गाली पोस्ट करने वाले किशोरों पर मुकदमा नहीं, सामुदायिक सेवा कराई जाए
सेवानिवृत वायुसेना अधिकारी की ओर से वकील रिजवान अहमद की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने पर पर सहमति जताई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाले नाबालिग छात्र-छात्राओं के खिलाफ मुकदमे चलाने के बजाय उनसे सामुदायिक सेवा कराई जाए। इस आशय से संबंधित सेवानिवृत वायुसेना अधिकारी की ओर से वकील रिजवान अहमद की ओर से दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने पर पर सहमति जताई है। याचिका में उन नाबालिगों और युवाओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का भी मुद्दा उठाया गया है, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अभद्र भाषा वाले वीडियो पोस्ट किए। वकील रिजवान अहमद ने कहा कि ऐसे व्यवहार में सुधार की जरूरत है, लेकिन उन पर आपराधिक मुकदमा चलाना समाधान नहीं है।
उन्होंने कहा कि ,
दुर्भाग्य से कुछ लड़के-लड़कियां बेहद अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। वे ऐसे वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं और इसके चलते एफआईआर दर्ज की जा रही है। सोशल मीडिया एक बदसूरत लड़ाई का मैदान बनता जा रहा है।"
उन्होंने आगे कहा कि,
ऐसी एक समान नीति होनी चाहिए कि उन्हें कम-से-कम सात दिन सामुदायिक सेवा के लिए भेजा जाए और फिर छोड़ दिया जाए। लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होनी चाहिए। इससे समाज में और अधिक कटुता पैदा होगी। यही इस मामले की तत्काल आवश्यकता है।"
Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
वकील ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसी स्थिति में पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाई जाए, जिसके तहत नाबालिगों से कम-से-कम सात दिन की सामुदायिक सेवा कराई जाए और उसके बाद उन्हें छोड़ दिया जाए, बजाय इसके कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 20 जुलाई के संसद मार्च में प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ हिंसा भड़काने के आरोप में कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से कहा कि सरकार की प्रतिक्रिया के बावजूद 20 जुलाई के प्रदर्शन के आयोजक लगातार भड़काऊ बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने बेहद उदार रुख अपनाया है, इसके बावजूद आयोजक आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। वे गैर-जिम्मेदाराना बयान देकर समाज में कटुता फैला रहे हैं। इसलिए आयोजकों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।"
याचिका में 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद गिरफ्तारी और एफआईआर दर्ज करने के संबंध में देशभर के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अलग-अलग राज्यों ने एफआईआर वापस लेने और गिरफ्तारी के मामलों में अलग-अलग तरीके अपनाए हैं, जिससे अनिश्चितता और जन असंतोष पैदा हो रहा है।
वकील ने अदालत से कहा,
"अलग-अलग राज्य गिरफ्तारी और एफआईआर को लेकर अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कर रहे हैं। यह राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है और इस पर एक समान नीति होनी चाहिए। ये अधिसूचनाएं देश के शांतिप्रिय नागरिकों के मन में असंतोष पैदा कर रही हैं।"
इससे पहले इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका पर विचार करने की भी सहमति जताई, जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं रह गया है। कोर्ट ने कहा कि इससे स्थानीय निवासियों को परेशानी होती है और आवश्यक सेवाएं भी बाधित होती हैं।
कहना न होगा कि परीक्षा पेपर लीक को लेकर एक महीने से ज्यादा समय तक छात्रों और प्रदर्शनकारियों का चला लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय आंदोलन ने मोदी सरकार को अंदर से कमजोर कर दिया है। यही कारण है कि पुलिसिया दमन के बाद सरकार अब संवैधानिक संस्थाओं पर दवाब बढ़ाते हुए देश में विरोध-प्रदर्शन की आवाज को ही चुप कराना चाह रही है।
जंतर -मंतर पर विरोध-प्रदर्शन को हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने के लिए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सतीश चंद कौशिक द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से याचिका में उठाए गए मुद्दों पर संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेने को कहा।
याचिका में विरोध-प्रदर्शनों के आयोजन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों के कारण स्थानीय निवासियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और आवश्यक वस्तुओं तथा चिकित्सा सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि याचिका में इलाके में आने-जाने और आवाजाही से जुड़ी चिंताएं उठाई गई हैं।