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मध्य प्रदेश में 21 करोड़ के क्रिप्टो करेंसी घोटाले में पकड़ा गया बीजेपी का नेता

TCN Desk TCN Desk | 09 Aug, 2026 · 5 min read
मध्य प्रदेश में 21 करोड़ के क्रिप्टो करेंसी घोटाले में पकड़ा गया बीजेपी का नेता

भाजपा के इस नेता पर 21.06 करोड़ रुपये की क्रिप्टोकरेंसी घोटाले की रकम को ठिकाने लगाने का आरोप है।

चोर, ठग, घोटालेबाज और अपराधियों की शरणस्थली बनती जा रही है भाजपा। अपराध करो और भाजपा के वाशिंग मशीन में आकर साफ-सफ्काक होकर निकल जाओ। अब एक नया मामला मध्य प्रदेश से आया है जिसमें बीजेपी के नेता सह जिला पंचायत सदस्य साइबर ठगी करते हुए पकड़ा गया है। भाजपा के इस नेता पर 21.06 करोड़ रुपये की क्रिप्टोकरेंसी घोटाले की रकम को ठिकाने लगाने का आरोप है।


इस साइबर ठगी का पर्दाफाश एक साधारण-से व्हाट्सऐप संदेश—“हैलो, मैं दिव्या बोल रही हूं”—से शुरू हुआ लेकिन धीरे-धीरे यह मध्य प्रदेश के अब तक के सबसे बड़े साइबर ठगी का मामला बन गया। मध्य प्रदेश साइबर पुलिस को इस मामले में बड़ी सफलता तब मिली, जब उसने शाजापुर के बीजेपी नेता और जिला पंचायत सदस्य जगदीश कुमार मालवीय को गिरफ्तार किया। जांच के दौरान ठगी की रकम में से 50 लाख रुपये उसके बैंक खाते तक पहुंचने का पता चला। पुलिस का आरोप है कि मालवीय ने 2 प्रतिशत कमीशन के बदले जानबूझकर साइबर ठगी की रकम को एक संस्था के बैंक खाते के जरिए ट्रांसफर होने दिया। इसके चलते वह देशभर में फैले एक जटिल मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की अहम कड़ी बन गया।

NDTV की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरफ्तारी उस सनसनीखेज मामले में पहली बड़ी सफलता मानी जा रही है, जिसमें ग्वालियर के 70 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट अशोक विजयवर्गीय से 21 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी हुई थी। जालसाजों ने खुद को निवेश सलाहकार बताकर उन्हें फर्जी USDT क्रिप्टोकरेंसी ट्रेडिंग में निवेश के लिए फंसाया था। जांचकर्ताओं के मुताबिक, ठगी की शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई, जब विजयवर्गीय को व्हाट्सऐप पर एक महिला का संदेश मिला, जिसने अपना नाम “दिव्या” बताया। उसने क्रिप्टोकरेंसी निवेश के जरिए डबल मुनाफे का वादा किया और धीरे-धीरे उनका भरोसा जीत लिया।

विश्वास मजबूत करने के लिए जालसाजों ने शुरुआत में विजयवर्गीय को थोड़ी रकम निकालने भी दी। निवेश धोखाधड़ी में यह काफी पुराना तरीका माना जाता है। बाद में एक फर्जी ट्रेडिंग पोर्टल पर उनका निवेश बढ़कर 33 करोड़ रुपये से अधिक दिखाया गया, जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि प्लेटफॉर्म असली है। लेकिन जब भी उन्होंने पैसे निकालने की कोशिश की, उनसे “इनकम टैक्स”, “रिस्क मार्जिन” और दूसरे फर्जी शुल्कों के नाम पर नई रकम मांगी गई। जब तक उन्हें एहसास हुआ कि स्क्रीन पर दिख रहा मुनाफा केवल फर्जी आंकड़ा है, तब तक वह 76 अलग-अलग बैंक खातों में 106 ट्रांजैक्शन के जरिए 21 करोड़ रुपये से ज्यादा भेज चुके थे।

जांच के दौरान साइबर विशेषज्ञों ने डिजिटल लेन-देन की पूरी कड़ी को दोबारा तैयार किया। इसमें सामने आया कि शुरुआती स्तर के ट्रांसफर में करीब 77 लाख रुपये जगदीश मालवीय से जुड़े खातों तक पहुंचे थे। इनमें से लगभग 50 लाख रुपये को सीधे इस मामले की ठगी की रकम से जोड़ा गया है। पुलिस के मुताबिक, मालवीय इन लेन-देन को इसलिए संभव बना पाया क्योंकि उसके पास उस संस्था के बैंक खाते और इंटरनेट बैंकिंग की जानकारी तक पहुंच थी, जिसका वह अध्यक्ष था। पूछताछ के दौरान उसने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उसने 2 प्रतिशत कमीशन के बदले ठगी की रकम को इस खाते से गुजरने की अनुमति दी थी।

