क्या टाटा ट्रस्ट को कमजोर करने की हो रही कोशिश, राहुल गांधी ने क्यों लिया अमित शाह का नाम?
राहुल गांधी जो कह रहे हैं, वह यह है कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से टाटा समूह की कंपनियों पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है
राहुल गांधीने हाल ही में X पर कहा कि “टाटा को आपराधिक तरीके से खत्म किया जा रहा है और उद्योगपतियों में एक शब्द बोलने की भी हिम्मत नहीं है। आखिर कब तक आप चुप रहेंगे? जब तक वे आपको निगल नहीं जाते? भारतीय उद्योगपति मोदी और शाह के खिलौने नहीं हैं। आपमें हिम्मत नहीं है। हममें है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इन अपराधों के लिए न्याय हो।” इस बात को जरा ठीक से समझते हैं।
एक टाटा ट्रस्ट है। वह परोपकार का काम करता है। यानी प्राकृतिक आपदाओं में राहत, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं की सहायता करता है और स्वयं भी ये काम करता है। यह टाटा ट्रस्ट टाटा संस नामक कंपनी में लगभग 66 प्रतिशत शेयर रखता है। यानी टाटा संस जो मुनाफा कमाती है, उसमें से मिलने वाले डिविडेंड का 66 प्रतिशत हिस्सा उसे मिलता है और यह रकम समाज की भलाई के लिए खर्च की जाती है। टाटा ट्रस्ट की स्थापना जमशेदजी टाटा ने 1894 में की थी। इसका अप्रत्यक्ष अर्थ यह होता है कि टाटा समूह की कंपनियाँ जो भी मुनाफा कमाती हैं, उसका अधिकांश हिस्सा समाज के कल्याण के लिए खर्च करना उसका उद्देश्य है।
अब टाटा संस 1917 में स्थापित, कंपनी कानून के तहत पंजीकृत एक निजी कंपनी है। वह टाटा समूह की सभी कंपनियों में बहुमत शेयर रखती है। यानी उसे टाटा समूह की कंपनियों का मालिक कहा जा सकता है। पिछले वर्ष उसकी शुद्ध आय लगभग 26,000 करोड़ रुपये थी। हालाँकि, टाटा संस कंपनी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज या नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं है। रिजर्व बैंक टाटा संस को अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी मानता है और इसलिए उसके नियमों के तहत टाटा संस का शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी है। यानी उसे प्राथमिक शेयर बाजार में जनता के लिए पब्लिक शेयर इश्यू जारी करना पड़ता है। टाटा संस ने अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण रद्द करने के लिए रिजर्व बैंक से अनुरोध किया था और रिजर्व बैंक ने वह अनुरोध ठुकरा दिया। इसलिए टाटा संस को अब तीन वर्षों में पब्लिक इश्यू लाना पड़ेगा।
टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस के 66 प्रतिशत शेयर हैं और उसके अध्यक्ष नोएल टाटा हैं। नोएल टाटा, रतन टाटा के चचेरे भाई हैं। वे इस पब्लिक इश्यू का विरोध करते हैं और टाटा संस के अध्यक्ष नटराजन चंद्रशेखरन को पब्लिक इश्यू लाने में कोई आपत्ति नहीं है। यानी वे रिजर्व बैंक की बात मानने के लिए तैयार हैं। अब इस तरह टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के बीच विवाद चल रहा है। अब यदि टाटा संस पब्लिक इश्यू लाती है, तो टाटा ट्रस्ट के पास जो 66 प्रतिशत मालिकाना हिस्सा है, वह कम हो जाएगा और फिर उसके नियमन तथा प्रबंधन में सेबी और रिजर्व बैंक का प्रवेश हो जाएगा। नोएल टाटा का तर्क यह है कि यदि ऐसा हुआ, तो टाटा की कंपनियों के शेयर बाजार के भाव का महत्त्व बढ़ जाएगा और पिछले 150 वर्षों से वह जिस परोपकारी उद्देश्य के साथ काम कर रही है, उसके कमजोर पड़ जाने की संभावना बढ़ जाएगी। फिलहाल टाटा ट्रस्ट पूरे देश के 338 जिलों में काम करने वाली 300 संस्थाओं को करोड़ों रुपये की सहायता देता है।
