी कुर्सियां भर गईं।

The Credible News का विधिवत लोकार्पण Hindustan Times के पूर्व राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा ने किया।

इस मौके पर 'लोकतंत्र का संकट और मीडिया' विषय पर एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया था। परिचर्चा की अध्यक्षता पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इकबाल अंसारी कर रहे थे।

The Credible News के मैनेजिंग एडिटर अशोक कुमार पांडे ने परिचर्चा सत्र शुरू होने से पहले अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि क्यों इस शोर में द क्रेडिबल न्यूज अन्य खबरिया वेबसाइट से अलग होगा।

उन्होंने कहा कि खबर तो हम एक्स पर, फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर और ज्यादा हुआ तो गूगल पर सर्च करके पढ़ ही लेते हैं लेकिन हम खबरों के पीछे की खबर से अनजान रह रह जाते हैं। हम जो खबरें लेकर आएंगे उसमें विवेचना भी होंगी, और यह सत्ता के नहीं जनता के पक्ष से होगा। वेबसाइट के माध्यम से हम लोगों से संवाद भी करेंगे और उनके सरोकार को सामने लाएंगे।

हम ऐसी वेबसाइट लाना चाह रहे हैं जिसका पाठक उसका लेखक भी हो।

सीनियर जर्नलिस्ट विनोद शर्मा ने परिचर्चा में अपने विचार रखते कहा कि यह कॉर्पोरेट मीडिया का दौर है। इसमें रीडर्स से ज्यादा बड़े विज्ञापनदाता होते हैं, जिनके दम पर अखबार और न्यूज चैनल चलता है। ऐसे समय में जब फ्री प्रेस की बात होती है और रीडर्स ये मांग करते हैं कि जो भी लिखा हो या दिखाया जाए वो यथार्थ सत्य हो तो आपको ऐसे मीडिया के लिए भी पैसा खर्च करना पड़ेगा। प्रेस फ्रीडम आज कहीं नहीं है। सच्चाई में ये फ्रीडम आफ एडवरटाईजर्स है।

अगर ऐसे समय में आप चाहते हैं कि वो क्रेडिबल न्यूज दें, सच्ची खबरें दें और आप उसे कंज्यूम करें तो आपको इसके खर्च के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष हिंदवी ने कहा आज जब हम सब इस मुबारक मौके पर एकत्र हुए हैं तो कई गंभीर सवाल हमारे सामने हैं। क्या भारतीय लोकतंत्र पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं? क्या मुख्य धारा की मीडिया अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं कर पा रही है? अगर हमपहले प्रश्न की बात करे तो यह बात आइने की तरह साफ हो गई है कि वर्तमान निजाम ने पिछले 12 सालों में सभी लोकतांत्रिक मूल्य नष्ट कर दिए हैं। सारी संवैधानिक संस्थाओं को गुलाम बना दिया गया है।

अति तो तब हो गई जब यह आग चुनाव आयोग तक पहुंच गई है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के दो आधार होते हैं। वोट का अधिकार और निष्पक्ष चुनाव। यह दोनों अधिकार गंभीर खतरे में है। हिंदवी ने कहा कि मुख्य धारा की मीडिया सरकार के लिए फेक नैरेटिव गढ़ती है। उनके किए गए गलत कार्यों पर पर्दा डालती है। झूठ फैलाती है। सरकार जब फंसने लगती है तो नए डिस्कोर्स पैदा करती है। सामाजिक विद्वेष बढ़ाने में सरकार की मदद करती है।

गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और आईआईटी दिल्ली के सेवानिवृत प्राध्यापक प्रो. वी के त्रिपाठी ने खबरों की शोर में विश्वसनीयता के संकट के सवाल पर अपने विचार रखे। उन्होंने 1992 के अलीगढ़ दंगे के दौरान अखबार की रिपोर्टिंग का एक उदाहरण देते बताया कि उन्हें पता चला कि डियाबी में दंगा हो गया है। वो भागे-भागे डियाबी गए और वहां सड़क पर बैठे एक मोची से पूछा-यहां कोई दंगा हुआ है क्या तो उन्होंने कहा नहीं। दूसरे दुकानदार से पूछा तो उन्होंने भी कहा ऐसा कोई दंगा नहीं हुआ है। उन्हें अचरज हुआ, तो वो शहर के ऐसे दो लोगों के पास गए जिन पर हिंदू भी यकीन करते थे और मुसलमान भी यकीन करते थे।

एक दुकानदार ने उनसे कहा- यह महज अफवाह था, लेकिन जिस दिन इनकी सरकार आ जाएगी ये हर सच बोलने वालों को सूली पर लटका देंगे।

सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकार शीबा असलम फहमी ने जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान मेनस्ट्रीम मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते कहा कि लोकतंत्र को कमजोर करने में मेनस्ट्रीम मीडिया सबसे बड़ा गुनहगार है। मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकार और उनके एंकर ने छात्रों को आतंकी साबित करने, प्रदर्शन को बदनाम करने की हरसंभव कोशिश की। लेकिन छात्रों और जेन जी की जिद के आगे उनके सभी साजिश औऱ मंसूबे बेनकाब हो गए।

शीबा असलम फहमी ने कहा कि लोकतंत्र में पिछले 12 सालों से मुसलमानों को हाशिये पर डाला जा रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिरुद्ध देशपांडे ने अपने वक्तव्य में प्रिंट कैपिटलिज्म की चर्चा करते कहा कि इतिहास में प्रिंट कैपिटलिज्म के साथ-साथ फ्री प्रेस के भी कई उदाहरण हैं। उस समय भी सच के साथ पत्रकारिता करना खतरनाक था और आज तो और भी खतरनाक है।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए पटना हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्ययाधीश इकबाल अंसारी ने कहा कि अशोक क्रेडिबल हिस्ट्री के माध्यम से हमें इतिहास की विश्वसनीय जानकारी देते हैं और इस मामले में तो मैं उनका कायल हूं और अब वो क्रेडिबल न्यूज देने की सोच रहे हैं, लेकिन यह तभी संभव होगा जब उनके रिपोर्टर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करें। उन्होंने अपने भाषण के अंत में जाते-जाते एक ऐसा बयान दिया जो आज के सत्ता और समय को परेशान करने के लिए काफी है।

जस्टिस अंसारी ने कहा कि मैंने अपने जीवनकाल में ऐसा कभी नहीं देखा जो आज देख रहा हूं। आज की ज्यूडिशयरी सबसे ज्यादा डरी हुई और सहमी हुई है। ऐसा मैनें कभी नहीं देखा था।

इस मौके पर पत्रकारिता, राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र के अनेक महत्त्वपूर्ण लोगों के अलावा बड़ी संख्या में युवा और आम जन भी उपस्थित थे।