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अमित मालवीय की फेक न्यूज फैक्ट्री कैसे करती थी अपना काम?

Satish Verma Satish Verma | 1h ago · 8 min read
अमित मालवीय की फेक न्यूज फैक्ट्री कैसे करती थी अपना काम?

अमित मालवीय वही शख्स हैं जिन्हें फेक न्यूज की फैक्ट्री का प्रमुख भी कहा जाता था।

जंतर-मंतर पर खासकर युवाओं और Gen Z के विरोध-प्रदर्शन ने महज महीने भर के अंदर 12 सालों में बने न सिर्फ मोदी के इमेज को ध्वस्त किया बल्कि भाजपा के इमेज पर भी बट्टा लगा दिया था। भाजपा के आईटी सेल में सोमवार को हुआ यह महत्वपूर्ण बदलाव संकेत है कि भाजपा अब प्रभावी सोशल मीडिया कम्युनिकेशन पर ज्यादा जोर दे रही है।

पार्टी ने हालिया Gen Z प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उभार से “सबक लिया” है। पार्टी ने अमित मालवीय को सोशल मीडिया संयोजक पद से हटाकर उनकी जगह दीपक म्हस्के को नियुक्त करने का फैसला किया है। म्हस्के फिलहाल छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड के प्रमुख हैं।

इसके अलावा आशीष अग्रवाल, प्रदीप भंडारी और सिद्धार्थ यादव को मीडिया सह-संयोजक नियुक्त किया गया है, जबकि प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव को सोशल मीडिया सह-संयोजक बनाया गया है। अनिल बलूनी पार्टी के मीडिया प्रभारी बने रहेंगे, जबकि हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए सांसद तरुण चुघ को कार्यालय प्रभारी नियुक्त किया गया है।

अमित मालवीय वही शख्स हैं जिन्हें फेक न्यूज की फैक्ट्री का प्रमुख भी कहा जाता था। हिंदुत्ववादी पार्टी की ऑनलाइन प्रचार मशीन के आधिकारिक प्रमुख अमित मालवीय ने पद पर रहते हुए सोशल मीडिया का ऐसा बेजा इस्तेमाल किया कि झूठ भी सच लगने लगती थी और फिर इस झूठ को व्हाट्सएप पर इतना प्रचारित किया जाता था कि यही स्थापित सच बन जाता था। अमित मालवीय ने सोशल मीडिया को ऐसा हथियार बना लिया था कि उनके झूठे दावों का असर बेहद व्यापक और खतरनाक हो गया था।

भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि,

पार्टी में कई लोग इस फैसले से खुश हैं। उनकी (मालवीय की) वजह से हमारे कंटेंट को साझा करने वाले कई इन्फ्लुएंसर्स ने भाजपा से दूरी बना ली थी। बहुत से इन्फ्लुएंसर्स केवल पैसे के लिए नहीं, बल्कि विचारधारा के कारण हमारा कंटेंट साझा करते हैं। पार्टी के भीतर वह एक पावर सेंटर बन गए थे। उन्हें हटाना जरूरी था।

आइए जानते हैं अमित मालवीय की उन करतूतों के बारे में, जिसके दम पर उन्होंने सोशल मीडिया पर झूठ का जाल रचा था।

15 जनवरी 2020 को भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल को चलाने वाले अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर कुछ अनजान लोगों का एक वीडियो साझा किया। इसमें दावा किया गया था कि दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं को विरोध-प्रदर्शन करने के लिए पैसे दिए जा रहे हैं।

Alt न्यूज़ और Newslaundry की संयुक्त जांच में मालवीय का यह आरोप निराधार पाया गया। लेकिन इससे भाजपा नेता हतोत्साहित नहीं हुए।


दो दिन बाद उन्होंने शाहीन बाग में खाना खाते एक बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर ट्वीट की। उन्होंने लिखा, शाहीन बाग में बिरयानी बांटे जाने का सबूत!” यह उस अफवाह को हवा देने वाला दावा था कि प्रदर्शनकारियों को 500 रुपये और मुफ्त खाना दिया जा रहा है। उनका यह ट्वीट अपने आप में अजीब था। क्या भाजपा नेता यह संकेत दे रहे थे कि किसी प्रदर्शन स्थल पर खाना खाना अपराध या नैतिक रूप से संदिग्ध काम है?

