पैलेट गन के इस्तेमाल पर क्या कहता है कानून?
छात्रों पर पैलेट गन चलाने के विवाद ने देश में राजनीतिक भूचाल ला दिया है।
छात्रों पर पैलेट गन चलाने के विवाद ने देश में राजनीतिक भूचाल ला दिया है। यह मामला अब राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर आक्रामक हो गए हैं और अब सीधे उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और छात्रों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पेलेट गन के इस्तेमाल के आरोपों ने सिर्फ दिल्ली पुलिस को ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को भी विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। लोकसभा में चर्चा के दौरान राहुल गांधी समेत विपक्षी दलों के कई सांसदों ने छात्रों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए सीधे अमित शाह से जवाबदेही की मांग की है।
The Hindu और Money Control की एक रिपोर्ट के अनुसार, कानून के जानकारों की राय में भारत में भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर पुलिस के क्या नियम हैं, उनकी सीमाएं क्या हैं और किन परिस्थितियों में पेलेट गन जैसे कठोर उपाय अपनाए जा सकते हैं, इसको लेकर बिल्कुल स्पष्ट नियम है कि यह तब इस्तेमाल किए जाए जब सभी कठोर उपाय विफल हो जाए। छत्तीसगढ़ सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता रवि शर्मा के अनुसार,
भारतीय कानून भीड़ नियंत्रण के लिए चरणबद्ध (Graduated) प्रक्रिया निर्धारित करता है। बल प्रयोग पुलिस के विवेक पर निर्भर नहीं होता, बल्कि केवल तब बढ़ाया जा सकता है जब कम कठोर उपाय विफल हो जाएं।
उन्होंने कहा कि,
"बल प्रयोग का हर चरण गृह मंत्रालय की 1985 की आचार संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और सुप्रीम कोर्ट के रामलीला मैदान फैसले में तय तीन सिद्धांतों पर आधारित है। बल तभी प्रयोग किया जा सकता है जब वह आवश्यक हो। वास्तविक खतरे के अनुपात में हो और न्यूनतम हो। जैसे ही खतरा समाप्त हो जाए, बल प्रयोग भी तुरंत रोक दिया जाना चाहिए।"
रवि शर्मा के मुताबिक, कानून पुलिस को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ असीमित शक्ति नहीं देता। पुलिस को पहले समझाने, चेतावनी देने और गैर-हिंसक उपाय अपनाने होते हैं। हर कदम मौके की परिस्थितियों के अनुसार उचित ठहराया जाना चाहिए। पुलिस सीधे कठोर कार्रवाई नहीं कर सकती। इसके लिए पुलिस की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में वर्गीकृत है। क्षेत्र को सुरक्षित करना, स्थिति का आकलन करना और यह तय करना कि क्या यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 189 के तहत अवैध जमावड़ा है। इस चरण में कोई बल प्रयोग नहीं होता। उसके बाद चरण एक में,
यदि भीड़ हटाना जरूरी हो तो BNSS की धारा 148 के तहत स्पष्ट और सुनाई देने वाली चेतावनी दी जाती है।
चरण 2 में,
यदि लोग नहीं हटते तो बल प्रयोग की औपचारिक चेतावनी दी जाती है।
फिर चरण 3 में,
जहां संभव हो, घेराबंदी, उपद्रवियों को अलग करना या बैरिकेडिंग जैसे गैर-हिंसक उपाय अपनाए जाते हैं।
रवि शर्मा ने कहा कि यदि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद भीड़ नहीं हटती, तभी कम घातक उपाय अपनाए जा सकते हैं।
चरण 4 में,
2011 के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPRD) के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया जा सकता है।
चरण 5 में उल्लेख है कि,
यदि इसके बाद भी भीड़ नहीं हटती, तब लाठीचार्ज किया जा सकता है। लाठी के प्रहार शरीर के मुलायम हिस्सों पर किए जाने चाहिए और जैसे ही भीड़ तितर-बितर हो जाए, कार्रवाई रोक दी जानी चाहिए।
2011 में जारी BPRD का SOP सुरक्षा बलों के लिए भीड़ नियंत्रण के दौरान कम घातक (Less-Lethal) उपायों के इस्तेमाल की प्रक्रिया तय करता है। पैलेट गन के इस्तेमाल पर रवि शर्मा ने कहा कि इसे सामान्य भीड़ नियंत्रण का साधन नहीं माना जाता। कानूनी व्यवस्था में यह बल प्रयोग का सबसे अंतिम चरण है।
उन्होंने कहा कि,
"पेलेट गन का इस्तेमाल केवल अंतिम विकल्प ( चरण 6) के रूप में किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब सभी कम कठोर उपाय विफल हो चुके हों और लोगों की जान या महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्ति पर तत्काल गंभीर खतरा हो। भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन का इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए।
भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो अधिकृत सुरक्षा बलों द्वारा भीड़ नियंत्रण के लिए पेलेट गन के इस्तेमाल पर स्पष्ट रूप से रोक लगाता हो। इसका उपयोग किसी विशेष कानून से अधिक, गृह मंत्रालय और रैपिड एक्शन फोर्स जैसी एजेंसियों की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत होता है, जहां इसे अंतिम विकल्प माना गया है। पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण में पेलेट गन के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला कोई अलग कानून नहीं है। नागरिकों के लिए पेलेट गन का स्वामित्व शस्त्र अधिनियम, 1959 और शस्त्र नियम, 2016 के तहत नियंत्रित है, लेकिन पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण में इसके इस्तेमाल के लिए कोई अलग कानूनी मानक तय नहीं किए गए हैं।
उन्होंने बताया कि,
"BNSS की धारा 43 (पूर्व में CrPC की धारा 46) पुलिस को गिरफ्तारी के लिए आवश्यक बल प्रयोग की अनुमति देती है, लेकिन ऐसा बल मृत्यु का कारण नहीं बनना चाहिए, जब तक आरोपी पर ऐसा अपराध न हो जिसमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान हो।"
उन्होंने कहा कि पैलेट गन से मौत और स्थायी विकलांगता जैसी घटनाओं की रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह साबित करना कठिन हो सकता है कि इस्तेमाल किया गया बल परिस्थितियों के अनुपात में था।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पैलेट गन का इस्तेमाल करना पड़े तो उसके लिए भी सख्त नियम लागू होते हैं। इसका आदेश केवल मजिस्ट्रेट या नामित वरिष्ठ अधिकारी ही दे सकता है। यह तभी किया जा सकता है जब लाठीचार्ज विफल हो चुका हो और जान या महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्ति पर तत्काल गंभीर खतरा हो। पहले पूरी और स्पष्ट चेतावनी देना आवश्यक है। यदि गोली चलानी पड़े तो निशाना कमर के नीचे रखा जाना चाहिए और केवल भीड़ के सबसे आक्रामक हिस्से की ओर ही फायर किया जाना चाहिए। जैसे ही भीड़ हटने लगे, फायरिंग तुरंत रोक दी जानी चाहिए। इसके बाद घायलों को चिकित्सा सहायता देना, इस्तेमाल किए गए राउंड का पूरा हिसाब रखना और पूरी कार्रवाई का दस्तावेजीकरण करना अनिवार्य है। रवि शर्मा ने कहा कि पूरी प्रक्रिया के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी, वीडियो रिकॉर्डिंग और यह सिद्धांत लागू रहता है कि बल का उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना है, सजा देना नहीं।
Satish Verma
सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।