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का वर्षा जब कृषि सुखानी... क्यों नहीं हो रही वर्षा?

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
का वर्षा जब कृषि सुखानी... क्यों नहीं हो रही वर्षा?

अगस्त और सितंबर में भी भारतीय मौसम विभाग ने कम वर्षा की आशंका जताई है।

आषाढ और सावन में बदरा नहीं बरसे तो इससे बड़ी आपदा और क्या हो सकती है। मानसून कहीं ठहर गया है। जून में तो लू ने लोगों को बेहाल किया और जुलाई में भी बस नाममात्र ही वर्षा हुई। जुलाई में भारत ने मौसम के दो बिल्कुल विपरीत रूप देखे। कहीं बाढ़ तो कहीं सुखा। गुजरात, असम, महाराष्ट्र और ओडिशा में अत्यधिक बारिश के कारण बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुईं, वहीं देश के अधिकांश हिस्सों में गर्म और शुष्क मौसम के कारण हीटवेव की स्थिति बनी रही। जुलाई जैसे मानसूनी महीने में इस तरह की स्थिति को दुर्लभ माना जा रहा है। अगस्त और सितंबर को लेकर भी भारतीय मौसम विभाग ने कम वर्षा की आशंका जताई है।

Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने शुक्रवार को कहा कि मानसून सीजन के दूसरे हिस्से में पूरे देश में औसत बारिश के "सबसे अधिक संभावना" सामान्य से कम रहने की है। इसका मतलब है कि बारिश लंबी अवधि के औसत यानी LPA के 94 प्रतिशत से भी कम रह सकती है।

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जून से सितंबर तक चलने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की सालाना बारिश का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा लेकर आता है। इसलिए यह खेती, जलाशयों में पानी के भंडारण, पनबिजली उत्पादन और देश की व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मानसून के पहले आधे हिस्से में कम बारिश के बाद अब अगस्त और सितंबर में भी भारत में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। मानसून के पहले हिस्से में जहां देश के बड़े इलाके सूखे रहे, वहीं कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश के कारण बाढ़ जैसी स्थिति बनी।

बता दें कि देश में बारिश का असमान पैटर्न पहले से दिखाई दे रहा है। 1 जून से 30 जुलाई के बीच देश में कुल बारिश लंबी अवधि के औसत से करीब 13 प्रतिशत कम रही। देश के कुल क्षेत्रफल के एक-तिहाई से थोड़ा अधिक हिस्से में फैले 16 राज्यों में बारिश की कमी दर्ज की गई। 'कम बारिश' की श्रेणी में सामान्य से 19 से 59 प्रतिशत तक कम बारिश को रखा जाता है। बारिश के आंकड़ों के लिए आकलन किए गए 734 जिलों में से 360 जिलों में कम या बहुत कम बारिश हुई। 'बहुत कम बारिश' का मतलब सामान्य से 60 प्रतिशत या उससे भी अधिक कमी है। इसके विपरीत 101 जिलों में सामान्य से अधिक या बहुत अधिक बारिश दर्ज की गई। इस मौसम में धान, सोयाबीन, मक्का, दालें, मूंगफली और कपास जैसी प्रमुख फसलें उगाई जाती हैं। इसलिए मानसून की स्थिति सीधे तौर पर कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।


अब मानसून के दूसरे हिस्से यानी अगस्त और सितंबर के लिए भी कमजोर बारिश का अनुमान ऐसे समय आया है जब मानसून पर El Niño का प्रभाव बना हुआ है। El Nino भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में बढ़ोतरी की स्थिति है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी हवाओं को कमजोर कर सकती है। हालांकि कृषि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि सामान्य से कम बारिश का फसलों पर कितना असर पड़ेगा। फसलों की पैदावार काफी हद तक स्थानीय परिस्थितियों के साथ-साथ इस बात पर निर्भर करती है कि बारिश कब और कितनी हुई।

पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के मौसम वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल के अनुसार,

"हम जो पैटर्न देख रहे हैं, उनमें जलवायु परिवर्तन और El Nino दोनों का संयुक्त प्रभाव दिखाई देता है।" El Nino के प्रभाव के कारण मानसूनी हवाएं आम तौर पर सामान्य से कमजोर रही हैं। दूसरी तरफ अरब सागर और हिंद महासागर असामान्य रूप से गर्म हैं, जिससे वातावरण में बड़ी मात्रा में नमी उपलब्ध है। जब थोड़े समय के लिए मानसूनी हवाएं मजबूत होती हैं, तो यह नमी तेजी से आगे बढ़ती है और कम समय में बहुत तेज बारिश का कारण बनती है।

हालांकि IMD के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि जुलाई में हुई अच्छी बारिश ने जून में दर्ज 35 प्रतिशत की बारिश की कमी को काफी हद तक कम किया। जुलाई के दौरान बंगाल की खाड़ी में चार कम दबाव के क्षेत्र बने। इनमें से दो बाद में गहरे दबाव यानी 'डीप डिप्रेशन' में बदल गए। इनके कारण मध्य भारत के बड़े हिस्से में व्यापक बारिश हुई। ऐसी मौसम प्रणालियां समुद्र से नमी को भारतीय भूभाग तक पहुंचाने और बारिश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