मालवीय के भ्रामक ट्वीट केवल शाहीन बाग तक सीमित नहीं रहे। Alt न्यूज़ काफी समय से उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की निगरानी कर रहा था और उसने पाया कि मालवीय बार-बार गलत सूचनाओं का इस्तेमाल व्यक्तियों, समुदायों, विपक्षी दलों, नेताओं और सामाजिक आंदोलनों को बदनाम करने के प्रयास में करते रहे हैं। चूंकि वह भाजपा की ऑनलाइन प्रचार मशीन के आधिकारिक प्रमुख हैं, इसलिए उनके द्वारा फैलाई गई गलत सूचनाओं का असर व्यापक होता है। उनके दावों को भाजपा के सदस्य और समर्थक आगे बढ़ाते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर गलत सूचना फैलाने वाले अभियान खड़े हो जाते हैं।

CAA प्रदर्शनकारियों को अमित मालवीय ने लेकर गलत सूचनाएं चलाई थीं। लखनऊ में प्रदर्शनकारियों ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए।

28 दिसंबर को मालवीय ने लखनऊ के क्लॉक टावर पर नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों का एक वीडियो ट्वीट किया। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों ने “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगाए।
Alt न्यूज़ ने पाया कि यह दावा गलत था। प्रदर्शनकारी पाकिस्तान समर्थक नारे नहीं लगा रहे थे, बल्कि “काशिफ साहब जिंदाबाद” कह रहे थे। वे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के लखनऊ प्रमुख काशिफ अहमद का जिक्र कर रहे थे। पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष हाजी शौकत अली ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि काशिफ अहमद ने 13 दिसंबर को राज्य की राजधानी में एक प्रदर्शन का नेतृत्व किया था।

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के छात्रों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ प्रसारित किया गया कि उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ नारे लगाए थे। 16 दिसंबर को मालवीय भी इस क्लिप को साझा करने वालों में शामिल थे।

असल में छात्र हिंदुत्व, सावरकर, भाजपा, ब्राह्मणवाद और जातिवाद के खिलाफ नारे लगा रहे थे। वे कह रहे थे कि,

“हिंदुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, सावरकर की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, ये बीजेपी की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, ब्राह्मणवाद की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, ये जातिवाद की कब्र…”

26 जनवरी को पत्रकार आरफा खानम शेरवानी के भाषण का वीडियो साझा करते हुए अमित मालवीय ने कहा कि इस्लामवादी CAA विरोध प्रदर्शनों को केवल तब तक ‘समावेशी’ रखना चाहते हैं, जब तक गैर-मुस्लिम उनकी धार्मिक पहचान, मान्यताओं और वर्चस्ववादी नारों को स्वीकार न करने लगें।

खानम ने यह भाषण अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिया था। वीडियो को काटकर गलत संदर्भ में पेश किया गया। मालवीय ने दावा किया कि पत्रकार इस्लामी समाज की स्थापना को बढ़ावा दे रही थीं और प्रदर्शनकारियों से कह रही थीं कि ऐसा समाज बनने तक गैर-मुस्लिमों के समर्थन का दिखावा किया जाए।

लेकिन खानम इसके ठीक उलट बात कह रही थीं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से धार्मिक नारों का इस्तेमाल न करने और आंदोलन के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखने की अपील की थी।

अमित मालवीय ने सबसे बचकाना हरकत नेहरू को अनैतिक दिखाने की कोशिश करके किया। इससे न सिर्फ भाजपा की किरकिरी हुई बल्कि पार्टी की पूरी विचारधारा बदनाम हो गई। नवंबर 2017 में भाजपा नेता ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कई महिलाओं के साथ तस्वीरों का एक कोलाज साझा किया। इनमें से ज्यादातर तस्वीरें नेहरू की बहन या भतीजी अथवा जैकलीन कैनेडी जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के साथ थीं।

