ग़रीब लोकतंत्र के बादशाह नरेंद्र मोदी और 13000 लड़कियों का नृत्य
देश बाढ़ से जूझ रहा है और प्रधानमंत्री संसद की जगह नृत्य देख रहे हैं
एक वक़्त था जब दुनिया पर राजों-महाराजों-बादशाहों-सुल्तानों की हुकूमत थी। मुग़ल-ए-आज़म देखते हुए या फिर उस दौर पर बनी फिल्में देखते हुए जो सबसे ग्लैमरस दृश्य दिखते थे वे राजदरबारों में नाचती हुई नर्तकियों के दृश्य हैं। सैकड़ों सुंदर लड़कियाँ नाच रही हैं, गा रही हैं, संगीत बज रहा है और राजा साहब अपने सिंहासन में बैठे मुस्कुरा रहे हैं। कौन न होगा जिसे राजा के सिंहासन में ख़ुद को देखने का मन न हुआ होगा? किसको उनकी क़िस्मत से जलन न हुई होगी!
शेंगोल लेकर चलते मोदी जी को देखकर यह तो समझ आ ही गया था कि लोकतंत्र से चुने गए हमारे प्रधानमंत्री के सपनों में वही राजा- महाराजा आते रहते हैं, विदेशों में नृत्यांगनाओं के स्वागत से भी यह बात साफ़ हुई थी, लेकिन आंध्र प्रदेश में जिस तरह तेरह हज़ार लड़कियों के पारंपरिक ढिमसा नृत्य के बीच से उनका रथ गुज़र रहा था, उसे देखकर तो एकदम साफ़ हो गया कि प्रधानमंत्री महोदय ख़ुद को बादशाह अकबर से कम नहीं समझते।
सद से मोदी जी का घर दूर तो नहीं ही है लेकिन पूरा विपक्ष उन्हें देखने को तरसता रहा। नीट आंदोलन पर सवाल थे, राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर सवाल थे, विदेशी निवेश के गधे के सर पर सींग की तरह ग़ायब होते जाने पर सवाल थे, लेकिन मोदी जी न लोकसभा आए, न राज्यसभा। 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के बाद सुरक्षित निकले संसद से तो फिर सीधे आधी रात की इंस्टा रील में दिखाई दिए। पहले थोड़े ख़राब कैमरा एंगल के साथ, फिर परफेक्ट एंगल और लाइट के साथ। माफ़ी मांगने नहीं आए युवाओं पर लाठी और पैलट गन चलवाने या फिर पेपर लीक के लिए, माफ़ी देते हुए नज़र आए। आख़िर कोई बादशाह माफ़ी कैसे मांग सकता है! विपक्ष मांग करता रहा, संसद सस्पेंड होती रही, लेकिन मोदी जी संसद में नहीं आए और न ही गृहमंत्री अमित शाह ने दर्शन दिए। दो क़ानून पेश होकर पास भी हो गए, लेकिन संसद सूनी की सूनी रही।
शनिवार-रविवार संसद बंद हुई और मोदी जी आंध्र प्रदेश पहुँच गए। चंद्रबाबू नायडू के बिना सरकार चल नहीं सकती और नायडू राजनीति के साथ-साथ बिजनेस भी अच्छी तरह जानते हैं तो मोदी जी से वसूली करते रहते हैं परियोजनाओं के लिए। इस बार भी 18000 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास करने ही गए थे और जब गए थे तो स्वागत वैसे ही हुआ जैसे एक सामंत शहंशाह का करता है। आपको याद होगा कुछ महीने पहले जब ट्रम्प मिडल ईस्ट गए थे तो पर्दा-नक़ाब और शरीयत की दुहाई देने वाले अरब शाहों ने भी उनका ऐसे ही स्वागत किया था।
आंध्र प्रदेश से केरल कोई बहुत दूर नहीं, और जब प्राइवेट जेट से जाना हो तब तो मिनटों का रास्ता है लेकिन भयानक बाढ़ से गुज़रते केरल में एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री ऐसा स्वागत कैसे करता! वैसे तो असम में डबल इंजन वाले हिमन्ता बिस्वा शर्मा की सरकार है, लेकिन जैसी भयावह बाढ़ है, उसमें स्वागत उनके लिए भी मुश्किल होता और छत्तीसगढ़ तथा गुजरात के मुख्यमंत्रियों के लिए भी। इसीलिए शायद इन प्रदेशों में जाने का प्रोग्राम नहीं बना। बाढ़ का क्या है, आती है जाती है। अगले चुनाव से पहले फिर बाढ़ मुक्त असम का वादा कर दिया जाएगा और जनता धन्य-धन्य हो जाएगी। आपको याद तो होगा ही कि अमित शाह जी यह वादा 2021 में करके आए थे, भूल गए होंगे।
पिछले साल बिहार में बाढ़ आई थी, हो सकता है फिर आ जाए। फिर वादे हो जाएंगे। हाँ इतना तय है कि मोदी जी उस पर कुछ नहीं बोलेंगे। मोदी जी सिर्फ़ वहीं जाएंगे जहाँ से फ़ील गुड हो और सुंदर तस्वीरें आएं। इसीलिए लक्षद्वीप गए लेकिन मणिपुर नहीं। आंध्र प्रदेश गए लेकिन केरल नहीं। रील में आए लेकिन युवाओं से मिलने जंतर-मंतर नहीं।
वैसे जब मीडिया आपके सुर से सुर मिलाने की तय कर चुका हो तो बाढ़ सिर्फ़ केरल में दिखाई देगी। कांग्रेस की सरकार जो ठहरी। भरोसा न हो तो आज के प्रमुख अख़बार उठाकर देख लीजिए। आमतौर पर प्रोग्रेसिव माने जाने वाले अंग्रेजी के प्रमुख अखबार द हिन्दू ने बाढ़ की ख़बर तीसरे पेज पर छापी तो है, लेकिन इस ख़बर में सिर्फ केरल की बाढ़ का जिक्र है। एक और बड़े अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्स्प्रेस में सातवें पेज पर सिंगल कॉलम की ख़बर भी सिर्फ़ केरल की बाढ़ पर है। ऐसे ही हिन्दी का प्रमुख अखबार दैनिक भास्कर बाढ़ की ख़बर को पहले पन्ने पर लगाता तो है, लेकिन यहाँ भी केरल ही छाया है और असम को एक लाइन में निपटा दिया गया है।
तो केरल में बाढ़ है, कांग्रेस ज़िम्मेदार है और बाक़ी सब चंगा सी।