सुप्रीम कोर्ट CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर अगले हफ्ते करेगा सुनवाई
कानून के अनुसार फैसले सर्वसम्मति से या मतभेद होने पर बहुमत से होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति जताई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अन्य दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, की मंजूरी के बिना चुनाव आयोग के नाम पर एकतरफा फैसले लिए।
Bar and Bench की एक रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष याचिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि,
बहुसदस्यीय चुनाव आयोग का उद्देश्य सामूहिक निर्णय लेना है। कानून के अनुसार फैसले सर्वसम्मति से या मतभेद होने पर बहुमत से होने चाहिए। सिंह ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की पूरी प्रक्रिया पर आयोग का विधिवत फैसला होने को लेकर सवाल उठाया।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर याचिका में Quo Warranto रिट जारी करने की मांग की गई है। इसके जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त से पूछा गया है कि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत पूरे चुनाव आयोग को मिली सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति को अकेले इस्तेमाल करने का अधिकार किस आधार पर है।
याचिका में आरोप है कि,
आयोग में शक्तियां धीरे-धीरे एक पद पर केंद्रित हुईं, बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त उपलब्ध कराने में देरी हुई या वे उपलब्ध नहीं कराए गए, मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव किए गए और अन्य दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना अपीलें दायर की गईं।
याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का हवाला दिया है। इसके अनुसार आयोग का कामकाज सर्वसम्मति से चलना चाहिए। मतभेद की स्थिति में फैसला बहुमत की राय से होना चाहिए। याचिका के मुताबिक, 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 अलग-अलग मौकों पर आयोग की मंजूरी के बिना उठाए गए कदमों पर आपत्ति जताई थी।
याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि यदि मतदाता सूची और मतदान के अधिकार को प्रभावित करने वाले फैसले आयोग के दो चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त के बजाय उसका एकमात्र पदाधिकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ले रहा है, तो इससे गंभीर संवैधानिक सवाल उठता है।
याचिका में मांग की गई है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ने धारा 18 के अनुरूप आयोग का फैसला हुए बिना उसकी सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल किया है, तो ऐसे कदमों को अवैध घोषित किया जाए। साथ ही SIR तथा उसके तहत की गई सभी कार्रवाइयों, फैसलों और निर्देशों को शुरू से ही शून्य और कानूनी अधिकार से परे घोषित करने की मांग की गई है। याचिका अधिवक्ता मुदित गुप्ता के माध्यम से दायर की गई है।
यह याचिका The Indian Express की उस रिपोर्ट के कुछ दिन बाद दायर हुई थी, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें Form 6 में बदलाव और मतदाता सूची के डेटा प्रबंधन से जुड़े मामले शामिल थे। कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना या उनकी सिफारिशों के विरुद्ध लिए गए थे।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से सक्षम प्राधिकारी को निर्देश देने की मांग की थी कि,
वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत ज्ञानेश कुमार, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और जिम्मेदार पाए जाने वाले अन्य अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कर अभियोजन शुरू करे। यह धारा मतदाता सूची तैयार करने, उसके पुनरीक्षण या सुधार से जुड़े कुछ आधिकारिक कर्तव्यों के उल्लंघन पर दंड का प्रावधान करती है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि,
Form 6 में बिना अधिकार और सर्वसम्मत फैसले के बदलाव किए गए, मतदाता सूचियों के डेटाबेस को केंद्रीकृत किया गया और ECINet प्रणाली के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल नहीं किए गए। इसमें यह भी आरोप है कि पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली 16.10 लाख अपीलें चुनाव आयोग के नाम से दाखिल की गईं।
याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के अधिनियम की धारा 18 का हवाला दिया है। इस प्रावधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होने पर फैसला बहुमत की राय से किया जाना चाहिए।

याचिका के मुताबिक,
मई 2026 में विवेक जोशी ने Form 6 में बदलाव पर यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संबंधित संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म नहीं बदला जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी। इसके बावजूद, याचिका का आरोप है कि ECINet पोर्टल पर Form 6 में ऐसा बदलाव किया गया, जिसके तहत आवेदक या उसके रिश्तेदारों की पिछली SIR मतदाता सूची में मौजूदगी से जुड़ी जानकारी मांगी गई। याचिका के अनुसार, संधू ने बाद में इस बदलाव को ‘अनधिकृत और अवैध’ बताया था।
याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) बनाने की मांग की है, जिसमें साइबर सुरक्षा और आईटी विशेषज्ञ भी शामिल हों। प्रस्तावित जांच में ECINet और ERONet डेटाबेस का फोरेंसिक ऑडिट करने तथा SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 13 करोड़ नाम हटाए जाने की परिस्थितियों की जांच करने को कहा गया है। पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों को दाखिल करने के मामले में व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने की मांग भी की गई है।
याचिका में ECINet और ERONet पोर्टल पर Form 6 में किए गए बदलाव रद्द कर नियमों में निर्धारित मूल फॉर्म बहाल करने की मांग की गई है। साथ ही, पश्चिम बंगाल के अपीलीय न्यायाधिकरणों में चुनाव आयोग के नाम से दाखिल कथित 16.10 लाख अपीलें रद्द करने का अनुरोध किया गया है। जांच पूरी होने तक 1 अक्टूबर 2025 से ECINet और ERONet से जुड़े सर्वर लॉग, डेटाबेस, संचार रिकॉर्ड और मेटाडेटा सुरक्षित रखने के निर्देश भी मांगे गए हैं।
याचिका में भारत संघ, भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव, मनीष गर्ग और सीमा खन्ना को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में लगाए गए आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।