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क्या खत्म हो जाएगा नेतन्याहू का 19 साल लंबा राजनीतिक सफर, इस चुनाव में क्या हैं इजराइल के मुख्य मुद्दे?

Md. Tousif Md. Tousif | 54m ago · 5 min read
क्या खत्म हो जाएगा नेतन्याहू का 19 साल लंबा राजनीतिक सफर, इस चुनाव में क्या हैं इजराइल के मुख्य मुद्दे?

19 साल तक इज़राइली सत्ता के शीर्ष पर रहने के बाद नेतन्याहू इस बार मुश्किल में ज़रूर दिख रहे हैं

इज़राइल में 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद आज, 27 अक्टूबर 2026 को पहली बार संसदीय चुनाव हो रहा है। मौजूदा इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस चुनाव में अपनी राजनीतिक सत्ता बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। 19 साल तक इज़राइली सत्ता के शीर्ष पर रहने के बाद नेतन्याहू इस बार मुश्किल में ज़रूर दिख रहे हैं, लेकिन अब भी वे प्रधानमंत्री पद के अहम दावेदार माने जा रहे हैं। चुनाव से पहले हुए अब तक के ज़्यादातर सर्वे में नेतन्याहू को बहुमत से दूर बताया गया है। हालांकि, गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहा उनका प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गठबंधन भी बहुमत के आंकड़े तक पहुँचता नहीं दिख रहा है। फिर भी, ज़्यादातर सर्वे में उसे नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन से ज़्यादा सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस चुनाव में कहा जा रहा है कि आइज़ेनकोट को दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी, दोनों तरह के मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है।

यह चुनाव 1948 में इज़रायल की स्थापना के बाद के सबसे उथल-पुथल भरे दौरों में से एक के बाद हो रहा है। इसकी पृष्ठभूमि में 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले, उसके बाद ग़ज़ा में इज़रायली सेना की कार्रवाई और नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार की नीतियों को लेकर देश के भीतर गहरे मतभेद हैं। नेतन्याहू के कई विरोधियों के लिए चुनाव का सबसे अहम मुद्दा 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान हुई सुरक्षा चूक की जवाबदेही है।

एक और महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा सेना में हरेदी समुदाय के यहूदियों की भर्ती को लेकर है। इज़राइल में ज़्यादातर यहूदियों के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य है। लेकिन 1948 में देश की स्थापना के बाद हरेदी समुदाय के 400 लोगों को धार्मिक संस्थानों में पढ़ाई जारी रखने के लिए सैन्य सेवा से छूट दी गई थी। इस फैसले का मकसद धार्मिक विद्वानों की पढ़ाई और यहूदी धार्मिक परंपराओं को बनाए रखना था। लेकिन समय के साथ इस छूट का दायरा बढ़ता गया और अब यह इज़राइल की राजनीति में एक बड़ा विवाद बन चुका है। दूसरे समुदायों के लोगों का तर्क है कि जब देश युद्ध जैसे हालात से गुज़र रहा है, तो सेना में सेवा देने की ज़िम्मेदारी सभी को निभानी चाहिए। वहीं, नेतन्याहू को हरेदी समुदाय का समर्थन मिलता है, इसलिए वे इस छूट को बरकरार रखने के पक्ष में हैं। इसके उलट, पूर्व सेना प्रमुख और नेतन्याहू के प्रमुख विपक्षी नेता गादी आइज़ेनकोट चाहते हैं कि हरेदी समुदाय के लोग भी सेना में भर्ती हों या नागरिक सेवा में योगदान दें।

नेतन्याहू पर अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों पर पाबंदी लगाने या उन्हें कम करने के भी आरोप लगे हैं। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बड़े टकराव की वजह बना है। इसलिए मौजूदा चुनाव में यह भी एक मुद्दा है। इसके अलावा, ग़ज़ा में हमास पर पूरी तरह नियंत्रण का दावा भी नेतन्याहू पूरा नहीं कर पाए हैं और लेबनान में हिज़्बुल्लाह अब भी सक्रिय है। ये सारे मुद्दे भी इस चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं।

