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अंधेरों में राह रोशन करने का संकल्प है ‘The Credible News’

Manish Hindvi Manish Hindvi | 10 Aug, 2026 · 6 min read
अंधेरों में राह रोशन करने का संकल्प है ‘The Credible News’

पूरा देश कृतज्ञ हैं अशोक भाई जैसे लोगों का जिन्होंने इन अंधेरों में राह रोशन करने का संकल्प लिया है।

सम्मानित साथियों,

आज एक ऐतिहासिक दिन है, आज ही के दिन वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत हुई थी। एक बहुत बड़ी खासियत थी उस आंदोलन की, आंदोलन शुरू होते ही अंग्रेजी सरकार द्वारा कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, पूरे आंदोलन का नेतृत्व द्वितीय और तृतीय पंक्ति के नेताओं द्वारा किया गया। परिणाम इतिहास है।

वापस आते हैं, कहते हैं कि चुनावों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सबसे पहले बराक ओबामा ने अपने 2008 के इलेक्शन में किया और भारत में 2014 के इलेक्शन में नरेन्द्र मोदी ने किया। बस एक मूल फर्क था दोनों में ओबामा ने सकारात्मक रूप से चुनाव जीतने के लिए किया और नरेन्द्र मोदी ने नकारात्मक रूप से समाज को बांटकर हिन्दू मुस्लिम में दरार डालकर, झूठी खबर फैलाकर, इतिहास को गलत तरीके से चित्रित करके आजादी के नायको को बदनाम करके पूरा परिवेश विष से भर दिया।

वर्ष 2013 से 2021 तक नफरत का ये सोशल मीडिया रूपी घोड़ा दौडता रहा। यहां तक वर्ष 2020-21 के कोरोना काल के महामारी के दौर में भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल तमाम तरह की नफरत, अफवाह और घृणा फैलाने के लिए किया गया। एक बार फिर मोर्चा संभाला बहुत ही आम लोगों ने जिन्होने बहुत ही अल्प संसाधनो से इस झूठे और प्रपंची तंत्र के खिलाफ लड़ना शुरू किया। परिणाम इतिहास है।

उस दौर में भी कुछ जुगुनू थे जो घनघोर अंधेरों के खिलाफ लड़ गए और अपने अदम्स साहस से सूरज में तब्दील हो गए। इस दौर में भी कुछ जुगुनू हैं जो स्याह काले अंधेरों के खिलाफ लड़ गए और सूरज मे तब्दील हो गए।

चार साल पहले जब टीसीएच की यात्रा शुरू हुई तो उस यात्रा के पीछे, कोई बहुत बड़ा संसाधन नहीं था, कोई बड़ी ताकत नहीं थी। अगर कुछ था तो सिर्फ एक आादमी की जिद सच कहने की, उसकी हिमाालय सी दृढ इच्छा शक्ति और देश के प्रति उसका कत्वर्यबोध। आज जब मैं तहे दिल से भाई अशोक पाण्डेय को टीसीएन के वेबसाइट के लोकार्पण की बधाई प्रेषित करता हूं तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये चार साल की यात्रा एक जुगुनू के सूरज बनने की है।

ये है तो सब के लिए हो, ये जिद हमारी है

इस एक बात पे दुनिया से जंग जारी है।

उड़ान वालों उड़ानों पे वक्त भारी है

परों की अबकी नहीं हौंसलों की बारी है।

मैं कतरा होकर भी तूंफा से जंग लेता हूं,

मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है।

दुआ करो की सलामत रहे मेरी हिम्मत

ये इक चराग कई आंधियों पे भारी है।


आज जब हम सब इस मुबारक मौके पर एकत्र हुए हैं तो कई गंभीर सवाल हमारे सामने हैं। क्या भारतीय लोकतंत्र पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं? क्या मुख्य धारा की मीडिया अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं कर पा रही है? अगर हम पहले प्रश्न की बात करे तो यह बात आइने की तरह साफ हो गई है कि वर्तमान निजाम ने पिछले 12 सालों में सभी लोकतांत्रिक मूल्य नष्ट कर दिए हैं। सारी संवैधानिक संस्थाओं को गुलाम बना दिया गया है। अति तो तब हो गई जब यह आग चुनाव आयोग तक पहुंच गई है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के दो आधार होते हैं। वोट का अधिकार और निष्पक्ष चुनाव। यह दोनों अधिकार गंभीर खतरे में है।

अब मुख्य बात

क्या मीडिया अपनी भूमिका का निर्वहन नहीं कर पा रही है?

सवाल उठ सकता है कि मीडिया से इतनी उम्मीद क्यों?

