आवाज उठाने वाली लड़कियों को असंस्कारी या भटकी हुई बताना सवालों का जवाब नहीं हैं
ये पुरुषवादी समाज का वह नज़रिया है, जो महिलाओं को हमेशा अपनी सीमाओं में देखना चाहता है और उनकी आवाज़ को नियंत्रित करने का आदी हो चुका है।
भारत अपनी आज़ादी के 80वें साल में प्रवेश करने वाला है। इन वर्षों में देश ने ख़ूब तरक्की की है। आर्थिक विकास हो, तकनीक हो या शिक्षा, देश ने हर क्षेत्र में एक लंबी और सफल यात्रा तय की है। लेकिन जब बात आज़ादी की हो, तो किसी देश की आधी आबादी की स्थिति उस देश की आज़ादी की असल कहानी बयान करती है।
वैसे तो स्वतंत्रता से पहले की तुलना में महिला शिक्षा में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है। लड़कियाँ स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक पहुँची हैं। उन्होंने पेशेवर क्षेत्रों में अपनी जगह बनाई है और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। यह निश्चित रूप से संतोष और उम्मीद की बात है।
तरक्की के आँकड़ों के बीच क्या समाज की सोच भी बदली है?
क्या विकास के इन आँकड़ों के साथ हमारा समाज भी उतना ही आगे बढ़ा है? लेकिन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, उनकी निजता में हनन, सम्मान और अधिकारों में सेंध लगाने के मामले आज भी लगभग हर दिन सामने आते हैं। फ़र्क़ इतना है कि अब यह दख़ल सिर्फ़ घर की चारदीवारी या एक निश्चित समाज तक सीमित नहीं रह गया है, अब ये व्यापक हो गया है। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने महिलाओं को अपनी बात कहने, अपनी पहचान बनाने और अपनी आवाज़ दूर तक पहुँचाने का मंच तो दिया है, लेकिन इसी तकनीक ने उनकी निजता, गरिमा और स्वतंत्रता में कटौती के नए रास्ते भी खोल दिए हैं।
आज महिलाओं को केवल यह नहीं सोचना पड़ता कि उसे क्या कहना है, बल्कि यह भी सोचना पड़ता है कि कितना कहना है, किसके ख़िलाफ़ कहना है और किसी बात को कहने की कीमत क्या हो सकती है। बड़ी से बड़ी सार्वजनिक पद पर बैठी महिला हो या सोशल मीडिया पर अपनी पहली आवाज़ दर्ज करती कोई लड़की, अब उसके चारों ओर एक अदृश्य सा दायरा बना दिया जाता है और आधी आबादी का उस दायरे के बाहर बोलना स्वीकार्य नहीं किया जाता। किसी भी महिला के शब्दों से उसका संस्कार तक परिभाषित कर दिया जाता है, जो अमूमन समाज के दूसरे वर्गों के लिए लागू नहीं होता।
महिलाओं के सवालों का जवाब आज भी चरित्र-हनन से क्यों दिया जाता है?
ऐसे में अगर कोई महिला अपने लिए या समाज में हो रही ज्यादतियों के ख़िलाफ़ कोई सवाल उठाती है, तो उसका विरोध केवल असहमति तक सीमित नहीं रहता। उसे हक़ के लिए बोलने के एवज़ में ट्रोल किया जाता है, बलात्कार की धमकियाँ दी जाती हैं, उसकी निजी तस्वीरें बिना अनुमति सोशल मीडिया पर साझा कर मीम बनाए जाते हैं और कई बार उसे और उसके परिवार को जान से मारने तक की धमकियाँ दी जाती हैं। उसके विचारों का जवाब देने के बजाय समाज के एक बड़े तबके द्वारा उसके शरीर, उसकी निजता, उसके चरित्र और उसके परिवार को निशाना बनाया जाता है।
ऑनलाइन उत्पीड़न के बढ़ते आँकड़े और महिलाओं को चुप कराने का पुराना तरीका
यह समस्या कितनी व्यापक है, इसका अंदाज़ा गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आँकड़ों से भी लगाया जा सकता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, ऑनलाइन उत्पीड़न, पीछा करने और अश्लील संदेशों से जुड़ी शिकायतें 2020 में 11,641 से बढ़कर 2024 में 39,077 हो गईं। यह महिलाओं का विशिष्ट आँकड़ा नहीं है, लेकिन डिजिटल दुनिया में उत्पीड़न की बढ़ती समस्या की गंभीरता ज़रूर दिखाता है।
ये पुरुषवादी समाज का वह नज़रिया है, जो महिलाओं को हमेशा अपनी सीमाओं में देखना चाहता है और उनकी आवाज़ को नियंत्रित करने का आदी हो चुका है। या तबका किसी महिला के बोलने या अपने हक़ के लिए सवाल उठाने पर किस तरह विचलित होता है, इसकी कई मिसालें हमारे सामने हैं। हाल के छात्र आंदोलन के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए, जहाँ महिलाओं और लड़कियों के आंदोलन में शामिल होने, आवाज़ उठाने और सोशल मीडिया पर रील्स बनाने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया गया और उन्हें दबाने की हर मुमकिन कोशिश की गई।
जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान एक नाबालिग लड़की के मामले में सोशल मीडिया पर उसके कथित आपत्तिजनक बयान के बाद उसे और उसके परिवार को निशाना बनाए जाने की बातें सामने आईं। बाद में उससे सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मंगवाई गई। ऐसे में उस बच्ची की मानसिक स्थिति क्या कभी ऐसी हो पाएगी कि वो दोबारा उठकर सवाल कर सके और अपने हक़ में आवाज़ उठा सके? इसी तरह आंदोलन से चर्चा में आई रिहा अहीर को भी ऑनलाइन ट्रोलिंग, धमकी, गाली-गलौज और चरित्र-हनन का सामना करना पड़ा।

यहाँ तक कि उनकी पुरानी तस्वीरों को लेकर उन्हें बदनाम करने की भी ख़ूब कोशिश की गई, जिसके बाद उन्हें साइबर पुलिस में शिकायत करने की नौबत आ गई। वहीं AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, जो NEET पेपर लीक मामले में लगातार सक्रिय रूप से शामिल रही हैं। उन पर रांची में उपद्रवियों द्वारा स्याही फेंका जाना इस बात को दर्शाता है कि हम विज्ञान और तकनीक में दिन-ब-दिन आगे बढ़ रहे हों, लेकिन एक समाज के रूप में आज भी संकीर्ण और पिछड़ी हुई मानसिकता के शिकार हैं।
सत्ता से सवाल करना लोकतांत्रिक अधिकार है ,या संस्कार?
इन घटनाओं में एक बात समान है। आज भी हमारा पुरुषवादी समाज महिलाओं की आवाज़ को जवाब देने के बजाय उसे चुप कराने की कोशिश में लगा हुआ है। आज भी समाज एक पढ़ी-लिखी महिला के साथ वही व्यवहार करता है, जो अस्सी के दशक में सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ जैसी शिक्षा की ज्योति जलाने वाली महिलाओं के साथ किया जाता था। आज भी शिक्षित महिला के सवाल के जवाब में उसका चरित्र-हनन ही होता है। हद तो यह है कि महिलाओं के साथ ऐसा करने वाले ज़्यादातर लोग बेख़ौफ़ और खुले घूमते हैं। उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती , यहां तक कि उन्हें कभी कभी सरकारी संरक्षण तक मिल जाता है।
कई बार सरकारें ख़ुद समाज के उस पक्ष में खड़ी होती हैं, जहाँ महिलाओं और लड़कियों के हक़ और आवाज़ को कुचला जाता है।
हाल में उत्तराखंड में एक नेशनल ताइक्वांडो खिलाड़ी से जुड़ा मामला भी इसी बात को सामने लाता है । जब महिला खिलाड़ी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने अपनी खेल उपलब्धियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के रास्ते में आर्थिक अड़चन की बात रखी, तो मुख्यमंत्री ने उसके बात की अनदेखी कर दी। लेकिन जब इस घटना का वीडियो वायरल हुआ, तो इसके जवाब में उसी लड़की का एक अन्य वीडियो सामने आया, जिसमें उसने अपने पहले वाले बयान को लेकर सफ़ाई दी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल ज़रूर खड़ा किया। जब कोई लड़की सत्ता के सामने अपनी शिकायत लेकर खड़ी होती है, तो क्या उसे अपनी बात पूरी तरह कहने का सुरक्षित माहौल मिलता है? क्या सरकार को अपनी तथाकथित अच्छी छवि बिगड़ जाने का इतना ख़तरा होता है कि वो बच्चियों पर दबाव बनाकर माफ़ी मंगवाती है या उनके बयान बदलवाए जाते हैं?
