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पोस्ट हटाने या फ्लैग करने से नहीं छीनी जा सकती बोलने की आजादी

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 6 min read
पोस्ट हटाने या फ्लैग करने से नहीं छीनी जा सकती बोलने की आजादी

सरकार का इतना दबाव है कि Meta और X पर पत्रकारों, राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं और मीडिया संस्थानों के पोस्ट लगातार हटाए जा रहे हैं।

Meta और सरकार के बीच जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो रिस्ट्रिक्ट कर देने के बाद जो विवाद बढ़ा उसका असर अब दिखने लगा है। हांलाकि Meta ने इस मामले में माफी मांग ली है, लेकिन कंपनी पर सरकार का इतना दबाव है कि Meta और X पर पत्रकारों, राजनीतिक दलों, कार्यकर्ताओं और मीडिया संस्थानों के पोस्ट लगातार हटाए जा रहे हैं, अकाउंट सस्पेंड किए जा रहे हैं। लेकिन पोस्ट हटाने या फ्लैग किए जाने के बाद क्या लोगों ने दमन, अन्याय और भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखना-बोलना बंद कर दिया है। अगर सरकार के दबाव में Meta और X इस तरह की कार्रवाई कर रही है तो उन्हें ये अंदाजा हो गया होगा कि दमन के बाद विरोध की आवाज और दोगुने ताकत से बुलंद होती है।

ये कार्रवाइयां सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(b) के तहत जारी सरकारी नोटिसों के बाद की जा रही हैं। इस बढ़ते चलन ने भारत में पारदर्शिता, उचित कानूनी प्रक्रिया और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

Newslaundry की एक रिपोर्ट के अनुसार, फ्रीलांस पत्रकार सचिन गुप्ता के मुताबिक, उन पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए स्थिति खास तौर पर गंभीर है, जिन्हें किसी संस्थान का समर्थन हासिल नहीं है। उन्होंने कहा, “जब हम सोशल मीडिया पर नफरती भाषण या हिंसा से जुड़ी सामग्री साझा करते हैं, तो सरकार को उन पोस्टों का संज्ञान लेकर नफरत फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, न कि उसे पोस्ट या शेयर करने वालों के खिलाफ। एक तरह से यह संदेशवाहक को ही खत्म करने की कोशिश है, ताकि ऐसी बातें सामने न आ सकें।”

जुलाई से दिसंबर 2025 के बीच Meta ने भारत में 41,000 से ज्यादा कंटेंट पर पाबंदी लगाई। यह संख्या एक साल पहले की तुलना में लगभग तीन गुना थी। Meta की भारत में कंटेंट प्रतिबंधों से जुड़ी रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। Newslaundry से बात करने वाले Meta के एक कर्मचारी के अनुसार, इससे नए आंकड़े इस महीने के अंत में जारी किए जाएंगे। जंतर-मंतर से जुड़े आपत्तिजनक वीडियो हटाने के लिए पुलिस अभियान के बीच आरोप लगाए जा रहे हैं कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंधों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

सचिन गुप्ता ने इन प्रतिबंधों को लेकर स्पष्टता की कमी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि,

स्वतंत्र और फ्रीलांस पत्रकारों तथा सोशल मीडिया क्रिएटर्स के पास अपनी खबर या जानकारी प्रकाशित करने के लिए कोई संस्थागत मंच नहीं होता, इसलिए वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। अगर उनकी ऐसी पोस्ट भी डिलीट या हटा दी जाएंगी, तो ये लोग आखिर कहां जाएंगे?”

सचिन गुप्ता को X की ओर से उनकी दो पोस्ट हटाने के लिए दो नोटिस मिले। इनमें से एक नोटिस सहारनपुर पुलिस और दूसरा मुजफ्फरनगर पुलिस की ओर से था।


गुप्ता के मुताबिक,

दोनों नोटिस इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारियों ने भेजे थे। उनका दावा है कि जब उन्होंने दोनों जिलों के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों ने उनकी पोस्ट हटाने के निर्देश जारी किए हैं।
इनमें से एक पोस्ट में हिंदुत्व कार्यकर्ता पिंकी चौधरी का वीडियो था, जिसमें वह इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद में हिंदू धार्मिक अनुष्ठान करने की घोषणा करते दिखाई दे रहे थे। दूसरा वीडियो हाल की कांवड़ यात्रा से जुड़ा था, जिसमें कांवड़ियों ने दिल्ली-हरिद्वार हाईवे को जाम कर दिया था। मुजफ्फरनगर पुलिस ने दावा किया कि यह वीडियो हिंसा को बढ़ावा दे रहा था।

