पंजाब विधानसभा चुनावों में अकाली दल अपनी ज़मीन बनाने में विफल क्यों?
कभी सत्ता में रहे अकाली दल के पास अब बस एक विधायक है
शिरोमणि अकाली दल भारत के पंजाब राज्य की एक Centre Right और सिखों पर केंद्रित राजनीतिक पार्टी है। 1920 में स्थापित यह पार्टी, कांग्रेस के बाद भारत की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी है। 'अकाली दल' नाम वाली कई पार्टियां हैं, लेकिन भारत के चुनाव आयोग द्वारा "शिरोमणि अकाली दल" को मान्यता प्राप्त है जिसका नेतृत्व सुखबीर सिंह बादल करते हैं।

अकाली दल का गठन 1920 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की एक टास्क फोर्स के रूप में किया गया था। 26 सितंबर 2020 को, कृषि बिलों को लेकर उसने नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) छोड़ दिया।
1937 के प्रांतीय चुनाव में अकाली दल ने 10 सीटें जीतीं। खालसा नेशनलिस्ट्स ने 11 सीटें जीतीं और यूनियनिस्ट नेता सिकंदर हयात खान के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल हो गए। अकाली दल विपक्ष में रहा और उसने मुस्लिम लीग के साथ समझौता करने की कभी-कभार कोशिशें कीं, लेकिन वे कभी सफल नहीं हो पाईं।

1946 के प्रांतीय चुनाव में अकाली दल ने 22 सीटें जीतीं और इंडियन नेशनल कांग्रेस के साथ मिलकर यूनियनिस्ट खिजर हयात खान टिवाना के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल हो गया। सत्ता का लक्ष्य हमेशा शिरोमणि अकाली दल का रहा लेकिन प्रदेश तक सीमित ही रहा। राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार नहीं कर पाए। शिरोमणि अकाली दल जब से स्थापित हुआ है इसमें 23 बार लगभग अभी तक बार बार आपसी टकराव के चलते विभाजन हुआ और बहुत से गुट वापस शामिल भी हो गए। 1996 में प्रकाश सिंह बदल इसके प्रधान बने और 12 साल बाद 2008 में प्रकाश सिंह बादल ने अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को इसका प्रधान बनाया , 28 साल से शिरोमणि अकाली दल अब बादलों के की अध्यक्षता में है।

वर्तमान में लोकसभा में केवल एक सांसद हरसिमरत कौर बादल और विधान सभा में केवल एक विधायक गुनीव कौर मजीठिया है।
शिरोमणि अकाली दल पारम्परिक रूप से धर्म की राजनीति करने वाली दक्षिणपंथी पूंजीपति समर्थित भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी दल केंद्र और राज्य में रहा है। सिख पंथ के सिद्धांतों और किसान वर्ग के हितों की राजनीति करने वाली पार्टी का यह विरोधाभास समय के साथ और दृढ़ होता रहा है। शिरोमणि अकाली दल कभी इस पहली को सुलझा नहीं पाया या सत्ता के लिए सुलझाना नहीं चाहता यह सवाल निरन्तर साया बन कर साथ चलता है।
1951 में पहली लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल ने 4 सीटें जीती ,1977 में 9 सीटों पर जीत हासिल की थी। 1984 में 7 सीट और 1996 , 1998 , 2004 में 8 -8 -8 सीट जीती थी। 2009 ,2014 में 4 -4 सीट पर जीत हासिल हुई। पंजाब प्रदेश में शिरोमणि अकाली दल ने पहली बार सरकार 1969 मुख्यमंत्री गुरनाम सिंह के नेतृत्व में बनाई। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में 1977 में बहुमत की सरकार बनाई। अकाली दल का 1985 से 1997 क स्वर्णिम काल कहा जा सकता है जब विधानसभा की 117 सीटों में से 73 ( सुरजीत सिंह बरनाला ) और 75 ( प्रकाश सिंह बादल ) सीटों पर जीत हासिल की।
अक्टूबर 2026 की शुरुआत में शिरोमणि अकाली दल (SAD) की स्थिति को न तो “खत्म हो चुका दल” कहना उचित है और न ही यह मानना कि वह अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव में लौट चुका है। सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में पार्टी अपना पारंपरिक Panthic आधार वापस पाने, संगठन को पुनर्जीवित करने और 2027 से पहले अपने लिए पर्याप्त राजनीतिक स्थान बनाने की कोशिश कर रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में SAD ने पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक सीट—बठिंडा—जीती। उसका राज्यव्यापी वोट शेयर लगभग 13.4% रहा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 13.4% वोट किसी राजनीतिक दल को समाप्त नहीं करते; लेकिन बहुकोणीय मुकाबलों इतने वोटों से अकेले सत्ता की स्थिति तक पहुंच पाना संभव नहीं।

