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काजीरंगा के एनिमल कॉरिडोर में होटल बनाने पर असम सरकार क्यों है चुप ?

TCN Desk TCN Desk | 22 Aug, 2026 · 7 min read
काजीरंगा के एनिमल कॉरिडोर में होटल बनाने पर असम सरकार क्यों है चुप ?

इस पूरे विवाद के केंद्र में इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) से जुड़े नियम हैं।

असम सरकार ने मार्च 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति की ओर से मांगी गई जानकारी के बावजूद काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के नौ वन्यजीव गलियारों में हो रहे निर्माण कार्यों का आवश्यक ब्योरा अब तक उपलब्ध नहीं कराया है। समिति ने 2019 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद पार्क के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) के 10 किलोमीटर के दायरे में हुए सभी निर्माण कार्यों की जानकारी मांगी थी, जिसमें इन महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों में खनन और नए निर्माण पर रोक लगाई गई थी।


The Hindu के एक रिपोर्ट के अनुसार,

सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने मार्च 2022 में असम सरकार के अधिकारियों के साथ बैठक कर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने पर चर्चा की थी। अदालत का यह आदेश उस याचिका के बाद आया था, जिसमें अवैध पत्थर खनन से काजीरंगा की पारिस्थितिकी को हो रहे खतरे का मुद्दा उठाया गया था। आदेश में चिह्नित वन्यजीव गलियारों के भीतर निजी जमीन पर भी नए निर्माण को विशेष रूप से प्रतिबंधित किया गया था।

CEC ने अप्रैल 2022 और फिर मार्च 2026 में रिमाइंडर भेजे, लेकिन इसके बावजूद असम सरकार ने मांगी गई जानकारी जमा नहीं की। पत्राचार से पता चला कि CEC के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ने पुष्टि की कि दो औपचारिक रिमाइंडर के बाद भी असम से कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई।

सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में असम के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने कहा कि मामला “न्यायालय में विचाराधीन” होने के कारण जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। हालांकि, विभाग ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कौन-सा मामला अदालत में लंबित है।

मार्च 2022 की बैठक में CEC ने प्रत्येक वन्यजीव गलियारे में हुए निर्माण कार्यों की सूची, गलियारों के सीमांकन से पहले और बाद की तस्वीरें, निर्माण की अनुमति देने वाले अधिकारियों के नाम और पद तथा संबंधित लाइसेंस की प्रतियां मांगी थीं। समिति ने अवैध निर्माण हटाने के लिए की गई कार्रवाई और जारी अधिसूचनाओं का ब्योरा भी मांगा था। इसके अलावा, काजीरंगा को कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों से जोड़ने वाले गलियारों के सीमांकन के लिए गठित समितियों की जानकारी भी मांगी गई थी।

हाल के वर्षों में काजीरंगा नेशनल पार्क कई कारणों से चर्चा में रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इको-सेंसिटिव ज़ोन की सामान्य 10 किलोमीटर की सीमा को घटाकर 1 से 3 किलोमीटर तक करने का समर्थन किया है। रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि काजीरंगा की आर्द्रभूमि को पानी देने वाली देइहोरी नदी में अवैध रेत खनन का मुद्दा स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उठाया है।

कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया जारी रहने के बीच वैज्ञानिक अध्ययनों ने काजीरंगा क्षेत्र के पारिस्थितिक महत्व को भी रेखांकित किया है। शोध में पता चला है कि पार्क में ग्रेटर हॉग बैजर की एक ऐसी आबादी मौजूद है, जिसके बारे में पहले ज्यादा जानकारी नहीं थी। यह एक संवेदनशील प्रजाति है और इसकी मौजूदगी वन्यजीव गलियारों को बिना बाधा बनाए रखने के महत्व को दर्शाती है।

कैमरा ट्रैप सर्वे से भी पता चला है कि ये गलियारे केवल गैंडे और बाघ जैसे प्रमुख वन्यजीवों के लिए ही नहीं, बल्कि कम चर्चित प्रजातियों की आवाजाही और अस्तित्व के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। हालिया शोध के मुताबिक ऐसी प्रजातियों की मौजूदगी स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मानी जाती है।

काजीरंगा के एक वन अधिकारी ने कहा,

ग्रेटर हॉग बैजर ज्यादातर उन्हीं क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां पारिस्थितिकी तंत्र अब भी प्राकृतिक और काफी हद तक अछूता है। इसलिए इन्हें अच्छे इकोसिस्टम का संकेतक माना जाता है।