जांचकर्ताओं को उसके खातों में 2.5 करोड़ रुपये से ज्यादा के संदिग्ध लेन-देन भी मिले हैं। इससे आशंका है कि इन खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी से हासिल रकम को इधर-उधर भेजने के लिए बार-बार किया गया होगा। जांच में यह भी सामने आया कि मालवीय कथित तौर पर संदिग्ध वित्तीय लेन-देन से मिलने वाली रकम के सहारे आलीशान जीवनशैली जी रहा था। पुलिस के मुताबिक, जब जांचकर्ता इस बड़े क्रिप्टोकरेंसी फ्रॉड की रकम का सुराग जोड़ रहे थे, तब मालवीय जुलाई में अपने कुछ सहयोगियों के साथ बैंकॉक भी गया था। आरोपी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। पूछताछ के दौरान उसने एक अंतरराज्यीय नेटवर्क के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है, जो “म्यूल अकाउंट्स” संचालित करता था।

म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं, जिनका इस्तेमाल अवैध रकम प्राप्त करने और अधिकारियों द्वारा फ्रीज किए जाने से पहले उसे तेजी से दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है। मनी लॉन्ड्रिंग के इस नेटवर्क का विशाल पैमाना देखकर जांचकर्ता भी हैरान हैं। राज्य साइबर पुलिस के मुताबिक, 21.06 करोड़ रुपये की रकम कुछ चुनिंदा फर्जी खातों में नहीं रखी गई थी। इसके बजाय इसे सैकड़ों लेन-देन में बांटकर बेहद जटिल बैंकिंग नेटवर्क के जरिए आगे भेजा गया। जांच में अब तक सामने आया है कि पीड़ित ने 76 बैंक खातों में रकम ट्रांसफर की थी।

इसके बाद पैसा लेन-देन की 15 अलग-अलग परतों से गुजरा। 20,000 से ज्यादा बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की पहचान की गई है। करीब 35 प्रतिशत रकम दक्षिण भारत के खातों के जरिए भेजी गई और इसके बाद यह कई राज्यों में फैल गई। रकम आखिरकार कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के बैंकिंग नेटवर्क से होकर गुजरी।

पुलिस अब तक करीब 2 करोड़ रुपये फ्रीज करने में सफल रही है। बाकी रकम पहले ही निकाल ली गई थी, क्रिप्टोकरेंसी में बदल दी गई थी या डिजिटल पेमेंट चैनलों के जरिए अलग-अलग जगह भेज दी गई थी। जांचकर्ताओं का मानना है कि रकम को जानबूझकर हजारों छोटे-बड़े ट्रांजैक्शन में बांटा गया, ताकि पैसा किसी एक खाते में इतनी देर तक न रहे कि अधिकारी उसे फ्रीज कर सकें।

सूत्रों के मुताबिक, आरोपी को गिरफ्तार करना भी आसान नहीं था। जांचकर्ताओं का कहना है कि जैसे ही मालवीय को हिरासत में लिया गया, कुछ प्रभावशाली लोगों ने कथित तौर पर अधिकारियों से संपर्क कर मामले की जानकारी मांगी और हस्तक्षेप करने की कोशिश की। हालांकि, जब उन्हें बताया गया कि मामला मध्य प्रदेश की अब तक की सबसे बड़ी साइबर फ्रॉड जांच माना जा रहा है, तो वे पीछे हट गए।

पुलिस अधिकारी संजीव नयन शर्मा ने बताया कि,

जांच का फोकस अब फर्जी क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म के पीछे काम कर रहे मास्टरमाइंड की पहचान करने, IP एड्रेस का पता लगाने, व्हाट्सऐप चैट और संचार का विश्लेषण करने पर है। इसमें अमेरिकी कंट्री कोड वाले एक नंबर की भी जांच की जा रही है। इसके साथ ही म्यूल अकाउंट्स को नियंत्रित करने वाले अंतरराज्यीय सिंडिकेट का पर्दाफाश करने की कोशिश की जा रही है।

जांचकर्ताओं को संदेह है कि इनमें से कई बैंक खाताधारक केवल कमीशन के बदले काम करने वाले “मनी म्यूल” हो सकते हैं, जबकि इस पूरे नेटवर्क के असली संचालक डिजिटल लेन-देन की कई परतों के पीछे अब भी छिपे हुए हैं।