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ईरान युद्ध से पीठ दिखाकर भागने की फिराक में है अमेरिका?

Satish Verma Satish Verma | 08 Aug, 2026 · 5 min read
ईरान युद्ध से पीठ दिखाकर भागने की फिराक में है अमेरिका?

अमेरिका अब ईरान के साथ युद्ध से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है।

अमेरिका अब ईरान के साथ युद्ध से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। जिद और नाक बचाने की लड़ाई में अमेरिका काफी कुछ गंवा चुका है। हथियार के स्टॉक खत्म हो रहे हैं। एयर डिफेंस सिस्टम यानी मिसाइल भी अब अमेरिका के पास ज्यादा बचा नहीं तो ऐसी स्थिति में बीच लड़ाई में पीठ दिखाकर अमेरिका भाग तो नहीं सकता, इसलिए युद्ध से बाहर निकलने के अन्य विकल्प और रास्ते की तलाश में अमेरिका छटपटा रहा है।

CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने निजी तौर पर ट्रंप के अन्य शीर्ष सलाहकारों को साफ कर दिया है कि अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाशने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि संघर्ष को और बढ़ाने के लिए उपलब्ध सैन्य विकल्प उलटे पड़ सकते हैं और केवल हवाई हमलों के जरिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के घोषित लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल है।


सीएनएन को एक सूत्र ने साफ शब्दों में कहा,

केन युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। केन अकेले नहीं हैं जो मानते हैं कि युद्ध अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। उन्होंने CIA निदेशक जॉन रैटक्लिफ, विदेश मंत्री मार्को रुबियो और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कैबिनेट के अन्य प्रमुख अधिकारियों से भी संघर्ष बढ़ाने के सैन्य विकल्पों को लेकर अपनी चिंताओं पर चर्चा की है और युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाशने की बात उठाई है।

अमेरिका के शीर्ष जनरल ने हाल में ट्रंप प्रशासन के कुछ ऐसे ही विचार रखने वाले प्रमुख सलाहकारों के साथ अलग से बातचीत की है। इसका मकसद विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बनाना और राष्ट्रपति के साथ होने वाली बैठकों से पहले यह सुनिश्चित करना था कि सभी एक ही समझ के साथ आगे बढ़ें। इन चर्चाओं का उद्देश्य उपलब्ध सैन्य विकल्पों की सीमाओं और उनसे जुड़े खतरों को स्पष्ट करना था, जिनमें वे विकल्प भी शामिल हैं जिनमें अमेरिकी जमीनी सैनिकों को उतारने की जरूरत नहीं होगी।

ट्रंप लगातार ईरान में जमीनी सैनिक भेजने के विचार से बचते दिखाई दिए हैं। इसके बजाय उन्होंने संकेत दिया है कि उनका मानना है कि हवाई बमबारी के जरिए ईरान को उनकी शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर किया जा सकता है। लेकिन केन और ट्रंप कैबिनेट के कुछ अन्य अधिकारी निजी तौर पर इसे असंभव मानते हैं। इसके बजाय वे ऐसे दूसरे विकल्प तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं जो राष्ट्रपति की तय सीमाओं के भीतर हों।

युद्ध को शुरू हुए करीब छह महीने हो चुके हैं। इसकी शुरुआत इस दावे के साथ हुई थी कि ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी हद तक तबाह कर दिया गया है। युद्ध में राष्ट्रपति का मुख्य घोषित लक्ष्य तेहरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना रहा है। ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण है कि ट्रंप के सबसे वरिष्ठ जनरल निजी तौर पर यह कह रहे हैं कि उस युद्ध को खत्म करने का कोई आसान सैन्य समाधान नहीं है।

CNN ने जब इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया मांगी तो केन के प्रवक्ता जोसेफ होल्स्टेड ने कहा,

हम राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री या अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ चेयरमैन की गोपनीय बातचीत पर चर्चा नहीं करते। न ही हम उन गुमनाम सूत्रों द्वारा इन बातचीत को एजेंडा आधारित तरीके से पेश किए जाने पर टिप्पणी करते हैं, जो खुद इन चर्चाओं का हिस्सा नहीं थे।

