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कानून के डंडे से किसी को वंदे मातरम् गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता

Iqbal Ahmad Iqbal Ahmad | 1h ago · 4 min read
कानून के डंडे से किसी को वंदे मातरम् गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता

सच्ची राष्ट्रभक्ति सम्मानपूर्वक चुपचाप खड़े रहने में भी प्रदर्शित होती है।

भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता, बहुलता और समावेशन (Inclusivity) रही है। जब भी सत्ता में बैठे लोग देशभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों को अपनी विशिष्ट विचारधारा के सांचे में ढालने और नागरिकों पर जबरन थोपने की कोशिश करते हैं, तब-तब देश के सामाजिक ताने-बाने और नागरिकों के मूल अधिकारों पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है।

हाल ही में,

'वंदे मातरम्' के सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने और ऐसा न करने पर आपराधिक कार्रवाई की दंडात्मक व्यवस्था पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी ने एक बार फिर इस बहस को देश के केंद्र में ला खड़ा किया है। अदालत द्वारा इस जबरन अनिवार्यता पर दी गई संवैधानिक नसीहत न केवल नागरिक अधिकारों की जीत है, बल्कि उस सांप्रदायिक राजनीति पर भी एक करारा प्रहार है जो राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल देशभक्ति को मापने और समाज को बांटने के हथियार के रूप में करती आई है।

22 सितंबर 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत कर रहे थे और जिसमें जस्टिस जोयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, ने 'वंदे मातरम्' के सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने और इसे न गाने पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने से जुड़े संशोधित कानून पर सुनवाई की। यह याचिका प्रसिद्ध कर्नाटक संगीतकार टी. एम. कृष्णा द्वारा दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 1986 के प्रसिद्ध 'बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य' मामले के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए स्थिति पूरी तरह साफ कर दी। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि,

अगर कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आवाज के कारण राष्ट्रगीत के एक या सभी अंतरों को नहीं गाता है, तो उसे केवल इस वजह से आपराधिक मुकदमे या जेल की सजा का सामना नहीं करना पड़ेगा। देश का कानून, जैसा कि 'बिजोय इमैनुएल' मामले में तय किया जा चुका है, आज भी पूरी तरह लागू होता है।

जस्टिस जोयमाल्या बागची ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी लोकतांत्रिक सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों का दायरा तय कर सकती है, लेकिन वह किसी नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करके उस पर आपराधिक सजा नहीं थोप सकती। अदालत का यह संदेश बेहद साफ था, सच्ची राष्ट्रभक्ति सम्मानपूर्वक चुपचाप खड़े रहने में भी प्रदर्शित होती है, उसे कानून के डंडे से किसी के गले से जबरन नहीं निकाला जा सकता।

इस विवाद की जड़ों को समझने के लिए बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित 'वंदे मातरम्' के इतिहास को देखना होगा।

1875 में लिखा गया यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महान उद्घोष बना था। लेकिन 1950 में जब संविधान सभा में राष्ट्रगीत को अपनाने की बात आई, तो दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने इसके केवल पहले दो अंतरों को ही राष्ट्रगीत का दर्जा दिया।

इसके पीछे की वजह बिल्कुल स्पष्ट थी।

गीत के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और उसकी भूमि का वंदन है, जबकि बाद के चार अंतरों में धार्मिक देवी-देवताओं का आह्वान और दुर्गा-लक्ष्मी के रूप में देश की परिकल्पना की गई है। भारत एक बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश है, जहां एकेश्वरवादी नागरिक, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, ईश्वर के अलावा किसी अन्य आकृति या देवी की वंदना को अपने धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत मानते हैं। इसीलिए संविधान सभा ने सर्वसम्मति से तय किया था कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल पहले दो अंतरों का ही उपयोग होगा, ताकि किसी भी नागरिक की धार्मिक आस्था और उसकी देशभक्ति के बीच टकराव पैदा न हो।

लेकिन वर्तमान सरकार, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वैचारिक एजेंडे के तहत इस ऐतिहासिक राष्ट्रीय सहमति को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया। संसद में कानून में संशोधन करके इसके सभी छह अंतरों को अनिवार्य बनाना और न गाने पर 3 साल तक की जेल का दंडात्मक प्रावधान जोड़ना केवल एक गीत से जुड़ा मामला नहीं था।

यह सीधे तौर पर आरएसएस के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और 'हिंदू राष्ट्र' के उस एजेंडे को आगे बढ़ाने की खतरनाक कोशिश थी, जहां राष्ट्रभक्ति की परिभाषा केवल एक बहुसंख्यकवादी नजरिए से तय की जाती है।

आरएसएस और बीजेपी की राजनीति में 'वंदे मातरम्' हमेशा से एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। सत्ता पक्ष की रणनीति बिल्कुल साफ नजर आती है कि एक ऐसा विवाद खड़ा किया जाए जिससे समाज तुरंत दो ध्रुवों में बंट जाए। एक तरफ वे लोग खड़े दिखें जो सरकार के हर फैसले को 'राष्ट्रवाद' का तमगा देते हैं, और दूसरी तरफ अल्पसंख्यक और उदारवादी लोग जो संविधान और अपनी धार्मिक आजादी के पक्ष में खड़े होते हैं। इस पूरी कवायद का असली मकसद मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को कटघरे में खड़ा करना और उन्हें 'कम देशभक्त' या 'अराष्ट्रवादी' साबित करके बहुसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करना है।

Iqbal Ahmad

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इक़बाल अहमद पेशे से फ्रीलांस लेखक हैं और यू ट्यूब पर पाँच साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। द क्रेडिबल हिस्ट्री पर इनका साप्ताहिक शो ‘द मुस्लिम एंगल’ दर्शकों में लोकप्रिय है।