टाटा ट्रस्ट के पहले अध्यक्ष स्वयं जमशेदजी टाटा थे और दूसरे अध्यक्ष रतन टाटा थे। अब उनके चचेरे भाई नोएल टाटा हैं। जब तक रतन टाटा थे, तब तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह कुछ भी करने की हिम्मत नहीं कर सके। रतन टाटा का अक्टूबर 2024 में निधन हो गया। लेकिन अब लगता है कि उन्होंने देश की एक अत्यंत प्रतिष्ठित कंपनी में घुसपैठ करने का रास्ता खोज निकाला है।

रिजर्व बैंक ने जिस NBFC का टर्नओवर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो, उसके लिए पब्लिक इश्यू अनिवार्य बनाने वाला नियम अभी हाल ही में जुलाई 2026 में बनाया। भारत में ऐसी कुल 17 कंपनियाँ ही हैं। इसका अर्थ ऐसा निकलता है, मानो टाटा संस को फँसाने के लिए ही रिजर्व बैंक द्वारा यह नियम बनाया गया हो। और रिजर्व बैंक का मतलब मोदी सरकार है। क्योंकि रिजर्व बैंक अपनी सारी स्वायत्तता तो बहुत पहले ही खो चुका है। अब यदि टाटा संस का पब्लिक इश्यू शेयर बाजार में आता है, तो एलआईसी जैसी सरकारी कंपनियाँ भी उसमें शेयर खरीद लेंगी और इस तरह टाटा संस पर सरकार का दबाव बढ़ जाएगा। कुछ लोग टाटा संस कंपनी का मूल्य लगभग 15 लाख करोड़ रुपये आँकते हैं। टाटा समूह की 30 से अधिक कंपनियाँ हैं, जिन पर टाटा संस का नियंत्रण है और यदि टाटा संस का पब्लिक इश्यू आता है, तो फिर उसमें सरकारी कंपनियों का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा।
पिछले साल 7 अक्टूबर को टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के लोग अमित शाह से उनके घर पर मिले थे। उस बैठक में बाद में निर्मला सीतारमण भी शामिल हुई थीं। सवाल यह है कि पूरा मामला रिजर्व बैंक, सेबी, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच का है, तो उसमें अमित शाह बीच में कहाँ से आ जाते हैं? वे तो गृह मंत्री हैं। पूरे मामले से गृह मंत्री का क्या लेना-देना है?टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के दिग्गज रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा या सेबी के अध्यक्ष तुहिनकांत पांडेय से क्यों नहीं मिलते और अमित शाह से मिलने उनके घर क्यों जाते हैं? क्या वे किसी दबाव में जी रहे हैं?
राहुल गांधी जो कह रहे हैं, वह यह है कि सरकार अप्रत्यक्ष रूप से टाटा समूह की कंपनियों पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती है और उसके करोड़ों रुपये के मुनाफे पर कब्जा करना चाहती है। राहुल गांधी का आरोप है कि सरकार अपने किसी चहेते उद्योगपति को टाटा समूह में घुसाना चाहती है। राहुल का सवाल यह है कि ऐसी कौन-सी कानूनी और वित्तीय बात है, जिसके लिए उन दोनों को अमित शाह से मिलने की जरूरत पड़ती है? यह सवाल वास्तव में बहुत महत्त्वपूर्ण है।भारत के कॉरपोरेट जगत के दिग्गज चुप क्यों हैं? सभी इतने डरे हुए क्यों हैं? महात्मा गांधी के साथ घनश्यामदास बिड़ला और जमनालाल बजाज थे। वे भी अंग्रेज सरकार से नहीं डरते थे। तो फिर आज बड़े उद्योगपति क्यों डरते हैं?
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।
