BJP के राज में मुग़लों से दिक़्क़त तो अंग्रेज़ों से इतना प्यार क्यों?
मदरसों को बंद कराने वाली सरकार ब्रिटिश स्कूलों पर चुप क्यों है?
पिछले 12 सालों से सत्ता सुख भोग रहे भाजपा और संघ को मुस्लिम नामों से तो नफरत है लेकिन अंग्रेज नामों से काफी मोहब्बत है। पिछले 12 सालों में कई शहरों, सड़कों, गली-मोहल्ले के नाम सिर्फ इसलिए बदले गए क्योंकि संघ और भाजपा उनका 'हिन्दूकरण' करना चाहते थे, मदरसों को बंद करने की कोशिशें लगातार हो रही हैं, लेकिन वहीं दूसरी तरफ इनके जेहन में अभी भी औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति श्रद्धा और आस्था है जिसका सबूत ब्रिटिश स्कूलों के स्वागत में मिलता है।
इतिहास में अंग्रेजों से माफी मांगने वालों के राजनीतिक वंशज अब दोबारा देश को अंग्रेजों की गुलामी में जकड़े हुए देखना पसंद करते हैं तभी तो गुरुग्राम में क्वीन एलिजाबेथ के नाम पर स्कूल खुलने जा रहा है।
ब्रिटेन की गुलामी का खतरा एक बार फिर स्कूली शिक्षा के दरवाजे से भारत आ रहा है। 16वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई थी और और अब 21वीं शताब्दी में महारानी एलिजाबेथ के नाम वाला स्कूल गुरुग्राम में खुलने जा रहा है। The Times Of India की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु में पहले से ही लंदन की नामी-गिरामी Harrow School के छत के नीचे हमारे देश के नौनिहाल पढ़ रहे हैं। पुणे में Wellington, भोपाल में Shrewsbury और हैदराबाद में Sagebrook स्कूल Whitgift के पार्टनरशिप में चलने वाले ब्रिटेन के स्कूल में तो एडमिशन भी होने लगे हैं। करीब पांच सदियों पहले स्थापित एक और ब्रिटिश ग्रामर स्कूल अब बेंगलुरु में अपनी शाखा खोलने की योजना बना रहा है। वहीं Highgrove Education उत्तर प्रदेश का रुख कर रहा है।
दिलचस्प माजरा ये है कि इस बार ब्रिटेन के कुछ सबसे पुराने स्कूलों और भारत के बीच मध्यस्थ की भूमिका भारतीय शिक्षा कंपनियां, रियल एस्टेट डेवलपर्स और निवेश समूह निभा रहे हैं। कहना नहीं होगा ये सभी एजुकेशनल कंपनियों, रियल एस्टेट डेवलपर्स और इनवेस्टमेंट बैंकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से भाजपा सरकार से आर्थिक लाभ ले रहे हैं।
इस क्षेत्र पर नज़र रखने वाले एक विशेषज्ञ ने कहा, "इस पूरे कारोबार को ग्लोबल लर्निंग, लीडरशिप, विरासत और अंतरराष्ट्रीय अनुभव जैसी भाषा में पेश किया जा रहा है।" लेकिन इसके बहाने भारत में न सिर्फ एक औपनिवेशिक कालीन ब्रिट्रिश साम्राज्य का पाठ्यक्रम आयात किया जा रहा है बल्कि इसके साथ एक उनके नाम और उससे जुड़ा इतिहास, प्रतिष्ठा और सामाजिक आकांक्षाएं भी लाई जा रही हैं।
1573 में बार्नेट में स्थापित Queen Elizabeth's School इसी महीने गुरुग्राम में अपना कैंपस खोलने वाला है। इसकी मूल ब्रिटिश संस्था की खास बात यह है कि इंग्लैंड में यह सरकारी फंड से चलने वाला ग्रामर स्कूल है। लेकिन अपने देश में सार्वजनिक धन से चलने वाला यह स्कूल विदेश में एक महंगे निजी संस्थान को अपनी सदियों पुरानी विरासत और प्रतिष्ठा का नाम देगा। यह इतिहास का एक दिलचस्प उलटफेर है।
10 से अधिक देशों में स्कूल चलाने वाली दुबई स्थित GEMS Education के इंडिया CEO फ्रांसिस जोसेफ ब्रिटिश स्कूल फ्रेंचाइजी के भारत आने को दिलचस्प मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसके साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
उन्होंने कहा,
"भारत में प्रवेश करने वाले हर वैश्विक शिक्षा ब्रांड को एक बुनियादी सच्चाई याद रखनी चाहिए—स्कूल स्थानीय शिक्षण समुदाय होते हैं, जिनकी जड़ें उस समाज की संस्कृति, परंपराओं, स्थानीय भाषाओं और आकांक्षाओं में गहराई से जुड़ी होती हैं, जिसकी वे सेवा करते हैं।"
