नाकामियों के बाद भी कैसे बढ़ता गया NTA प्रमुख और BJP के करीबी प्रोफेजर जोशी का कद?
जबलपुर के प्रोफेसर प्रदीप कुमार जोशी केंद्र में सतारूढ़ दल भाजपा के खासमखास हैं।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जब एक के बाद एक लगातार कई परीक्षाओं में पेपर लीक के साथ प्रश्न पत्र में गड़बड़ियों के कारण विवाद में आ रही है तो इस एजेंसी के प्रमुख प्रदीप कुमार जोशी के बारे में भी पाठकों का जानना जरूरी है। The Wire की एक रिपोर्ट के अनुसार, जबलपुर के प्रोफेसर प्रदीप कुमार जोशी केंद्र में सतारूढ़ दल भाजपा के खासमखास हैं और इनके कार्यकाल में 13 ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें विवाद, परीक्षा संबंधी बाधाएं और यहां तक कि पेपर लीक भी शामिल हैं।
द वायर के अनुसार जब प्रदीप कुमार जोशी के नाम की सिफारिश मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) के अध्यक्ष पद के लिए की गई थी, तब मध्य प्रदेश पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने उनके नाम की जांच-पड़ताल करते हुए एक आंतरिक नोट तैयार किया था। यह नोट मुख्यमंत्री के सचिव के लिए था। ‘द वायर’ ने इस आंतरिक नोट की एक प्रति देखी है, जो भोपाल के कार्यकर्ता अजय दुबे को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत मिली थी। इस नोट का मकसद जोशी के बारे में किसी भी संभावित गंभीर या आपत्तिजनक तथ्य को सामने लाना था।
नोट में उस समय जोशी की नौकरी और पद का विवरण दिया गया था। साथ ही साफ तौर पर यह भी लिखा था कि जबलपुर के प्रोफेसर जोशी के भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेताओं मुरली मनोहर जोशी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से करीबी संबंध थे। मीडिया रिपोर्टों में मुरली मनोहर जोशी को उनका रिश्तेदार तक बताया गया है।
मानो इतना ही पर्याप्त था। और वास्तव में, यह पर्याप्त साबित हुआ। कुछ ही दिनों बाद जोशी ने MPPSC के अध्यक्ष के संवैधानिक पद की शपथ ले ली। इस पद पर रहते हुए उन पर सरकारी सेवा में आने की इच्छा रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए परीक्षाएं आयोजित कराने की जिम्मेदारी थी। बाद में इसी भूमिका में उनका कार्यकाल कई विवादों से घिरा।
यही प्रदीप कुमार जोशी अब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के प्रमुख हैं। NTA उन प्रतियोगी परीक्षाओं को आयोजित करने के लिए जिम्मेदार है, जो हाल के वर्षों में पेपर लीक की घटनाओं से घिरी रही हैं। इनमें नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET) भी शामिल है। मई में NEET पेपर लीक होने के बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और कम से कम 21 अभ्यर्थियों ने अपनी जान ले ली।
इस पूरे मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर तो सवाल उठे हैं, लेकिन जोशी की भूमिका अपेक्षाकृत जांच और चर्चा से बची हुई दिखाई देती है। जोशी का करियर काफी प्रभावशाली रहा है। पिछले 20 वर्षों में वह अलग-अलग BJP शासित राज्यों के साथ-साथ नरेंद्र मोदी सरकार के तहत नई दिल्ली में भी कई महत्वपूर्ण और शक्तिशाली पदों पर रहे हैं। लगभग हर पद पर उनके कार्यकाल के दौरान पेपर लीक, अनियमितताओं, पक्षपात और अक्षमता के आरोपों जैसे विवाद सामने आए। इसके बावजूद जोशी इन सभी विवादों से लगभग बेदाग निकलते रहे। इतना ही नहीं, विवादों के बीच उनका कद लगातार बढ़ता गया। MPPSC अध्यक्ष से वह छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने, फिर उन्हें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का सदस्य बनाया गया और बाद में वह UPSC के अध्यक्ष बने। अब वह मोदी सरकार के तहत NTA के प्रमुख हैं।
‘द वायर’ के मुताबिक, जोशी के करीब 20 साल लंबे करियर में कम से कम 13 ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें विवाद, परीक्षा संबंधी बाधाएं और यहां तक कि पेपर लीक भी शामिल हैं। केवल NTA में उनके मौजूदा कार्यकाल के तीन वर्षों में ही कम से कम 11 बार पेपर लीक या परीक्षाओं में व्यवधान की घटनाएं सामने आई हैं। सेवानिवृत्त IAS अधिकारी और पूर्व शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप ने पिछले सप्ताह ‘Wone’ पॉडकास्ट पर बातचीत के दौरान जोशी को लेकर जवाबदेही की कमी पर सवाल उठाए।