बाद में मालवीय ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया, लेकिन इसके बावजूद दूसरे लोगों ने उस कोलाज को साझा करना जारी रखा।

27 नवंबर 2018 को मालवीय ने मनमोहन सिंह का एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री को कहते सुना जा सकता था, “मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारें बहुत अच्छी थीं। इस क्लिप से ऐसा लग रहा था कि मनमोहन सिंह भाजपा शासित राज्य सरकारों की तारीफ कर रहे हैं।

लेकिन मालवीय ने पूर्व प्रधानमंत्री के एक दिन पहले दिए गए भाषण का काटा हुआ हिस्सा साझा किया था। मनमोहन सिंह के वास्तविक शब्द थे-

मध्य प्रदेश सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे थे। हमने कभी भाजपा शासित राज्यों के साथ भेदभाव नहीं किया।”

नवंबर 2017 में मालवीय ने दावा किया कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर के रजिस्टर में खुद को “गैर-हिंदू” के रूप में दर्ज किया था।

हालांकि, हस्तलिपि के विश्लेषण में पाया गया कि रजिस्टर में मौजूद एंट्री राहुल गांधी के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हस्तलिखित नोट्स की लिखावट से मेल नहीं खाती थी

अब आइए सबसे चर्चित आलू-सोना मशीन वाले दावे पर। उसी महीने मालवीय ने राहुल गांधी का एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें वह कहते दिखाई देते हैं- ऐसी मशीन लगाऊंगा, इस साइड से आलू घुसेगा, उस साइड से सोना निकलेगा।

यह एक लंबे भाषण से काटा गया वीडियो था। राहुल गांधी वास्तव में 12 नवंबर 2017 को गुजरात के पाटन में एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कस रहे थे।

पूरे वीडियो में राहुल गांधी कहते हैं कि,

कुछ महीने पहले यहां बाढ़ आई, 500 करोड़ रुपये दूंगा, (पीएम मोदी ने) एक भी रुपया नहीं दिया। आलू के किसानों को कहा ऐसी मशीन लगाऊंगा, इस साइड से आलू घुसेगा, उस साइड से सोना निकलेगा…मेरे शब्द नहीं हैं, नरेंद्र मोदीजी के शब्द हैं।”

इतना ही नहीं अमित मालवीय ने मोदी के समर्थन में भी कई गलत सूचनाएं सोशल मीडिया पर चलवाईं।

24 जनवरी 2019 को नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान गंगा में डुबकी लगाई।

इसके बाद मालवीय ने ट्वीट किया कि मोदी इतने वर्षों में कुंभ जाने वाले “पहले राष्ट्र प्रमुख” हैं।


यह दावा दो स्तरों पर गलत था। पहला, प्रधानमंत्री भारत का राष्ट्र प्रमुख नहीं होता; भारत का राष्ट्र प्रमुख राष्ट्रपति होता है। इस आधार पर कुंभ जाने वाले पहले राष्ट्र प्रमुख भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद थे। मोदी कुंभ जाने वाले पहले प्रधानमंत्री भी नहीं थे।


मालवीय अभी भी पश्चिम बंगाल के सह-प्रभारी हैं? क्या मालवीय के हटाए जाने से भाजपा की झूठ फैलाने की फैक्ट्री बंद हो जाएगी? टीम के कप्तान बदलने से क्या टीम सुधर जाएगी?

कम से कम नई टीम में सोशल मीडिया को कनवीनर बनाए गए आलोक भट्ट के पुराने ट्वीट्स को देखकर तो यही लगता है कि ऐसी कोई उम्मीद करना ग़लत होगा। उनके पुराने ट्वीट्स आरक्षण विरोध, सांप्रदायिक घृणा और अभद्र भाषा से भरे हुए हैं।


नई टीम की एक और को-कनवीनर प्रीति गांधी का गोडसे प्रेम तो कई बार सामने आया है

विरोधियों को 'दिमाग़ी नक्सल' कहने वाली पार्टी को अपने लोगों की शायद यही भाषा पसंद है।

Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।