Politics

बंदे मातरम पर राजनीति और काकोरी कांड के शहीदों की मूर्तियों का ऐसा अपमान!

Sudhir Vidyarthi Sudhir Vidyarthi | 2h ago · 4 min read
बंदे मातरम पर राजनीति और काकोरी कांड के शहीदों की मूर्तियों का ऐसा अपमान!

एक तरफ़ देशभक्ति का दावा तो दूसरी तरफ़ शहीदों की मूर्तियों का अपमान

22-23 मार्च, 2026 को रात के अंधेरे में 12.30 बजे से 3.00 के मध्य शाहजहांपुर की सरज़मीं पर 1972 में नगरपालिका के प्रांगण में स्थापित काकोरी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां और रोशन सिंह की प्रतिमाओं को बुलडोजर से ध्वस्त कर मलबा शहर के बाहर डंपिंग ग्राउंड में फेंक दिया गया।

फोटो कैप्शन- इस तरह बुलडोजर से ध्वस्त की गई काकोरी शहीदों की प्रतिमा
23 मार्च का सवेरा होते-होते नगर निगम प्रशासन और प्रदेश सरकार के हुक्मरानों तथा सत्ताधारियों की मिली-भगत से अंजाम दिए गए इस दुष्कृत्य की खबर फोटो और वीडियो के साथ फैलते ही सूबे भर के अनेक शहरों में इसके प्रतिरोध की इबारत तीव्रता से लिखी जाने लगी। सुयोग्य महापौर महोदया ने इस सबसे अनजान बने रहकर उस रोज़ कहा था कि वे नवरात्र के व्रत के चलते निगम कार्यालय नहीं जा रही थीं इसलिए उन्हें इसका पता नहीं लगा। नगर आयुक्त का भी कथन था कि उनको भी शहीद प्रतिमाओं पर हुई इस बुलडोजर कार्रवाई का कुछ संज्ञान नहीं था।

फोटो कैप्शन- प्रतिमाओं को ध्वस्त कर मलबा डंपिंग ग्राउंड में फेक दिया गया

इसके बाद आनन-फानन में व्यवस्था से जुड़े लोगों ने इसका जिम्मा सौन्दर्यीकरण करने वाली संस्था के सिर पर मढ़ कर ’मुक्ति’ का जो उपक्रम किया, उसकी पोल-पट्टी खुल गई जब कार्यदायी संस्था ने अदालत में बाकायदा कहा कि उनका कोई कर्मचारी रात्रि में काम नहीं करता और न ही घटनास्थल पर उनकी जेसीबी मशीन मौजूद थी। हैरत की बात है कि अब तक सब कुछ रहस्य के गर्भ में है कि आख़िर शहीदों के बुतों को रात्रि में गुपचुप ढंग से हटाए जाने के पीछे क्या और किसकी षड्यंत्रकारी योजना थी?

फोटो कैप्शन- जन-दबाव के चलते जल्दी-जल्दी स्तम्भ बनाए गए और फिर ध्वस्त प्रतिमाओं को जोड़कर लगाया गया

सामाजिक दबाव के चलते जल्दी-जल्दी टूटी प्रतिमाओं के सिरों और धड़ों को जोड़ा गया और अपना अपराध छिपाने के लिए उन्हें खूब गाढ़े-चटकीले रंग से पोतकर ईंटों के कच्चे-पक्के स्तम्भ बनाकर ताबड़तोड़ खड़ा कर दिया गया। हमने खुली आँखों से देखा कि उसके बाद वही ’अपराधी’ उन खंड-खंड जोड़कर खड़ी की गई शहीद प्रतिमाओं पर बेशर्मी से माल्यार्पण कर ’भारत माता की जय’ का उदघोष कर रहे थे।

देखने की बात यह है कि अभी चार महीने ही गुज़रे हैं कि इन शहीद प्रतिमाओं के ऊपर चढ़ाया गया रंग-फुलेल तेजी से उतरने लगा है और जिन स्तम्भों पर उन्हें रखा गया था, उनमें लगाया गया घटिया प्लास्टर झड़ रहा है। डर है कि ये शहीद प्रतिमाएं जल्दी ही ज़मींदोज़ हो जाएंगी और तब इसका ज़िम्मेदार कौन होगा? प्रश्न यह है कि ’शहीदों की नगरी’ में उनकी सबसे पहले लगी इन भव्य प्रतिमाओं के साथ नाइंसाफ़ी करने वालों की शिनाख्त आख़िर अब तक क्यों नहीं हो सकी और मरम्मत के बाद तेजी से उखड़ रहे सीमेंट को देखकर लगता कि इस स्मारक का तिलिस्म इतनी जल्दी क्यों दरकने लगा है?