लोकतंत्र में नागरिक जनता है, प्रजा नहीं, उनके सवाल को अनुशासनहीनता क्यों समझा जाता है?
यह दबाव केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। जंतर-मंतर पर हुए हालिया विरोध प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रील बनाकर प्रदर्शन के दौरान बच्चों द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा पर प्रतिक्रिया दी और माफ़ी करने का एक नया चलन भी शुरू किया। रील के ज़रिये बच्चों के विरोध को भटकाव और शरारती व्यवहार के खाँचे में फिट करने की ज़बरन कोशिश भी दिखाई दी। हालाँकि भाषा की मर्यादा पर सवाल उठाना बिल्कुल सही है। किसी भी विरोध या प्रदर्शन में किसी भी तरह की गाली-गलौज का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक की असहमति को उसके संस्कार से जोड़कर देखा जाना चाहिए?
क्या सरकार से सवाल पूछने वाली लड़कियों को यह समझाने की ज़रूरत है कि वे संस्कारी होकर बोलें? उन्होंने सरकार से सवाल पूछा, इसके लिए उन्हें प्रताड़ित किया जाए? जबकि इन सवालों का जवाब यह है कि सरकार को ख़ुद समझने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है और वो ऐसा करते रहेंगे। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के लोगों को यह समझना चाहिए कि वो देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं, जनता के पिता नहीं। जनता ने उन्हें सत्ता इसलिए दी है ताकि वे शासन के लिए जवाबदेह रहें, न कि इसलिए कि जनता जब उनसे सवाल करे तो उसे संस्कार का पाठ पढ़ाया जाए। एक स्वस्थ लोकतंत्र में नेता और नागरिक के बीच संवाद, सहमति-असहमति और सवाल-जवाब लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताक़त होते हैं।
महिला अगर सत्ता से सवाल करती है तो उसे बिगड़ी हुई, असंस्कारी या भटकी हुई बताना उस सवाल का उत्तर नहीं है। यह सिर्फ़ उस पितृसत्तात्मक सोच का विस्तार है, जिसमें महिला की स्वतंत्र आवाज़ को आज़ादी नहीं, अनुशासन तोड़ना समझा जाता है। यह हमला केवल आम महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस महिला को अपनी चपेट में ले लेता है, जो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलती है। चाहे वो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाली जेन ज़ी बच्चियाँ हों, या देश के लिए स्वर्ण पदक लाने वाली महिला खिलाड़ी हों, सरकार के ख़िलाफ़ मुखरता से अपनी राय रखने वाली अभिनेत्री हो, पत्रकार हो, लेखिका हो या मानवाधिकार कार्यकर्ता हो, कोई सुरक्षित नहीं है। जिसके भी मुँह में ज़बान है, वो कुंठित समाज और सत्ता के निशाने पर है।
देश की असली प्रगति महिलाओं की आज़ादी से तय होगी
विडंबना यह है कि यह सब उस देश में हो रहा है, जो स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। हमारा संविधान महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने का अधिकार देता है। सरकारें महिला सशक्तिकरण की योजनाएँ बनाती हैं, बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा की बात करती हैं। लेकिन असल में जब वही बेटी सवाल पूछती है, विरोध करती है या सत्ता के सामने खड़ी होती है, तब उसकी आवाज़ कुचल दी जाती है। किसी महिला को बोलने के लिए केवल मंच दे देना पर्याप्त नहीं होता। उसे उस मंच पर बिना डर, बिना अपमान और बिना किसी अदृश्य सामाजिक पहरे के बोलने की आज़ादी देना ही वास्तविक स्वतंत्रता है।
आख़िरकार सवाल यह नहीं है कि हमने महिलाओं को कितने अधिकार दिए हैं। सवाल यह है कि क्या हमारा समाज और हमारी व्यवस्था उन अधिकारों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार भी है? क्योंकि किसी देश की असली प्रगति इस बात से नहीं मापी जाती कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, तकनीक कितनी आगे बढ़ी है या विकास के आँकड़े कितने बेहतर हुए हैं। किसी देश की असली प्रगति इस बात से भी मापी जाती है कि उसकी आधी आबादी कितनी आज़ादी और आत्मसम्मान के साथ रहती है।
इसलिए देश का असली विकास तब होगा, जब देश में महिलाएँ अपने हक़ की बात कर सकें, समाज और सत्ता के सामने खड़ी होकर सवाल पूछ सकें और बदले में उन्हें चुप कराने के बजाय उनका जवाब दिया जाए।