स्वरूप ने कहा,
किसी भी संगठन की प्रतिष्ठा और उसकी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका नेतृत्व कौन कर रहा है। कोई इस पर चर्चा नहीं कर रहा कि NTA का चेयरमैन कौन है और उसका पिछला रिकॉर्ड क्या है।
उन्होंने आगे कहा,
2024 में पेपर लीक हुआ, उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ। 2026 में लीक हुआ, फिर भी कोई चर्चा नहीं है। आप कर्मचारियों को निकालते रहते हैं, लेकिन यह देखना बेहद जरूरी है कि किसी संगठन का नेतृत्व कौन कर रहा है। किसी संगठन का नेतृत्व करने के लिए आपने किसे नियुक्त किया है, यह एक राजनीतिक फैसला होता है।
जोशी के रिकॉर्ड की पड़ताल करते हुए ‘द वायर’ ने पाया कि इन विभिन्न पदों पर उनके कार्यकाल के दौरान संबंधित संस्थाओं द्वारा आयोजित परीक्षाओं में कई बार पेपर लीक, बार-बार अनियमितताएं, देरी और दूसरे विवाद सामने आए।
दरअसल, जोशी के कार्यकाल में NTA के इतिहास में पहली बार एक ऐसी घटना हुई, जिसने एजेंसी पर गंभीर सवाल खड़े किए। NEET के दस साल के इतिहास में इससे पहले न तो परीक्षा का पेपर लीक हुआ था और न ही कभी दोबारा परीक्षा कराने की जरूरत पड़ी थी। लेकिन मई 2026 में जोशी के नेतृत्व में NEET अंडरग्रेजुएट (UG) परीक्षा के प्रश्न लीक होने के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी और 20 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी।
जोशी के नेतृत्व वाले NTA की यह विफलता उन अनगिनत अभ्यर्थियों और उनके परिवारों के लिए बेहद गंभीर साबित हुई, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत की थी और परीक्षा की तैयारी में अपने संसाधन तथा समय लगाया था।
जब NTA ने दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की, तो कई अभ्यर्थियों के लिए फिर से उसी प्रक्रिया से गुजरने का विचार बेहद तनावपूर्ण साबित हुआ। 19 वर्षीय अभ्यर्थी सना शेख ने 3 मई को हुई NEET परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया था और वह अपने प्रदर्शन से बेहद खुश थीं। दोबारा होने वाली परीक्षा से एक दिन पहले शेख ने हैदराबाद स्थित अपने घर में अपनी जान ले ली। उन्होंने एक नोट छोड़ा था, जिसमें लिखा था, “मुझे माफ करना। मूल परीक्षा और दोबारा हुई परीक्षा के बीच कम से कम 21 NEET अभ्यर्थियों ने भी अपनी जान ले ली।
25 जुलाई को न्यूज पोर्टलों ने रिपोर्ट किया कि NTA ने अपने 47 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया है। हालांकि मोदी सरकार ने इन खबरों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की और न ही यह बताया कि हटाए गए कर्मचारियों के नाम और पद क्या थे तथा उन्हें किस आधार पर बर्खास्त किया गया। हाल ही में NTA ने 7.5 करोड़ रुपये का एक टेंडर भी जारी किया है। इसके तहत एक निजी सुरक्षा एजेंसी को नियुक्त किया जाना है, जिसका काम “NTA के कर्मचारियों, आगंतुकों, संपत्तियों, परिसरों, गोपनीय परीक्षा सामग्री, सर्वर रूम, स्ट्रॉन्ग रूम, गोदामों, रिकॉर्ड रूम और संवेदनशील परीक्षा रिकॉर्ड रखने वाले अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा” करना होगा।
‘द क्विंट’ के लिए सूचक पटेल द्वारा दाखिल एक RTI आवेदन से सामने आया कि जोशी के नेतृत्व में NTA कई संस्थागत समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें NTA के कुल कर्मचारियों के पदों में 38% रिक्तियां शामिल हैं। वरिष्ठ निदेशक स्तर के पदों पर यह रिक्तता बढ़कर 70% तक पहुंच जाती है। RTI से यह भी सामने आया कि लगातार विफलताओं के बावजूद NTA ने अपने गवर्निंग बोर्ड से पर्याप्त परामर्श नहीं किया। जनवरी 2024 से जून 2026 के बीच बोर्ड की केवल दो बैठकें हुईं।
‘द वायर’ ने प्रदीप कुमार जोशी और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से उनका पक्ष जानने के लिए कई बार ईमेल के जरिए संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।