शिरोमणि अकाली दल ने 2026 में अपनी राजनीति को काफी हद तक फिर से “Panth + Punjab” के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है। फरवरी 2026 से उसने लगभग 40 “पंजाब बचाओ ” रैलियों का कार्यक्रम पुरे प्रदेश में शुरू कर दिया था।
अब शिरोमणि अकाली दल (बादल) के सामने चुनौती यह भी है कि क्या वह केवल एक राजनीतिक पार्टी है या पंजाब की पंथक राजनीतिक आवाज भी है। क्योंकि पंजाब में पंथक राजनीति का स्थान अब पहले जैसा एकाधिकार वाला नहीं है। 2022 में की चुनावी हार के बाद सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व को लेकर असंतुष्ट अकाली नेताओं का एक बड़ा धड़ा अलग हो गया था। 2 दिसम्बर 2025 को श्री अकाल तख्त की फ़सील से जारी हुए हुक्मनामे के बाद बदल धड़े से अलग शिरोमणि अकाली दल के पुनर्गठन की नींव भी रखी गयी जिसके परिणाम में अकाली दल फिर से अस्तित्व में आया और नेतृत्व श्री अकाल तखत के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह को सौंपा गया।

2026 में अकाली दल वारिस पंजाब दे भी अलग राजनीतिक मंच के रूप में सक्रिय है जिसका नेतृत्व वर्तमान निर्दलीय सांसद अमृतपाल कर रहे है जो असम में जेल में बंद है ।
यह परिस्थितियां संकेत देती हैं कि पंथक राजनीति में अब प्रतिस्पर्धा सघन हो गई है।
बेअदबी मामले में शिरोमणि अकाली दल (बादल) की भूमिका पर गहरे सवाल पंथक सियासत के समर्थकों में बने हुए हैं। पंजाब की मौजूदा राजनीति के संदर्भ में देखें, तो बेअदबी प्रकरण में शिरोमणि अकाली दल (बादल) की भूमिका पर उठते सवाल अब केवल 2015 की घटनाओं का इतिहास नहीं हैं वे 2027 के चुनाव से पहले अकाली दल की राजनीतिक विश्वसनीयता, पंथक राजनीति और नेतृत्व की स्वीकार्यता से जुड़े प्रश्न बन चुके हैं। सवाल बेअदबी से ज्यादा उसके बाद अकाली दल के कार्यकाल में की गई कार्रवाई पर है।
2015 में बरगाड़ी और आसपास गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के बाद पंजाब में व्यापक विरोध हुआ। 14 अक्टूबर 2015 को कोटकपूरा और बहबल कलां में पुलिस कार्रवाई हुई जिसमें बहबल कलां में दो प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। ये घटनाएं उस समय की हैं जब प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे और सुखबीर सिंह बादल प्रदेश के उप मुख्यमंत्री गृह मंत्री थे और भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार थी। तत्कालीन सरकार और प्रशासन की जवाबदेही का प्रश्न सीधे सामने आता है।
जस्टिस रणजीत सिंह कमीशन ने अपनी जांच में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की भूमिका को पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में जांच के दायरे में रखा था। आयोग के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री पुलिस और प्रशासन की गतिविधियों से अवगत थे। बाद में सुखबीर बादल ने इस रिपोर्ट को खारिज किया था।

