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जामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ एक जुटता दिखाने का यही सही समय है

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 4 min read
जामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ एक जुटता दिखाने का यही सही समय है

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जिस प्रशासन को छात्रों का अभिभावक होना चाहिए था, लेकिन वह उनके अधिकारों और स्वतंत्रता को छीनता नज़र आ रहा है।

हाँ, ज़ुल्मतों के दौर के ही गीत गाए जाएँगे।

यह दृश्य CAA-NRC विरोध के समय को दोहराता प्रतीत होता है। उस दौर में भी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, बुद्धिजीवियों के बीच विचार-मंथन की समृद्ध विरासत वाली संस्था, आज छात्रसंघ को बहाल करने की छात्रों की जायज़ माँग पर ध्यान देने के मूड में नहीं दिख रही है। छात्रों को पुलिस की बर्बरता का सामना करना पड़ा। कई लोगों को शारीरिक चोटें आईं और इससे भी बढ़कर, उन्हें सरकार और प्रशासन की ओर से मानसिक आघात सहना पड़ा। जिस प्रशासन को छात्रों का अभिभावक होना चाहिए था, लेकिन वह उनके अधिकारों और स्वतंत्रता को छीनता नज़र आ रहा है। अब तक बातचीत का नतीजा यही निकला है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जनवरी के मध्य तक ऑनलाइन कक्षाएँ चलाने का फैसला किया है।

छात्रों ने पुलिस की बर्बरता की जाँच करने और दो छात्रों, इबिन बेसिल तथा जसाम खान, को जारी कारण बताओ नोटिस रद्द करने की माँग की। लेकिन प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है और पंद्रह दिनों के भीतर मामले की जाँच के लिए एक समिति बनाने की बात कही है।

विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य द्वारा शारीरिक हिंसा का इस्तेमाल छात्रों के बीच किसी भी तरह की बौद्धिक आवाज़ को दबाने की फासीवादी व्यवस्था की एक कोशिश है। इस तरह के इरादों को आगे बढ़ाने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और यहाँ तक कि बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को निशाना बनाया गया है। राज्य की मशीनरी का मकसद ऐसे संस्थानों के विचारशील विद्यार्थियों के बीच भय पैदा करना है, जहाँ वे कम खर्च में शिक्षा हासिल करते हैं और सत्ता में बैठे लोगों से गंभीर सवाल पूछ सकते हैं। सवाल पूछने की यही प्रवृत्ति फासीवादी रुझानों वाली सत्ता को परेशान करती है।

इन्हीं संस्थानों के छात्रों ने लगातार विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है। वे हमें 1968 के फ्रांस के वसंत और उस दौर की विद्रोही युवा पीढ़ी की याद दिलाते हैं। हमेशा सबसे ताक़तवर ही नहीं जीतता, बल्कि कई बार वे जीतते हैं जो आख़िरी साँस तक विरोध करते हैं, भले ही दुश्मन कुछ समय के लिए अजेय लगे। इन छात्रों को कठोर कारावास और यहाँ तक कि निलंबन जैसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने झुकने से इनकार कर दिया है।

ये छात्र संगठन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा वोटों की चोरी के आरोपों के ख़िलाफ़ देशव्यापी विरोध और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई संस्था, भारतीय चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने वाली आवाज़ों का भी हिस्सा हैं। यह मुद्दा दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ दिए गए बयानों और द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मद्देनज़र सामने आया।

विश्वविद्यालय परिसर और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा के मद्देनज़र भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू कर दी गई है। यह पहले CrPC की धारा 144 के नाम से जानी जाती थी। इसके तहत चार या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर पाबंदी लगाई जा सकती है।

अगर यह एक आदर्श दुनिया होती, तो छात्र संगठनों और नागरिक समाज के दबाव समूहों समेत सभी संगठन अपने मतभेद भुलाकर एक साथ आते, प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की माँग करते और भारतीय जनता पार्टी के मूल संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), की जाँच की माँग उठाते। इन्हीं संगठनों से जुड़े कुछ लोग विरोध स्थलों पर हंगामा करने, प्रदर्शनकारियों की जायज़ माँगों को भटकाने और आंदोलन को अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में पुलिस और न्यायपालिका की भूमिका की भी पूरी तरह जाँच होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि कहीं वे इस अवैध और अन्यायपूर्ण सरकार की कार्रवाइयों में सहयोगी तो नहीं बन रहे हैं।

हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, अब समय आ गया है कि हम अपने उस वादे को पूरा करें, जो हमने नियति के साथ किया था। हम किनारे बैठकर छात्रों और नागरिक समाज को राज्य की मशीनरी की कठोर ताक़तों का शिकार होते हुए नहीं देख सकते।

ब्राज़ील में लूला की जीत और सर्बिया में सरकार के पतन जैसी घटनाओं से दुनिया भर में संघर्ष कर रहे छात्रों, बुद्धिजीवियों और जेलों में बंद लोगों को उम्मीद मिलनी चाहिए। इन लोगों ने फ़िलिस्तीन में नरसंहार, ईरान और लेबनान में अवैध तथा अनैतिक बमबारी और इज़राइल व अमेरिकी राज्य द्वारा किए जा रहे युद्ध अपराधों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। यह उम्मीद बनी रहनी चाहिए कि सत्ता की ताक़त को चुनौती देना असंभव नहीं है। हैदर का नाम लेने और ज़ुल्फ़िकार को पकड़ने का समय आ गया है। हमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि उन्होंने दुनिया भर में साम्राज्यवादी ताक़तों और सामंती कुलीनतंत्र के शिकार लोगों की आवाज़ उठाई है।

न हम-सफ़र, न किसी हम-नशीं से निकलेगा

हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा


लेखक- वरुणकांत शर्मा

लेखक राजस्थान हाईकोर्ट में 2018 से वकालत की प्रैक्टिस कर रहे हैं।