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ज़रूरत के वक़्त ही सरकारी वेबसाइट्स क्यों बैठ जाती हैं?

Ajayendra Ajayendra | 08 Aug, 2026 · 4 min read
ज़रूरत के वक़्त ही सरकारी वेबसाइट्स क्यों बैठ जाती हैं?

NEET का रिजल्ट हो, IRCTC की Tatkal बुकिंग या किसी सरकारी भर्ती का पोर्टल, जैसे ही लाखों लोग एक साथ वेबसाइट पर पहुंचते हैं, सिस्टम जवाब देने लगता है।

पिछली दिनों देर रात अचानक से NEET का रिजल्ट आया और देखते-देखते सर्वर बैठ गया। हजारों छात्र पेज रिफ्रेश करने लगे कि अब खुले तब खुले। NTA ने एक अल्टरनेट लिंक भी दिया लेकिन कुछ देर बाद उसका हाल भी जस का तस हो गया।

अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ NEET की समस्या है, तो शायद आपने कभी सुबह 10-11 बजे IRCTC पर Tatkal टिकट बुक करने की कोशिश नहीं की होगी। घड़ी में 10 बजते ही किसी का लॉग-इन नहीं होता, किसी का सर्च अटक जाता है, किसी का पेमेंट फेल हो जाता है और अगर ये सब पार भी कर लें, तो आखिर में वेबसाइट 'Server Not Responding' पर अटक जाता है।

Tatkal टिकट बुक करना लोगों के लिए किसी युद्ध से कम नहीं है।


दूसरी तरफ Facebook, YouTube, Instagram और Amazon जैसे प्लेटफॉर्म हर सेकंड करोड़ों रिक्वेस्ट संभालते हैं, फिर भी शायद ही कभी पूरी तरह ठप पड़ते हों। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी वेबसाइट्स कुछ लाख अतिरिक्त यूज़र आते ही क्यों जवाब देने लगती हैं?

एक वेबसाइट नॉट रेस्पोंडिंग मोड में जाता क्यों है? आइये समझते हैं,

मान लीजिए भारत-पाकिस्तान मैच है. स्टेडियम की क्षमता 50 हजार दर्शकों की है, और एंट्री के लिए सिर्फ दो-तीन गेट हैं। मैच शुरू होने से ठीक पहले एक लाख लोग पहुंच जाते हैं। नतीजा... लंबी कतारें, धक्का-मुक्की और कई लोग समय पर अपनी सीट तक भी नहीं पहुंच पाते

बिलकुल यही समस्या वेबसाइट की भी होती है। जब आप साईट खोलते हैं, तो आपका मोबाइल या कंप्यूटर उस वेबसाइट के सर्वर से जानकारी मांगता है। इसे तकनीकी भाषा में "रिक्वेस्ट" कहा जाता है। सामान्य स्थिति में सर्वर उसका जवाब दे देता है। लेकिन जब उसी सेकंड लाखों लोग यही काम करने लगते हैं, तो सर्वर पर एक साथ लाखों रिक्वेस्ट पहुंच जाती हैं। उसकी क्षमता जितनी होती है, वह उतनी ही संभाल पाता है, बाकियों के लिए सर्वर एरर।

पहली नज़र में लगता है कि अगर सर्वर की क्षमता 10 लाख रिक्वेस्ट की है, तो उसे 20 लाख या 50 लाख रिक्वेस्ट संभालने लायक बना दिया जाए और समस्या खत्म हो जाएगी लेकिन हकीकत में मामला इतना आसान नहीं है।

किसी वेबसाइट की क्षमता सिर्फ सर्वर की ताकत से तय नहीं होती बल्कि हर रिक्वेस्ट के साथ डेटाबेस में जानकारी खोजनी पड़ती है, यूज़र की पहचान जांचनी होती है, कई बार पेमेंट गेटवे या दूसरी सेवाओं से संपर्क करना पड़ता है और फिर जवाब तैयार करके वापस भेजना होता है। अगर इनमें से कोई एक हिस्सा भी धीमा पड़ जाए, तो पूरा सिस्टम उसकी वजह से अटक सकता है। यानी सिर्फ एक बड़ा सर्वर लगाने से पूरी समस्या हल नहीं होती।

इसी वजह से दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां एक ही बड़े सर्वर पर भरोसा नहीं करतीं। वे ट्रैफिक को कई सर्वर्स में बांटती हैं, वेबसाइट के स्थिर हिस्सों को CDN (Content Delivery Network) के जरिए अलग-अलग स्थानों से उपलब्ध कराती हैं, Load Balancer के जरिए हर यूज़र को कम व्यस्त सर्वर तक भेजती हैं और भीड़ बढ़ते ही Auto Scaling के जरिए नए सर्वर अपने-आप जोड़ देती हैं।

मतलब, समाधान सिर्फ क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को इस तरह डिजाइन करना है कि वह बढ़ती भीड़ के साथ खुद भी फैल सके।

AI Generated Image

तो सवाल उठता है कि अगर ये तकनीकें दुनिया की बड़ी कंपनियां वर्षों से इनका इस्तेमाल कर रही हैं, तो सरकारी वेबसाइट्स इन्हें पूरी तरह अपनाती क्यों नहीं? केंद्र सरकार के पास तो नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) जैसी समर्पित संस्था भी है, जिसका काम ही सरकारी डिजिटल सेवाओं को बनाना और मेंटेन करना है।

जबकि भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल देशों में गिना जाता है। करोड़ों लोग सरकारी सेवाओं के लिए पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भर हैं। ऐसे में यह मान लेना कि रिजल्ट या आवेदन के दिन अचानक ट्रैफिक बढ़ जाएगा, कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। यह पहले से पता होने वाली और हर साल दोहराई जाने वाली स्थिति है।

इसके बावजूद हर साल वही तस्वीर सामने आती है, वेबसाइट्स धीमी पड़ जाती हैं, Error आने लगता है और लाखों लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटल एसेट्स को आधुनिक बनाने की गति जरूरत के मुकाबले काफी धीमी रही है।

विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि,

क्लाउड, ऑटो-स्केलिंग, CDN, बेहतर लोड बैलेंसिंग और आधुनिक सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर अपनाकर ऐसी समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

अगर परीक्षा परिणाम, भर्ती पोर्टल और टिकट बुकिंग जैसी बुनियादी डिजिटल सेवाएं हर बड़े ट्रैफिक के दौरान लड़खड़ा जाएं, तो सवाल सिर्फ सर्वर का नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी डिजिटल ढांचे की तैयारी और जवाबदेही का बन जाता है।

Ajayendra

Ajayendra

अजयेन्द्र टेक्नोलॉजी कंसल्टेंट, AI ऑटोमेशन विशेषज्ञ और डेटा साइंस प्रोफेशनल हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वेब टेक्नोलॉजी, डेटा विश्लेषण और डिजिटल इनोवेशन से जुड़े विषयों पर लिखते हैं। तकनीक के सामाजिक, आर्थिक और नीतिगत प्रभावों का सरल एवं तथ्यपरक विश्लेषण उनकी लेखन शैली की विशेषता है।