इस जवाब के लिए 1830-40 के दशक में चलना पडेगा जब ब्रिटिश राजनेता एडमंड बर्क ने मीडिया को पहली बार चौथा स्तंभ कह कर संबोधित किया। वो इस बात पर जोर देते है कि सदन में जो पत्रकारों की गैलरी है वह सबसे महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं विकसित हुई चौथा स्तंभ भी वैचारिक रूप से विकसित हुआ और यह माना गया कि लोकतंत्र के तीन स्तंभों कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ यह स्तंभ एक अनौपचारिक प्रहरी के रूप में खड़ा है।

सच यह है कि मीडिया को जनता और सरकार के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए, मीडिया को सूचना के स्वतंत्र प्रवाह को सुगम बनाना चाहिए, मीडिया को सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ एक सतर्क प्रहरी के रूप में काम करना चाहिए। सच्ची पत्रकारिता का अर्थ ही है कि पूरी ईमानदारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी के साथ तथ्यों को खोजना, उनकी जांच करना और उन्हें जनता के सामने लाना। मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सटीक और प्रमाणिक जानकारी देना है ताकि वे समाज और लोकतंत्र में अपनी भूमिका सही ढंग से निभा सकें। इसके उलट आज भारत में क्या हो रहा है?

मुख्य धारा की मीडिया सरकार के लिए फेक नैरेटिव गढ़ती है। उनके किए गए गलत कार्यों पर पर्दा डालती है। झूठ फैलाती है। सरकार जब फंसने लगती है तो नए डिस्कोर्स पैदा करती है। सामाजिक विद्वेष बढ़ाने में सरकार की मदद करती है।

वैसे तो इन कुकर्मों के लाखों उदाहरण है लेकिन मैं आपके बीच कुछ महत्वपूर्ण तथ्य रखता हूंः-

पहला उदाहरणः- अभी जब जंतर मंतर पर छात्रों द्वारा आंदोलन किया जा रहा था तो मीडिया ने पहले तो उसे दिखाया नहीं मगर जब अल्टरनेट मीडिया पर अशोक भाई जैसे लोगों ने उसे दिखाना शुरू किया तो सरकार की किरकिरी होने लगी और यह लोग सरकार के बचाव में उतर पड़े। सच दिखाने के बजाय छात्रों को ही बदनाम करने लगे। इनके घटियापन का एक ताजा उदाहरण सुनिए जो अमन चोपड़ा नोएडा से दिल्ली जंतर मंतर नहीं जा पाए वह रांची पहुंच गए हैं और जाते ही जो पहली सूचना उन्होंने प्रसारित की है वह है कि दिल्ली में जुनैद के यहां से बिरयानी आती थी और यहां मंदिर से बच्चों के लिए खाना आ रहा है। आदतन महोदय ने पूरा डिस्कोर्स बदलने की कोशिश की।

दूसरा उदाहरणः- सावरकर के माफीनामों को सही ठहराने के लिए जवाहरलाल नेहरू जी का झूठा माफी नामा ले आए ये लोग। धन्यवाद अशोक भाई का जिन्होंने बड़ी मजबूती से इसका काउंटर किया।

यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि भारत की वर्तमान मीडिया अपने लिए गढ़े गए सभी नियमों और उसूलों को ध्वस्त करने में जुटा है। इनसे कोई उम्मीद बेमानी है हालांकि ये यह बात भूल गए कि

जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है।

आपके पीछे तेज हवा है, आगे मुकद्दर आपका है।

उसके कत्ल पर मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया।

मेरे कत्ल पर आप भी चुप है, अगला नंबर आपका है।

ताजातरीन उदाहरण अमीष देवगन जी का है जिनकी तमाम स्वामीभक्ति के बावजूद भी उन्हें शहीद कर दिया गया। तानाशाह किसी के नहीं होते। वह सिर्फ बर्बादी का सबब बनकर आते हैं। अफसोस जिन लोगों पर देश के प्रहरी बनने की जिम्मेदारी थी उन्होंने तानाशाह की चाकरी कर ली है। मगर कहते हैं कि रात कितनी भी काली क्यों ना हो सुबह जरूर आती है।

मैं और पूरा देश कृतज्ञ है अशोक भाई जैसे लोगों का जिन्होंने इन अंधेरों में राह रोशन करने का संकल्प लिया है और यकीन जानिए आपके इसी संकल्प से तानाशाह घबराया हुआ है।

मशालें जो हम तुम जलाए हुए हैं, अंधेरे बहुत तिलमिला हुए हैं।

उन्हें खल रही है यह हिम्मत हमारी, की क्यों लोग परचम उठाए हुए हैं।

मशालें जलाए रखिए

परचम उठाए रखिए

संघर्ष जारी रखिए


जय हिंद

जय भारत

Manish Hindvi

Manish Hindvi

मनीष हिंदवी उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता।