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सोनम वांगचुक के नाम एक ख़बरनवीस का ख़त

Satish Verma Satish Verma | 1h ago
सोनम वांगचुक के नाम एक ख़बरनवीस का ख़त

हिंदी मेनस्ट्रीम मीडिया से पिछले 20 वर्षों से जुड़े सतीश वर्मा का एक खत सोनम वांगचुक के नाम

आदरणीय सोनम वांगचुक जी,

हम नहीं चाहते हैं कि इतिहास आपको अन्ना हजारे की तरह कोट करे। लेकिन गुरुवार देर रात आपने जिस तरह सरकार के सामने हिम्मत हार दी, वो सही नहीं था। ऐसा आपने किस मजबूरी में किया, पता नहीं। कई लोगों को शुरुआत से ही इस बात की उम्मीद थी, लेकिन मैं इस यकीन में जी रहा था कि आप बिना सरकार को झुकाए हार नहीं मानेंगे।

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दुख तो इस बात की है आप सिर्फ झुके ही नहीं बल्कि अब आप सरकार की भाषा भी बोलने लगे। आपने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर हिंसा की आशंका के मद्देनजर अनशन तोड़ रहे हैं। आपने तो यहां तक कह दिया कि सभी को सतर्क रहने की ज़रूरत है। छात्रों का आंदोलन और प्रदर्शन आपको अचानक हिंसा कैसे लगने लगा। यह शब्द तो सरकार पोषित कारपोरेट मीडिया (गोदी मीडिया) के संपादक-पत्रकार और एंकर बोलते हैं। कैसे हुआ यह हृदय परिवर्तन?

कहीं आप इसी उद्देश्य से तो आंदोलन में शरीक नहीं हुए थे। कई लोगों ने तो यह कहना भी शुरू कर दिया है कि आप शुरुआत से ही कंप्रोमाइज्ड थे।

आश्चर्य की बात ये है इस वार्ता और सहमति के बिंदुओं को मंत्री जेपी नड्डा ने पढ़कर सुनाया। इस मौके पर आपके साथ लेह-लद्दाख काउंसिल के कुछ नेता भी थे। दिलचस्प ये है कि CJP के फाउंडर अभिजीत दीपके इस वार्ता और अनशन तोड़वाने में मौके पर नहीं थे लेकिन इसे उन्होंने "सुखद" बताया है।

जंतर-मंतर पर दिन-रात, धूप- बरसात, घर के लोगों की डांट-फटकार और पुलिस के लाठी-डंडों का परवाह किए बगैर जो हजारों की संख्या में छात्र आपसे उम्मीद जगाए हुए बैठे थे, उनके उम्मीदों को तो आपने एक झटके में चकनाचूर कर दिया। आपने तो आंदोलन की मूल भावना को ही ठेस पहुंचा दिया। किसी भी आंदोलन की आत्मा उसके मूल मांग में बसती है। आप सहित हजारों की संख्या में छात्र और यहां तक की कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके और उनके समर्थक भी यही मांग कर रहे थे कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देंगे आप अनशन नहीं तोड़ेंगे। आपको याद होगा कि किसान आंदोलन के दौरान इसी सरकार ने कितने हथकंडे आजमाए। आंदोलन को कमजोर करने, पंक्चर करने के लिए कितनी साजिश रची गईं, लेकिन सरकार को अंतत: हार मानते हुए किसानों से संबंधित तीन काले कानून वापस लेने पड़े। हालांकि ये अलग बात है कि आंदोलन खत्म होने के कई महीनों बाद सरकार ने चुनाव में राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अचानक से तीनों काले कानून वापस लिए।

आपका कद और आपके किए गए नेक कार्यों की फेहरिश्त इतनी लंबी है कि एकबारगी यकीन नहीं हो रहा है कि आप कंप्रोमाइज्ड हो गए या फिर आप भी अन्ना हजारे की तरह भारतीय जनता पार्टी का मोहरा भर थे। या लेह-लद्दाख की राजनीति में इंट्री को लेकर आपकी कोई महत्वाकांक्षा तो नहीं है!

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में

सतीश वर्मा

(ये लेखक के अपने विचार हैं )

Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।