अकाली नेतृत्व के लिए दूसरा संवेदनशील मुद्दा 2007 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को माफी मिलने का है। जस्टिस रणजीत सिंह कमीशन से संबंधित रिपोर्टों में यह आरोप सामने आया कि बादल परिवार ने डेरा प्रमुख के लिए अकाल तख्त से माफी की प्रक्रिया में भूमिका निभाई थी। यही कारण है कि अकाली दल के विरोधी और उससे अलग हुए अकाली धड़े इसे केवल एक पुरानी घटना नहीं मानते बल्कि शिरोमणि अकाली दल के पंथक राजनीतिक सिद्धांतों की अवहेलना के रूप में देखते हैं ।
जुलाई 2026 में SIT ने सुखबीर सिंह बादल को बहबल कलां और कोटकपूरा फायरिंग मामलों में पूछताछ के लिए बुलाया। सितंबर में उन्हें फिर बुलाया गया। यह लगभग आठ वर्षों में पांचवीं बार SIT के सामने पेशी थी।
शिरोमणि अकाली दल (बादल) के लिए कठिनाई यह है कि जिस नशे के मुद्दे को वह आज आम आदमी पार्टी के खिलाफ उठा रहा है, उसी मुद्दे पर उसे अपने पुराने शासनकाल से जुड़े आरोपों और आलोचनाओं का जवाब भी देना है । अकाली दल के बड़े चेहरे और सुखबीर बदल के 30 सितंबर 2026 को बिक्रम सिंह मजीठिया को पुराने synthetic-drug मामले में SIT ने पूछताछ के लिए बुलाया है। यह मामला राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है, हालांकि किसी जांच/आरोप को दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।
अकाली दल की मूल राजनीति लंबे समय से पंथ, पंजाब के अधिकार और सिख संस्थाओं की रक्षा के इर्द-गिर्द रही है। जिस राजनीतिक दल की वैचारिक राजनीति पंथक भावनाओं और सिख संस्थाओं की रक्षा पर आधारित रही, उसी के शासनकाल में हुई बेअदबी और उसके बाद पुलिस कार्रवाई आज भी उसके नेतृत्व से जवाबदेही के प्रश्न पूछती है।
केंद्र सरकार ने जून 2020 में कृषि संबंधी तीन अध्यादेश जारी किए थे। उस समय शिरोमणि अकाली दल केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी थी और हरसिमरत कौर बादल केंद्रीय मंत्रिमंडल में खाद्य प्रसंस्करण मंत्री थीं। अध्यादेश आने के शुरुआती दौर में अकाली नेतृत्व ने उनका बचाव किया था। 28 अगस्त 2020 के आसपास सुखबीर बादल ने तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के उस आश्वासन का हवाला दिया था कि MSP पर सरकारी खरीद जारी रहेगी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर किसानों को भ्रमित करने का आरोप लगाया था।

जब पंजाब में किसान संगठनों का आंदोलन तेज हो हुआ और गांवों में राजनीतिक दलों के नेताओं को लेकर विरोध बढ़ रहा था तब शिरोमणि अकाली दल अपनी गलती सुधारने की कवायद में लगा। अकाली दल ने गठबंधन तोड़ने के लिए MSP और कृषि विपणन व्यवस्था से जुड़े किसानों के हितों को प्रमुख कारण बताया। लेकिन सवाल यह है:जब अकाली दल के लिए किसान हित इतना बुनियादी मुद्दा था कि कानूनों के सामने आते ही गठबंधन तोड़ दिया जाना चाहिए था तो भी अकाली दल कानूनों का समर्थन करता दिखा। पंजाब में किसान आंदोलन केवल कृषि नीति का आंदोलन नहीं रहा। उसने ग्रामीण पंजाब में राजनीतिक दलों के प्रति दृष्टिकोण को भी प्रभावित किया जिसका खामियाजा 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को भुगतना पड़ा।
वर्तमान परिस्थितियों में शिरोमणि अकाली दल (बादल) फिर से भारतीय जनता पार्टी से चुनावी गठबंधन की अपेक्षा को बनाये हुए है। यही सैद्धांतिक राजनीतिक विरोधाभास शिरोमणि अकाली दल की मौजूदा हालत का कारक है। 2027 के विधानसभा चुनाव इस से अछूते नहीं रहेंगे।
Jagdeep Singh Sindhu
वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विवेचक जगदीप सिंह सिंधू राष्ट्रीय हिंदी दैनिक हरिभूमि,पीपल्स समाचार,महाकौशल आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। वह एफ एम रेडियो तरंग 104 के पूर्व स्टेशन हेड तथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।