काकोरी शहीदों की यह तीनों भव्य प्रतिमाएं 'स्वतंत्रता के रजत जयंती वर्ष' (1972) तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष वासुदेव गुप्ता ने स्थापित कराई थीं, जो 42 के आंदोलन में जेल भी गए थे। उसी समय इस शहीद प्रतिमाओं के दक्षिण की ओर के मैदान में ’शहीद द्वार’ का निर्माण कराकर स्वतंत्रता सेनानी और ’साथी’ साप्ताहिक के सम्पादक श्याम सिंह ’बागी’ ने ’शहीद मेला’ का आयोजन किया, जिसका उदघाटन पेशावर क्रांति के नायक चंद्रसिंह गढ़वाली ने किया था।

फोटो कैप्शन- प्रतिमा-स्थल को तोड़े जाने से पूर्व का दृश्य

टाउन हॉल कहे जाने वाले शहर के इस केंद्रीय स्थान के निकट गांधी भवन सभागार, दो मिनट के फासले पर है आर्य समाज का ’बिस्मिल कक्ष’ (जहां वे रहते थे) और थोड़ी दूर आगे बिस्मिल के जन्म का मोहल्ला खिरनी बाग। न जाने कितने पुराने क्रांतिकारी, देश भर के साहित्यकार, चिंतक और रंगकर्मी काकोरी शहीदों के इन प्रतिमाओं पर आकर श्रद्धावान होते रहे, उस स्थल को शहर में सौन्दर्यकरण के नाम पर 23 मार्च 2026 की भोर होते तक पूरी तरह सपाट जगह में बदल दिया गया। विडंबना ही है कि 23 मार्च शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है!

मलबे में पड़ा हुआ अशफ़ाक का ’कटा हुआ सिर’, रोशन सिंह का ज़मींदोज़ पड़ा ’धड़’ और बिस्मिल ने नाम का क्षतिग्रस्त ’इंकलाब’ हमें सन्नाटे में भर गया। ओ मेरे शहर के बदनसीब शहीदों (?) तुम्हारी बस्ती में तुम्हें फिर से मृत्यु-दंड की सजा दे दी गई और इस बार ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ तनी रही तुम्हारी मजबूत गर्दनों पर मौजूदा स्वतंत्र भारत की सरकार के जल्लादी बुल्डोजर का शिकंजा था।

शहीदों हम शर्मिंदा हैं!

Sudhir Vidyarthi

Sudhir Vidyarthi

हिन्दी के चर्चित लेखक सुधीर विद्यार्थी का जन्म: 1 अक्टूबर, 1953 को पीलीभीत में पैतृक घर शाहजहाँपुर के ख़ुदागंज गाँव में हुआ है। इतिहास पर इनका लेखन विशद है। इनकी महत्वपूर्ण प्रकाशित कृतियाँ: अशफ़ाक़उल्ला और उनका युग, शहीद रोशनसिंह, उत्सर्ग, हाशिया, मेरा राजहंस, शहीद अहमदउल्ला शाह, आमादेर विप्लवी, भगतसिंह की सुनें (पंजाबी में भी अनूदित), शहीद भगतसिंह इन्क़लाब का सफ़र, पहचान बीसलपुर, मेरे हिस्से का शहर, अग्निपुंज (शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की जीवन-कथा), अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद। सम्पादन: शहीद भगत सिंह : क्रान्ति का साक्ष्य, काला पानी का ऐतिहासिक दस्तावेज़, कर्मवीर पं. सुन्दरलाल : कुछ संस्मरण, शहीदों के हमसफ़र, अपराजेय योद्धा कुँवर भगवान सिंह, ग़दर पार्टी भगत सिंह तक, जब ज्योति जगी, बुन्देलखण्ड और आज़ाद, क्रान्तिकारी बटुकेश्वर दत्त, आज का भारत और भगत सिंह, क्रान्ति की इबारतें, ज़खीरे में शाहदत आदि हैं। उत्तर प्रदेश के कर्मचारी-मज़दूर आन्दोलन में 20 वर्ष तक सक्रिय भागीदारी व प्रदेशीय नेतृत्व। इसी के तहत दो बार जेल-यात्रा, कई मुक़दमे व यातनाएँ। परिवेश सम्मान से सम्मानित।