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नेशनल कॉन्फ्रेंस में बग़ावत: उमर अब्दुल्ला की कुर्सी खतरे में?

Ashok Kumar Pandey Ashok Kumar Pandey | 1h ago · 5 min read
नेशनल कॉन्फ्रेंस में बग़ावत: उमर अब्दुल्ला की कुर्सी खतरे में?

श्रीनगर में हुई बैठक के बाद तैयार प्रस्ताव में सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाने और मंत्रिपरिषद के पुनर्गठन की मांग शामिल है।


जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के खिलाफ पार्टी के भीतर नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी के असंतुष्ट विधायकों ने मंत्रिमंडल में फेरबदल, कुछ मंत्रियों को हटाने और सरकार के फैसलों में विधायकों की भूमिका बढ़ाने की मांग की है। शुक्रवार शाम श्रीनगर में हुई एक बैठक के बाद विधायकों ने अपनी मांगों का एक प्रस्ताव तैयार किया और उसे पार्टी अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला तक पहुंचाने की तैयारी की।

यह बैठक विधायक कैसर जमशेद लोन के आवास पर हुई। खबरों के मुताबिक, बैठक में 18 विधायक मौजूद थे, जबकि छह अन्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े। इस तरह असंतुष्ट गुट को कुल 24 विधायकों का समर्थन हासिल होने का दावा किया गया। हालांकि, कुछ दूसरे स्रोतों ने बैठक में शामिल विधायकों की तादाद 19 बताई है।


नासिर वानी और उपमुख्यमंत्री को हटाने की मांग

विधायकों ने अपने प्रस्ताव में मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को उनके पद से हटाने की मांग की है, साथ ही उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी को हटाने की मांग भी इसमें शामिल है। इसके अलावा उन मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाने की बात कही गई है जो दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं।

विधायकों का कहना है कि मंत्रिमंडल का नए सिरे से गठन होना चाहिए और मंत्रियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा भी दोबारा किया जाना चाहिए। वे चाहते हैं कि मंत्रियों की नियुक्ति और विभागों के बंटवारे में उनकी काबिलियत के साथ जम्मू और कश्मीर, दोनों इलाकों के नुमाइंदगी के पहलू का भी ख्याल रखा जाए।

इस नाराजगी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि सरकार और पार्टी के अहम फैसले लेने में विधायकों को भरोसे में नहीं लिया जाता। उनका मानना है कि पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों की राय को ज्यादा अहमियत मिलनी चाहिए। विधायकों ने पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को लागू करने के लिए एक साफ और ठोस रोडमैप तैयार करने की मांग भी की है।

Photo Credit: Observer News Service


मंत्रिमंडल विस्तार के बाद क्यों बढ़ी नाराजगी?

नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर इस नाराजगी की तात्कालिक वजह 27 अक्टूबर को हुआ मंत्रिमंडल विस्तार माना जा रहा है। इस दिन अली मोहम्मद सागर, शमीमा फिरदौस, मीर सैफुल्लाह और अल्ताफ कालू को मंत्री बनाया गया था। इस विस्तार के बाद कुछ वरिष्ठ विधायक खुद को नजरअंदाज किए जाने से नाराज बताए जा रहे हैं।

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में कुछ विधायकों ने पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री के सलाहकार के रवैये को लेकर भी शिकायतें कीं। उनकी नाराजगी केवल मंत्रिपद न मिलने तक सीमित नहीं है। वे इस बात से भी खफा हैं कि पार्टी और सरकार के कामकाज में कुछ चुनिंदा नेताओं का दखल बढ़ता जा रहा है।

विधायकों ने नासिर असलम वानी के अलावा सांसद शम्मी ओबेरॉय को भी अहम जिम्मेदारियों से हटाने की मांग की है। हालांकि, इन नेताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप फिलहाल असंतुष्ट विधायकों की शिकायतों के रूप में ही सामने आए हैं।

पार्टी से बगावत नहीं, अपनी बात रखने की कोशिश?

