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2022 के खरगौन हिंसा मामले के सभी 11 मुस्लिम आरोपी बरी, इनके घरों पर चला था बुलडोजर

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
2022 के खरगौन हिंसा मामले के सभी 11 मुस्लिम आरोपी बरी, इनके घरों पर चला था बुलडोजर

मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी जुलूस के दौरान 2022 में हुई थी हिंसा।

मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी जुलूस के दौरान 2022 में हुई हिंसा के मामले में मुस्लिम समाज के 11 आरोपियों को एक स्थानीय अदालत ने बरी कर दिया है। यह फैसला 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स' (APCR) की अगुवाई में किए गए कानूनी बचाव के बाद आया है।

Live L:aw की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला सोमवार को खरगोन (मंडलेश्वर) की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने सुनाया। बता दें कि मामला खरगोन पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 237/2022 से जुड़ा था। APCR के अनुसार, संगठन की ओर से आरोपियों का प्रतिनिधित्व कर रहीं वकील रेखा श्रीवास्तव ने पूरे मुकदमे की सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रहा। अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलें मानीं और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

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APCR के अनुसार,

अदालत का फैसला हिंसा के चार साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद आया है जिसमें एक मुस्लिम युवक, इब्रिस खान, मारा गया था। कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था और मुस्लिम समुदाय के 45 लोगों के संपत्तियों को गिरा दिया गया था। पुलिस ने 11 लोगों- इबादत, सादिक, अब्दुल्ला, साहेब उर्फ शाहिब, शेरयार, फैजल, आजम, शब्बीर, इमरान, मुस्ताक और राजिक को आरोपी बनाया था। इन पर दंगा करने, आगजनी, घर में जबरदस्ती घुसने और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे

गौरतलब है यह मामला 10 अप्रैल, 2022 को भटवाड़ी मोहल्ले में रामनवमी जुलूस के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मुस्लिम युवकों के एक समूह ने हिंदू घरों पर पत्थर और पेट्रोल बम से हमला किया था जिससे घरों और वाहनों को नुकसान पहुंचा।

अदालत ने अभियोजन पक्ष के 13 गवाहों की जांच की। APCR ने बताया कि उनमें से आठ, जिनमें अधिकांश शिकायतकर्ता भी शामिल थे, अपने बयान से मुकर गए। सभी गवाह अदालत में किसी भी आरोपी की पहचान नहीं कर पाए। अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से एक चश्मदीद गवाह पर टिका था। अदालत ने घटना के समय, हमलावरों की संख्या और क्या चेहरे ढके हुए थे, इस बारे में विरोधाभासों के कारण उसकी गवाही को अविश्वसनीय पाया। बचाव पक्ष की दलीलों पर गौर करते हुए अदालत ने पाया कि गवाह का बयान घटना के 51 दिन बाद बिना किसी स्पष्टीकरण के दर्ज किया गया था और उसका नाम एफआईआर या शुरुआती शिकायतों में चश्मदीद गवाह के तौर पर नहीं था।

अदालत ने जांच में खामियों की ओर भी इशारा किया। APCR के वकील ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया था कि,

पहचान विवादित होने के बावजूद कोई 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (TIP) नहीं कराई गई। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में जब्त की गई सामग्री पर पेट्रोल, डीजल या केरोसिन के अंश नहीं मिले, जिससे पेट्रोल बम के आरोप कमजोर पड़ गए और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत लगाए गए आरोप भी कमजोर हो गए। संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया।

फैसले का स्वागत करते हुए एसोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स' (APCR) ने कहा कि यह फैसला उचित कानूनी प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई को मज़बूत करता है। APCR के अनुसार, सुनवाई के दौरान 11 आरोपियों ने 462 से 827 दिन जेल में बिताए। संगठन ने कहा कि वह गलत तरीके से मुकदमा झेलने वाले पीड़ितों को कानूनी मदद देने और धर्म या पहचान से परे, उचित कानूनी प्रक्रिया, निष्पक्ष सुनवाई और समान सुरक्षा जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

बता दें कि 'सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म' (CSSS) की 2022 की एक तथ्य-खोज रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि गिरफ्तारियों और तोड़-फोड़ की कार्रवाई में मुसलमानों को खास तौर पर निशाना बनाया गया, रूट से जुड़े विवादों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की भूमिका थी और पुलिस की कार्रवाई पक्षपातपूर्ण थी। इन आरोपों का तत्कालीन राज्य सरकार ने खंडन किया था। हिंसा के अगले दिन प्रशासन ने बुलडोजर के जरिए कई घरों को ढहा दिया था। उस समय मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार थी। कहा गया था कि ये हिंसा आरोपियों के घर हैं। मध्यप्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा था कि,

जिस घर से पत्थर आए हैं, उस घर को ही पत्थरों का ढेर बनाएंगे। बाद में बयान से मुकरते हुए नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि घरों और दुकानों को अतिक्रमण के कारण ढहाया गया है और ये कानूनी दायरे में हो रहा है।