महापात्र के मुताबिक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में मध्यम El Nino की स्थिति के बावजूद बंगाल की खाड़ी में बने इन सिस्टमों ने पूर्व-मध्य और पश्चिम-मध्य भारत में बारिश बनाए रखने में मदद की। IMD ने अगस्त के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम तापमान भी सामान्य से ज्यादा रहने का अनुमान जताया है। कुछ कृषि मौसम विशेषज्ञों को चिंता है कि मानसून के दूसरे हिस्से में सामान्य से कम बारिश सितंबर तक कुछ इलाकों में 'टर्मिनल ड्रॉट' यानी मानसून के आखिरी चरण में सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। गुजरात की आनंद कृषि विश्वविद्यालय के कृषि मौसम विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख मनोज लुनागरिया ने कहा कि ऐसी स्थिति मूंगफली, कपास और धान जैसी फसलों को प्रभावित कर सकती है।

बेहद शुष्क जून और मानसून की कमजोर शुरुआत के बाद जुलाई का मौसम चरम स्थितियों वाला रहा। जुलाई में कई दिन भारी बारिश हुई और कुछ जगहों पर ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बने। लेकिन इसी दौरान लंबे समय तक बारिश न होने के दौर भी देखने को मिले। जुलाई की शुरुआत देशभर में करीब 35 प्रतिशत बारिश की कमी के साथ हुई थी। इस स्थिति ने एक पुराने सवाल को फिर से चर्चा में ला दिया है कि क्या भारत में मानसून के 'ब्रेक' यानी बारिश रुकने के दौर लंबे और ज्यादा बार होने लगे हैं?

IITM के वैज्ञानिक डॉ. राजीब चट्टोपाध्याय के मुताबिक

'एक्टिव-ब्रेक मानसून चक्र' मानसून के दौरान अधिक बारिश वाले 'एक्टिव' दौर और कम बारिश वाले 'ब्रेक' दौर के बीच होने वाले बदलाव को कहा जाता है। ये उतार-चढ़ाव लगभग 10 से 90 दिनों की अवधि में हो सकते हैं और भारतीय मानसून की एक सामान्य विशेषता हैं।

मानसून के 'ब्रेक फेज' के दौरान मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश तेजी से घट जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानसून ट्रफ उत्तर की ओर खिसककर हिमालय की तलहटी के करीब पहुंच जाता है। इस दौरान बंगाल की खाड़ी से आने वाली बारिश कराने वाली मौसम प्रणालियां भी कम हो जाती हैं। इसके विपरीत बारिश हिमालय की तलहटी, पूर्वोत्तर भारत और कभी-कभी भूमध्यरेखीय हिंद महासागर की ओर बढ़ जाती है।

डॉ. चट्टोपाध्याय के मुताबिक,

मानसून के दौरान बारिश में होने वाले प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का ही एक हिस्सा 'ब्रेक' है। इसके उलट जब बड़े क्षेत्र में लगातार भारी बारिश होती है, तो उसे 'एक्टिव स्पेल' कहा जाता है।

नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस और यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक डॉ. अक्षय देओरस के मुताबिक,

मानसून के भीतर इस तरह का उतार-चढ़ाव सामान्य है, खासकर El Nino वाले वर्षों में। El Nino आम तौर पर मानसून को कमजोर करता है, लेकिन कम अवधि के वायुमंडलीय बदलावों के कारण बीच-बीच में बहुत तेज बारिश भी हो सकती है। इस साल कमजोर जून और मौजूदा मानसून ब्रेक के पीछे एक समान कारण दिखाई देता है।

डॉ. देओरस के मुताबिक जून में मानसून के धीमी गति से आगे बढ़ने का संबंध भारत के पश्चिम और उत्तर-पश्चिम के शुष्क क्षेत्रों से आने वाली बेहद सूखी हवा से था। ये सूखी हवाएं वातावरण को स्थिर करती हैं, जिससे बारिश वाले बादलों का निर्माण कम होता है और बारिश घट जाती है। ऐसी ही सूखी हवाएं इस समय भी भारत को प्रभावित कर रही हैं और मानसून को कमजोर करने में योगदान दे रही हैं।

उनके शोध के मुताबिक मानसून के ज्यादातर ब्रेक फेज का संबंध ऐसी सूखी हवाओं से होता है। जब इन हवाओं का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है, तो मानसून ब्रेक भी ज्यादा गंभीर हो सकता है। इस साल बारिश में आए बड़े उतार-चढ़ाव के कारण यह सवाल फिर उठा है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय में मानसून ब्रेक बढ़ने के प्रमाण अभी स्पष्ट नहीं हैं। डॉ. चट्टोपाध्याय के मुताबिक लंबे सूखे दौर से फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है, सिंचाई की लागत बढ़ सकती है और खाद के इस्तेमाल पर असर पड़ सकता है।