Meta के प्लेटफॉर्म पर पत्रकार संतोष पाठक, Alt News के सह-संस्थापक और फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर, मीडिया संस्थान Scroll और The Hindu, इंडियन यूथ कांग्रेस, अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी, CJP के आशुतोष रांका और सौरव दास की पोस्ट भी मौजूदा प्रतिबंधों और टेकडाउन के संदर्भ में फ्लैग की गई हैं।

Scroll ने बताया कि Instagram पर उसकी एक पोस्ट भारत में उपलब्ध नहीं कराई गई। यह रिपोर्ट कश्मीर में पैलेट गन से घायल हुए उन लोगों के बारे में थी, जिन्हें करीब एक दशक बाद भी मुआवजा नहीं मिला था। उसी दिन बाद में प्रकाशित एक दूसरी पोस्ट, जिसमें ऐसी तस्वीर थी जिसमें पैलेट से लगी चोटें दिखाई नहीं दे रही थीं, उसे भी प्रतिबंधित कर दिया गया। Instagram ने इन कार्रवाइयों का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया। Scroll के मुताबिक, पोस्ट Facebook और Threads पर उपलब्ध रही, लेकिन Instagram पर उसे प्रतिबंधित कर दिया गया।

इसी तरह The Hindu की एक Instagram पोस्ट भी भारत में प्रतिबंधित कर दी गई। यह पोस्ट कश्मीर की पैलेट गन पीड़ित इंशा मुश्ताक के बारे में थी, जिनकी 2016 के कश्मीर प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन चलाए जाने से आंखों की रोशनी चली गई थी। दोनों मीडिया संस्थानों की पोस्ट पर प्रतिबंध लगाने के जवाब में प्लेटफॉर्म ने सिर्फ इतना कहा कि उसने “भारत के आईटी नियमों के तहत कंटेंट तक पहुंच सीमित की है।” इसके अलावा कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई।

नाम न छापने की शर्त पर Meta के एक कर्मचारी ने Newslaundry से कहा कि धारा 79(3)(b) के तहत जारी नोटिसों का पालन करना प्लेटफॉर्म के लिए कानूनी रूप से जरूरी है। ऐसा न करने पर एक मध्यस्थ के तौर पर Meta को मिला “सेफ हार्बर” संरक्षण खत्म हो सकता है।

आईटी एक्ट की धारा 79 Meta और X जैसे इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट की कानूनी जिम्मेदारी से सुरक्षा देती है, बशर्ते वे सरकारी टेकडाउन निर्देशों का पालन करें। “सेफ हार्बर” सुरक्षा खत्म होने पर प्लेटफॉर्म अपने यहां मौजूद गैरकानूनी सामग्री के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं। यही कारण है कि धारा 79(3)(b) के नोटिसों की प्रक्रिया पर विवाद होने के बावजूद प्लेटफॉर्म बड़े पैमाने पर उनका पालन करते हैं।

Meta ने यह भी बताया कि स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा सौंपे गए अदालती आदेशों के जवाब में 22,000 से ज्यादा पोस्ट तक पहुंच सीमित की गई। इनमें स्थानीय नेताओं से संबंधित AI-जनित सामग्री भी शामिल थी। बाकी पोस्ट कथित तौर पर अन्य स्थानीय कानूनों के उल्लंघन के कारण प्रतिबंधित की गईं।

Software Freedom Law Centre (SFLC), India ने इस टेकडाउन अभियान पर चिंता जताते हुए कहा कि यह कानून के शासन और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक प्रतिबद्धता के विपरीत है।

SFLC के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 69A की संवैधानिक वैधता इस आधार पर बरकरार रखी थी कि इसके तहत ब्लॉकिंग आदेश तर्कसंगत, आवश्यक और आनुपातिक होने चाहिए। इसके उलट संगठन का आरोप है कि Sahyog पोर्टल ऑनलाइन कंटेंट हटाने की एक समानांतर व्यवस्था तैयार करता है, जिसमें धारा 69A जैसे सुरक्षा उपाय मौजूद नहीं हैं। इससे यूजर्स को टेकडाउन का कारण नहीं पता चलता, वे प्रभावी तरीके से उसे चुनौती नहीं दे पाते और प्रभावित पक्षों के पास कानूनी राहत के पर्याप्त विकल्प नहीं रहते।