इन्हीं सारे मुद्दों में घिरे नेतन्याहू ने ट्रंप से मदद की अपील की थी। Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने चुनाव से पहले ट्रंप से अपने समर्थन में और बयान देने की अपील की है। एक अमेरिकी सूत्र और एक इज़रायली सूत्र के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि नेतन्याहू ने तीन दिनों में ट्रंप से दो बार बात की और उनसे अपने समर्थन में पहले दिए गए बयान को और मज़बूत करने को कहा।

इसके बाद बीते रविवार शाम ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच Truth Social पर एक और बयान जारी कर इज़रायल के मतदाताओं से नेतन्याहू को वोट देने की अपील की। उन्होंने ईरान के खिलाफ नेतन्याहू के सख़्त रुख का समर्थन करते हुए उन्हें एक मज़बूत प्रधानमंत्री बताया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और इज़रायल को मिलकर अपना काम पूरा करना है। इससे पहले भी उन्होंने नेतन्याहू का समर्थन किया था और संकेत दिया था कि उनकी हार का अमेरिका-इज़रायल संबंधों पर असर पड़ सकता है।

वहीं, कल इज़रायली मीडिया में नेतन्याहू और IDF प्रमुख इयाल ज़मीर के बीच मनमुटाव की खबरें भी छाई रहीं। दरअसल, विपक्षी नेता नेतन्याहू पर आरोप लगा रहे हैं कि वे चुनाव को प्रभावित करने के लिए ईरान पर दोबारा हमले कर सकते हैं। इसी बीच, कल Times of Israel ने Channel 12 के हवाले से लिखा कि नेतन्याहू ने IDF प्रमुख को चुनाव से पहले ईरान पर हमले का आदेश दिया था, जिसे सेना प्रमुख ने यह कहते हुए मानने से इनकार कर दिया कि उन्हें नियमों के मुताबिक लिखित आदेश दिया जाए और उससे पहले सभी पक्षों के साथ चर्चा की जाए। इस खबर के सामने आने के बाद भी विपक्ष ने नेतन्याहू को घेरने की कोशिश की।

अब दुनियाभर की निगाहें 4 नवंबर के चुनावी नतीजों पर टिकी हैं। अगर नेतन्याहू यह चुनाव हार जाते हैं और गादी आइज़ेनकोट के रूप में इज़रायल को नया प्रधानमंत्री मिलता है, तो यह इज़रायल और विशेष रूप से मिडिल ईस्ट के लिए कितना अलग होगा, यह भी देखने वाली बात होगी।

WSJ ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्ष के प्रमुख उम्मीदवार गादी आइज़ेनकोट की कार्यशैली, पृष्ठभूमि और कई अहम मुद्दों पर सोच एक-दूसरे से काफी अलग है। लेकिन जिन मुद्दों पर पूरी दुनिया की नज़र है, जैसे ग़ज़ा का भविष्य, ईरान के साथ युद्ध और फिलिस्तीन को अलग देश बनाने का सवाल, उन पर दोनों नेताओं के बीच मतभेद उतने बड़े नहीं हैं।

नेतन्याहू पिछले 19 वर्षों से अलग-अलग समय पर इज़रायल की सत्ता संभालते रहे हैं। उनके सामने चुनौती पेश कर रहे आइज़ेनकोट की कई मुद्दों पर अलग राय है, लेकिन ग़ज़ा, ईरान और फिलिस्तीनी राष्ट्र के भविष्य को लेकर दोनों के रुख में काफी समानताएँ हैं।


Md. Tousif

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मोहम्मद तौसिफ़ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर नजर रखते हैं और ‘द क्रेडिबल हिस्ट्री’ में रिसर्चर के रूप में कार्यरत हैं।