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हर नागरिक 'वंदे मातरम’ नहीं गाने के लिए स्वतंत्र है: SC ने केंद्र को 1986 के फैसले की दिलाई याद

Pro. Hemantkumar Shah Pro. Hemantkumar Shah | 1h ago · 5 min read
हर नागरिक 'वंदे मातरम’ नहीं गाने के लिए स्वतंत्र है: SC ने केंद्र को 1986 के फैसले की दिलाई याद

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते स्पष्ट कहा कि वंदे मातरम गाने से इनकार करने वाले व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता है।।

सर्वोच्च न्यायालय का मंगलवार को दिया एक अद्भुत निर्णय कहता है कि देश के किसी भी नागरिक को वंदे मातरम गीत न गाने का अधिकार है। अदालत ने कहा है कि,

नागरिक अपने धर्म के कारण या अंतरात्मा की आवाज के कारण वंदे मातरम गीत नहीं गाने के लिए स्वतंत्र है।


सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और अन्य दो न्यायाधीशों जॉयमाली बागची और वी. मोहना द्वारा दिए गए इस फैसले में कहा गया है कि,

2026 में किए गए कानूनी संशोधनों के अनुसार भी वंदे मातरम गीत की एक पंक्ति या पूरा गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। 1986 में इसी प्रकार का जो निर्णय Bijoe Emmanuel मामले में अदालत ने दिया था, उसे एक बार फिर बरकरार रखा गया।
मामला कर्नाटक संगीत के गायक टी. एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। कृष्णा ने वंदे मातरम की सभी छह पंक्तियों/अंतरों को गाने को अनिवार्य बनाने वाले कानून को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि इसके अंतिम चार अंतरों से देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर सवाल उठता है।

पीठ ने केंद्र से याचिका पर जवाब मांगा, लेकिन साथ ही कहा कि,

उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के 1986 के Bijoe Emmanuel बनाम केरल सरकार फैसले में तय कानूनी सिद्धांत संशोधित कानून पर भी लागू होगा।
1986 का वह मामला ऐसा था कि जिसमें एक स्कूल के छात्र वंदे मातरम गीत गाए जाने के समय खड़े तो हुए थे, लेकिन उन्होंने गीत गाया नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 1986 का निर्णय ही अंतिम कानून है।

अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धर्म के कारण या अंतरात्मा की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत वंदे मातरम गीत पर आपत्ति जता सकता है और उसे न गाने का अधिकार रखता है तथा उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।


कर्नाटक के प्रसिद्ध संगीतकार टी. एम. कृष्णा द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में यह फैसला आया है। उनके वकील ने तर्क दिया था कि हाल ही में जो कानूनी संशोधन किया गया है, उसमें राष्ट्रगीत के संबंध में कोई परिभाषा नहीं दी गई है और इसका दुरुपयोग हो सकता है। वंदे मातरम गीत की छह पंक्तियाँ गाने के संबंध में सरकार ने केवल एक सर्कुलर जारी किया है और कोई अधिसूचना भी जारी नहीं की है, ऐसा टी. एम. कृष्णा के वकील एस. मुरलीधर द्वारा कहा गया था।

सरकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नक्सली जैसा कहें वैसा कानून नहीं बनता। तब न्यायाधीश बागची ने कहा कि जिस व्यक्ति को नक्सली कहा जाता है, उसके पास भी संवैधानिक अधिकार तो हैं ही।

न्यायमूर्ति बागची ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि,

अदालत इस मामले में नोटिस जारी करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन उम्मीद करती है कि Bijoe Emmanuel मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून संशोधित कानून को भी नियंत्रित करेगा।

पीठ ने कहा कि,

राष्ट्रीय गीत क्या है, इस पर विवाद नहीं है। यह तय करना लोकतांत्रिक सरकार का अधिकार है कि राष्ट्रीय गीत में दो अंतरे होंगे या चार। लेकिन अगर कोई व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अपने अधिकारों के उल्लंघन को महसूस करता है या वह अंतरात्मा के आधार पर किसी काम से इनकार करता है, तो उसे दंडित नहीं किया जाना चाहिए।

टी. एम. कृष्णा की याचिका में Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 में 2026 में किए गए संशोधन और गृह मंत्रालय के 28 जनवरी तथा 9 जुलाई 2026 के आदेशों को चुनौती दी गई है। संशोधित धारा 3 के तहत राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या ऐसे कार्यक्रम में व्यवधान डालने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

पीठ ने कहा कि अदालत यह तय करने की स्थिति में नहीं है कि वंदे मातरम से जुड़े राष्ट्रीय भावनाएं या आकांक्षाएं क्या होनी चाहिए। यह फैसला राज्य को करना है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि,

वह यह तय नहीं कर रही कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए। वह केवल यह देखेगी कि ‘Conscientious Objector’ यानी अंतरात्मा या धार्मिक आधार पर वंदे मातरम गाने से इनकार करने वाले व्यक्ति के अधिकार कानून के तहत सुरक्षित हैं या नहीं।

टी. एम. कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधित कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। इससे भ्रम और कानून के संभावित दुरुपयोग की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि वंदे मातरम के कितने अंतरों को राष्ट्रीय गीत का आधिकारिक हिस्सा माना जाएगा। उनके अनुसार, पहले से चली आ रही समझ वंदे मातरम के पहले दो अंतरों तक सीमित थी।

मुरलीधर ने यह भी कहा कि संशोधन जल्दबाजी में किया गया और इसके लिए व्यापक राष्ट्रीय सहमति की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

वाह, क्या फैसला है! देखिए, इसका अर्थ इस प्रकार है:

(1) सरकारी वकील एक बड़े संगीतकार को नक्सली कह देता है और वह भी अदालत में। सरकार कैसे बेशर्म, नालायक, घटिया और अधम लोगों के हाथों में है कि उसका सबसे बड़ा वकील किसी भी नागरिक को नक्सली घोषित कर देता है!

(2) संविधान के अनुच्छेद 25 में नागरिक को अंतरात्मा का अधिकार दिया गया है और अंतरात्मा जो कहे उसके अनुसार आचरण करने का अधिकार है। मेरी अंतरात्मा अगर मुझे यह कहती है कि मुझे भारत नाम के देश को माता नहीं कहना है, तो ऐसा कहने का मुझे अधिकार है।

(3) वंदे मातरम गीत की छह पंक्तियाँ गाने के बारे में जो विवाद खड़ा हुआ था उसे दरकिनार करते हुए यह फैसला कहता है कि छह पंक्तियाँ ही नहीं, बल्कि पूरा का पूरा गीत ही नहीं गाने का किसी भी नागरिक को अधिकार है।

(4) इसका अर्थ यह हुआ कि वंदे मातरम गीत न गाने से कोई नागरिक देश का अपमान करता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

(5) इसका अर्थ यह हुआ कि देश को माता मानकर जिसे प्रणाम करना हो वह करे, जिसे माता न मानना हो वह न माने। लेकिन इससे वह व्यक्ति देशद्रोही नहीं हो जाता। वंदे मातरम् और देशभक्ति का कोई भी पारस्परिक नाता नहीं है।

जिस संविधान सभा ने अंतरात्मा की स्वतंत्रता वाला संविधान हमें दिया, उसके सभी सदस्यों को सलाम, और विशेष रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर को सलाम।

वंदे संविधान सभा।

Pro. Hemantkumar Shah

Pro. Hemantkumar Shah

प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।