दिलचस्प बात यह है कि नाराज विधायक खुद को पार्टी के खिलाफ नहीं बता रहे हैं। उनकी शिकायत है कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही और वे चाहते हैं कि मुख्यमंत्री उनकी परेशानियों और सुझावों पर ध्यान दें।


इस लिहाज से इस घटनाक्रम को फिलहाल पार्टी में बगावत या टूट कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर है कि मुख्यमंत्री के सलाहकार और उपमुख्यमंत्री को हटाने जैसी मांगें पार्टी नेतृत्व के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं। इन मांगों से साफ है कि असंतोष केवल मंत्रिमंडल में जगह पाने का मामला नहीं है, बल्कि पार्टी और सरकार के भीतर फैसले लेने के तरीके को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

आगा रुहुल्लाह की नाराजगी ने बढ़ाई मुश्किल

नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए मुश्किलें सिर्फ विधायकों के इस गुट तक सीमित नहीं हैं। श्रीनगर के सांसद आगा रुहुल्लाह की नाराजगी भी पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

रुहुल्लाह की नाराजगी के पीछे पार्टी की राजनीतिक दिशा और चुनाव के दौरान किए गए वादों को लेकर असहमति भी बताई जाती रही है। खास तौर पर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे, राजनीतिक बंदियों और राज्य के अधिकारों से जुड़े सवालों पर उनका रुख पार्टी नेतृत्व से अलग रहा है। इस तरह पार्टी के भीतर असंतोष के दो अलग-अलग पहलू सामने आते हैं। एक तरफ विधायक सरकार और संगठन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ कुछ नेता पार्टी की सियासी प्रतिबद्धताओं और चुनावी वादों को लेकर नेतृत्व से जवाब मांग रहे हैं। 28 अगस्त का उनका ट्वीट भी उनके इस्तीफ़े की पुष्टि करता है


क्या सरकार के बहुमत पर पड़ेगा असर?

जम्मू-कश्मीर की 90 सदस्यीय विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायक हैं। कांग्रेस के छह विधायकों के अलावा सरकार को छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है। ऐसे में पार्टी के भीतर असंतोष निश्चित तौर पर उमर अब्दुल्ला के लिए राजनीतिक चुनौती है, लेकिन इससे सरकार का बहुमत खतरे में पड़ गया है, ऐसा फिलहाल नहीं कहा जा सकता।

अभी यह देखना होगा कि असंतुष्ट विधायक अपनी मांगों को लेकर आगे क्या रुख अपनाते हैं। क्या वे मुख्यमंत्री से मुलाकात कर अपनी शिकायतें रखेंगे? क्या फारूक अब्दुल्ला इस मामले में दखल देंगे? और क्या मंत्रिमंडल में एक बार फिर फेरबदल होगा?

इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे। फिलहाल उपलब्ध खबरों में उमर अब्दुल्ला या फारूक अब्दुल्ला की ओर से विधायकों की मांगों पर कोई साफ प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए यह महज कुछ मंत्रियों को हटाने या नए चेहरों को जगह देने का मामला नहीं है। विधानसभा चुनाव में जनादेश हासिल करने के बाद पार्टी के सामने सरकार चलाने के साथ अपने संगठन को एकजुट रखने की भी चुनौती है। अगर विधायकों को यह महसूस होता रहा कि सरकार और पार्टी के फैसले कुछ चुनिंदा लोगों की मर्जी से लिए जा रहे हैं, तो नाराजगी और बढ़ सकती है।

उमर अब्दुल्ला के सामने असल चुनौती यही है कि वे सरकार चलाने की जरूरतों, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और निर्वाचित विधायकों की शिकायतों के बीच किस तरह संतुलन कायम करते हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व इस नाराजगी को बातचीत के जरिए दूर कर पाता है या पार्टी के भीतर का यह मतभेद और गहरा होता है।

Ashok Kumar Pandey

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Ashok Kumar Pandey is the Managing Editor of The Credible News.