युद्ध अब ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां ट्रंप के कई शीर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी, सैन्य सिद्धांतों, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के आकलन और सामान्य समझ के आधार पर वही मानते हैं जो केन ने पिछले महीने एक सार्वजनिक सुनवाई में सांसदों से कहा था

हवाई ताकत की अपनी सीमाएं होती हैं।” इन्हीं कारणों से केन और ट्रंप प्रशासन के अन्य अधिकारी जुलाई के आखिर में ज्यादा आक्रामक नए हमले शुरू करने की योजना को लेकर सतर्क थे। उन्हें आशंका थी कि संघर्ष बढ़ाने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। हालांकि राष्ट्रपति शुरुआत में उस अभियान को हरी झंडी देने के लिए तैयार दिखाई दिए थे, जिसे उन्होंने “विशाल” अभियान बताया था।

इस अभियान के पक्ष में केवल CENTCOM के कुछ तत्व थे। उसने यह भी बताया कि इजरायल भी संघर्ष को और बढ़ाने वाले अभियान का मोटे तौर पर समर्थन कर रहा था।

हालांकि, मध्य पूर्व के सहयोगी देशों से बातचीत के बाद ट्रंप ने आखिरकार पीछे हटने का फैसला किया। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के मुताबिक, इन देशों ने ट्रंप को बताया था कि उन्हें ईरान की जवाबी कार्रवाई का डर है, खासकर उनके ऊर्जा ढांचे पर संभावित हमलों का। अधिकारी ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ने भविष्य में इन हमलों की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है।

हाल के हफ्तों में केन संभावित अमेरिकी सैन्य विस्तार के दूसरे और तीसरे स्तर के प्रभावों को लेकर ज्यादा मुखर दिखाई दिए हैं। CNN पहले रिपोर्ट कर चुका है कि उन्होंने ट्रंप के साथ कम से कम दो हालिया बैठकों में अमेरिका के घटते गोला-बारूद के भंडार को लेकर खास तौर पर चिंता जताई थी। लेकिन इसी दौरान केन ने यह भी दोहराया कि अगर ट्रंप युद्ध को और बढ़ाने वाले अभियान को मंजूरी देते हैं तो अमेरिकी सेना ईरान को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। यह केन के लिए एक नाजुक संतुलन साधने जैसा है। निजी तौर पर वह लोगों से कहते रहे हैं कि वह देश के शीर्ष जनरल के पद और व्यापक रूप से अमेरिकी सेना में भरोसा बहाल करना चाहते हैं, जबकि ट्रंप पर दोनों का राजनीतिकरण करने के आरोप लगते रहे हैं।

हालांकि केन इस सोच में अकेले नहीं हैं। प्रशासन के भीतर कई लोग और बाहर के विश्लेषक भी इस बात पर सहमत हैं कि ईरान को निर्णायक रूप से हराने का एकमात्र तरीका बड़े पैमाने पर जमीनी सैनिकों वाला सैन्य अभियान होगा। ऐसे अभियान में हजारों अमेरिकी सैनिकों की जान जा सकती है। पेंटागन हर तरह के परिदृश्य के लिए योजना बनाता है, इसलिए ऐसी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन फिलहाल प्रशासन में कोई भी इतने कठोर कदम की वकालत नहीं कर रहा है।

इसलिए केन और अन्य अधिकारी लगातार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि ट्रंप को यह पता रहे कि अपेक्षाकृत कम आक्रामक सैन्य कदम भी नकारात्मक परिणाम पैदा कर सकते हैं। अब ध्यान ऐसे रास्ते की तलाश पर है जिससे राष्ट्रपति को कम से कम एक “प्रतीकात्मक” जीत मिल सके, जिसे वह अमेरिकी जनता के सामने उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें और साथ ही संभावित कूटनीतिक सफलता का रास्ता भी बंद न हो। इस दिशा में पहला कदम होर्मुज को दोबारा खोलने पर समझौता हो सकता है।

Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।