शरजील इमाम और मुस्लिम सियासत का आत्ममंथन
आज मुस्लिम सियासत को ऐसी क़यादत की ज़रूरत है जो तालीम, रोज़गार, आर्थिक तरक़्क़ी और सियासी नुमाइंदगी के मसाइल पर ठोस रणनीति पेश करे।
किसी मुसलमान के साथ नाइंसाफ़ी हो, तो उसके हक़ में आवाज़ उठाना ज़रूरी है। लेकिन क्या इंसाफ़ की यह मांग हमें उसकी हर बात का समर्थक भी बना देती है? क्या किसी शख़्स की मज़हबी पहचान उसके विचारों को आलोचना से ऊपर कर देती है? अगर कोई ग़ैर मुस्लिम संविधान और जम्हूरी उसूलों के ख़िलाफ़ बात करे, तो हम उसका विरोध करते हैं लेकिन वही बात कोई मुस्लिम रहनुमा कहे, तो क्या हमारा रवैया बदल जाना चाहिए? अगर हमारे उसूल शख़्स की पहचान देखकर बदलते हैं, तो सवाल सिर्फ़ उस शख़्स के विचारों का नहीं, हमारी अपनी फ़िक्री ईमानदारी का भी है जिस पर हमे गौर करना चाहिए और अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम निष्पक्ष हैं?
शरजील इमाम के इंटरव्यू और तिहाड़ जेल से लिखे उनके लेख ने मुस्लिम सियासत, सेक्युलरिज़्म और सियासी नुमाइंदगी को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। उनके विचारों से इत्तेफ़ाक़ रखने वाले भी हैं और उनसे इख़्तिलाफ़ करने वाले भी। लेकिन इस बहस के बीच एक बुनियादी सवाल है, जिस पर संजीदगी से ग़ौर होना चाहिए क्या किसी शख़्स के साथ इंसाफ़ की मांग करने का मतलब उसके हर विचार का समर्थन करना है? इसका जवाब साफ़ है। इंसाफ़ और विचारों की ताईद दो अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई और क़ानूनी हुक़ूक़ मिलना चाहिए, लेकिन इससे उसके तमाम सियासी नज़रिये आलोचना से ऊपर नहीं हो जाते। यह उसूल शरजील इमाम पर भी लागू होता है और हर दूसरे सियासतदान या विचारक पर भी।
शरजील इमाम ने मुस्लिम सियासी नुमाइंदगी, कांग्रेस की भूमिका, सेक्युलर सियासत और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे अहम मौज़ू उठाए हैं। इन पर बहस होनी चाहिए। क्या मुसलमानों को सियासत में पर्याप्त नुमाइंदगी मिल रही है? क्या सेक्युलर पार्टियां उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेती हैं? क्या मौजूदा चुनावी निज़ाम में सुधार की गुंजाइश है? ये जायज़ सवाल हैं। लेकिन किसी तजज़िये में कुछ सही सवाल होने का अर्थ यह नहीं कि उसके तमाम नतीजों को भी बग़ैर जांचे-परखे क़ुबूल कर लिया जाए।
मुस्लिम समाज की एक बड़ी समस्या यह है कि वह अपने हुक़ूक़ के सवाल पर तो आवाज़ उठाता है, लेकिन अपनी क़यादत और फ़िक्री रहनुमाओं के विचारों का आलोचनात्मक जायज़ा लेने से गुरेज़ करता है। अगर कोई ग़ैर मुस्लिम सियासतदान संविधान या जम्हूरी उसूलों के ख़िलाफ़ बात करता है, तो उसकी आलोचना की जाती है। लेकिन अगर वैसी ही बात कोई मुस्लिम रहनुमा कहे, तो क्या हमारा मेयार बदल जाना चाहिए? अगर ऐसा है, तो यह उसूलों के बजाय पहचान की बुनियाद पर पक्षधरता है।

किसी मुसलमान से इख़्तिलाफ़ करना मुस्लिम समाज की मुख़ालफ़त नहीं है। उसी तरह किसी मुसलमान के साथ इंसाफ़ की मांग करना उसके हर विचार की ताईद करना भी नहीं है। संविधान, क़ानून और जम्हूरियत के उसूल किसी की मज़हबी पहचान देखकर नहीं बदल सकते। संविधान के किसी प्रावधान की आलोचना करना या चुनावी सुधार की मांग करना जम्हूरी बहस का हिस्सा है, लेकिन ऐसे प्रस्तावों को तथ्यों, दलीलों और उनके संभावित नतीजों की कसौटी पर परखना भी ज़रूरी है।
इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है। जब किसी समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाला व्यक्ति कोई विवादित बयान देता है और उसके समर्थक हर हाल में उसका दिफ़ा करने लगते हैं, तो आलोचकों को उस बयान को पूरे समुदाय की सोच बताने का मौक़ा मिल सकता है। हालांकि, किसी एक व्यक्ति के विचारों के आधार पर पूरे मुस्लिम समाज को ज़िम्मेदार ठहराना भी नाइंसाफ़ी है। किसी व्यक्ति की राय और पूरे समुदाय की सोच में फ़र्क़ करना उतना ही ज़रूरी है, जितना किसी व्यक्ति के विचारों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना।
इसका हल ख़ामोशी या अंधी मुख़ालफ़त नहीं, बल्कि उसूली और दलील पर आधारित बहस है। हमें साफ़ कहना चाहिए कि हम इंसाफ़ के साथ हैं, मगर किसी की हर बात के साथ नहीं। हम अपने हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त करते हैं, मगर दूसरों के हुक़ूक़ का भी एहतराम करते हैं। और जिस तरह हम दूसरे सियासी रहनुमाओं से जवाबदेही की मांग करते हैं, उसी तरह अपने रहनुमाओं को भी आलोचना से ऊपर नहीं रख सकते।
आज मुस्लिम सियासत को ऐसी क़यादत की ज़रूरत है जो तालीम, रोज़गार, आर्थिक तरक़्क़ी और सियासी नुमाइंदगी के मसाइल पर ठोस रणनीति पेश करे। मुस्लिम समाज को ऐसी क़यादत चाहिए जो उसके हुक़ूक़ के लिए आवाज़ उठाए, लेकिन साथ ही अपने प्रस्तावों को तर्क और तथ्यों के आधार पर पेश करे। ऐसी क़यादत जो अपने समर्थकों को सवाल पूछने की आज़ादी दे और आलोचना को अपनी कमज़ोरी के बजाय सुधार का मौक़ा समझे।
किसी रहनुमा का मूल्यांकन सिर्फ़ इस बुनियाद पर नहीं होना चाहिए कि वह हमारी पहचान से जुड़े मुद्दे उठाता है। यह भी देखना चाहिए कि उसके प्रस्ताव कितने कारगर हैं, उसकी दलीलें कितनी मज़बूत हैं और उसके विचार जम्हूरी उसूलों के साथ किस हद तक मेल खाते हैं। मुस्लिम समाज के अंदर ऐसी फ़िक्री संस्कृति को फ़रोग़ देना होगा जिसमें इख़्तिलाफ़ की गुंजाइश हो, शोध को अहमियत दी जाए और किसी विचार की आलोचना को व्यक्तिगत दुश्मनी न समझा जाए। यह रवैया केवल मुस्लिम समाज के लिए ही नहीं, बल्कि हर जम्हूरी समाज के लिए ज़रूरी है।
Dr. Shujaat Ali Quadri
लेखक, मुस्लिम यूथ ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के संयोजक और कम्यूनिटी लीडर है, साथ ही सूफिज़्म और मुस्लिम मामलों पर लगातार लिखते रहते हैं.