इंस्पायरनेक्स्ट लर्निंग फाउंडेशन की निदेशक स्वाति पोपट वत्स औपनिवेशिक शिक्षा की लंबी छाया की ओर ध्यान दिलाती हैं। उनके मुताबिक उपनिवेशवाद की सबसे स्थायी विरासतों में से एक यह धारणा रही कि बाहर से आया ज्ञान स्वाभाविक रूप से भारतीय या स्वदेशी क्षमता से बेहतर है। आजाद भारत ने अपनी शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा कायम करने में दशकों लगाए हैं। उन्होंने कहा,
"यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर शिक्षा एक बार फिर ऐसी व्यवस्था बना दे, जिसमें विदेशी होने को अपने-आप बेहतर मान लिया जाए और भारतीय व्यवस्था को अपनी योग्यता साबित करने के लिए बाहर से मान्यता की जरूरत पड़े।"
बेंगलुरु में Harrow International School ने ब्रिटिश शिक्षा जगत के सबसे प्रतिष्ठित नामों में से एक को भारतीय जमीन पर उतारा है। यहां तक कि इसकी यूनिफॉर्म भी पुरानी परंपरा का भार लिए हुए है। इसमें एक खास ब्रिटिश टोपी भी शामिल है।
Harrow International School की अपील का एक बड़ा हिस्सा उसके करीब 450 साल पुराने इतिहास में छिपा है। महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम के शासनकाल में रॉयल चार्टर के तहत स्थापित इस स्कूल के पूर्व छात्रों में कई राजनेता और लेखक शामिल रहे हैं। यह इतिहास केवल सजावट नहीं है। बल्कि स्कूल की पेशकश का केंद्रीय हिस्सा है। एक तरह से यही वह मुख्य चीज है, जिसे बेचा जा रहा है।
बेंगलुरु स्थित संस्थान की प्रमुख कैरोलिन पास्को ने कहा, " Harrow International School के लिए यह कभी केवल ज्यादा स्कूल स्थापित करने का मामला नहीं था। इसका उद्देश्य एक विशिष्ट शैक्षणिक दर्शन का विस्तार करना और ऐसे समुदाय तलाशना था, जो ऐसी शिक्षा को महत्व देते हों जो युवाओं को सिर्फ विश्वविद्यालय के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करे।"
पुणे में Wellington College International, इंग्लैंड के Wellington College की पहचान के साथ काम करता है। भोपाल में Shrewsbury International School ने ब्रिटिश बोर्डिंग स्कूल का एक सफल मॉडल पेश किया है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ लगभग स्पष्ट है—जो शिक्षा परंपरा कभी ब्रिटिश साम्राज्य के शासक वर्ग को तैयार करने के लिए बनाई गई थी, अब उसी को भारत के कॉरपोरेट अभिजात वर्ग के बच्चों के लिए ढाला जा रहा है।
Royal Grammar School Guildford ने भारत में चार स्कूल स्थापित करने के लिए Ryan Group के साथ साझेदारी की है। इनमें पहला RGS Guildford Bengaluru 2028 में खुलने की उम्मीद है। हैदराबाद का Sagebrook International इसका एक अलग मॉडल पेश करता है। यह सीधे तौर पर भारत लाया गया कोई ब्रिटिश स्कूल नहीं है, बल्कि यह 1596 में स्थापित Whitgift School के साथ अपनी साझेदारी का प्रचार करता है।
Sagebrook के संस्थापक प्रवीण राजू ने कहा,
"हमारा मॉडल सामूहिक है, निर्देशात्मक नहीं। हमारा मानना है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए बाजार मौजूद है, खासकर ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी GCC स्थापित हो रहे हैं और दुनिया भर में रहने वाले भारतीय वापस देश लौट रहे हैं।"
लेकिन एक बुनियादी सवाल शायद ही कभी पूछा जाता है—आखिर ब्रिटिश स्कूल किस मंशा से भारत में अपने कैंपस खोल रहे हैं ? गुलाम बनाने या कॉरपोरेट अभिजात वर्ग तैयार करने!
इंग्लैंड में तो इन स्कूलों में ब्रिटिश राज को भारत में वरदान की तरह पेश किया जाता है, उपनिवेश विरोधी आंदोलनों पर बहुत कम बात होती है और ब्रिटिश सरकार के दमन को ग़ायब कर दिया जाता है, क्या भाजपा सरकार भारत के बच्चों को भी यही इतिहास पढ़ाना चाहती है?
Satish Verma
सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।