विवाद के केंद्र में काजीरंगा नेशनल पार्क की सीमा के पास स्थित 10 एकड़ जमीन है। पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य में स्थित काजीरंगा दुनिया में एक सींग वाले गैंडों की सबसे बड़ी आबादी के लिए प्रसिद्ध है। काजीरंगा के व्यस्त कोहोरा रेंज के पास स्थित इस जमीन को असम टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (ATDC) ने जून 2024 में अधिग्रहित किया था। इसका उद्देश्य पार्क के आसपास हाई-एंड पर्यटन सुविधाओं का विस्तार करना था।

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल काजीरंगा को भारत की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण कहानियों में से एक माना जाता है। यहां दूर-दूर तक फैली ऊंची हाथी घास, दलदली क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय जंगल, पहाड़ियां और पार्क के आसपास के चाय बागान दुनियाभर के वन्यजीव प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। 2006 में काजीरंगा को टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया था। यहां 100 से अधिक बाघ भी पाए जाते हैं। करीब 430 वर्ग किलोमीटर में फैला काजीरंगा कई रेंज में विभाजित है और कोहोरा इसका प्रमुख पर्यटन केंद्र है। पार्क अधिकारियों के मुताबिक, 2025-26 में काजीरंगा में 5.48 लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे, जिनमें 32,000 से ज्यादा विदेशी पर्यटक शामिल थे। इससे करीब 11 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। इन आंकड़ों ने क्षेत्र में पर्यटन संबंधी बुनियादी ढांचे को विकसित करने की सरकार की योजना को और बल दिया है।

इस योजना ने 2023 में ठोस रूप लेना शुरू किया, जब असम कैबिनेट ने जेनिप्रो होटल्स के साथ लीज समझौते को मंजूरी दी। जेनिप्रो होटल्स, सराफ होटल एंटरप्राइजेज की समूह कंपनी है, जिसका संबंध हयात ग्रुप ऑफ होटल्स से है। ग्रेटर काजीरंगा लैंड एंड ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी (GKLHRPC) के अनुसार, जुलाई 2024 में जुनिपर होटल्स ने काजीरंगा में एक पांच सितारा होटल/रिसॉर्ट विकसित करने की योजना की घोषणा की। GKLHRPC एक जमीनी सामुदायिक संगठन है, जो 100 से अधिक गांवों में काम करता है।

जुनिपर होटल्स का सह-स्वामित्व सराफ होटल्स और टू सीज होल्डिंग्स के पास है। टू सीज होल्डिंग्स, हयात होटल्स कॉरपोरेशन से संबद्ध है। यह घटनाक्रम तब सामने आया जब जुनिपर होटल्स ने जेनिप्रो होटल्स प्राइवेट लिमिटेड में 100 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली। जेनिप्रो ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी PPP मॉडल के तहत ATDC से जमीन लीज पर ली थी।

इस पूरे विवाद के केंद्र में भारत के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) से जुड़े नियम हैं। इनका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों और व्यावसायिक गतिविधियों के बीच एक बफर क्षेत्र तैयार करना है।

दूसरी राष्ट्रीय वन्यजीव कार्ययोजना (2002-2016) के तहत राज्यों को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास 10 किलोमीटर तक के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था।

इसके बाद इन सुरक्षा प्रावधानों में बदलाव आए। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सभी संरक्षित क्षेत्रों की सीमा से कम से कम एक किलोमीटर तक ESZ होना चाहिए। अगले वर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय पारिस्थितिक परिस्थितियों के आधार पर ऐसे क्षेत्रों की सीमा अलग-अलग हो सकती है और यह 500 मीटर से लेकर 10 किलोमीटर तक हो सकती है। आलोचकों का कहना है कि बफर क्षेत्र को कम करने से पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण जमीन व्यावसायिक हितों के लिए खुल सकती है।


गुवाहाटी हाई कोर्ट में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाले 12 याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकील संतनु बोरठाकुर ने ‘द टेलीग्राफ' से कहा,

यह पारिस्थितिक और सामाजिक—दोनों दृष्टि से बेहद चिंताजनक है।” इको-सेंसिटिव ज़ोन को 10 किलोमीटर से घटाकर केवल एक किलोमीटर करने के फैसले की गंभीरता से जांच करने की जरूरत है। इसका सीधा परिणाम स्पष्ट है—एक बहुत बड़ा इलाका निर्माण के लिए खुल जाएगा और इसमें से काफी जमीन कॉरपोरेट समूहों, राजनेताओं या दूसरे प्रभावशाली हितों के नियंत्रण में जा सकती है।”

बोरठाकुर के मुताबिक,

इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि स्थानीय मूल निवासियों को उनकी जमीन से हटाया जा रहा है। उन्होंने स्थानीय समुदायों पर पड़ रहे प्रभाव का भी जिक्र किया। बोरठाकुर के अनुसार, कई परिवारों के पास जमीन के दस्तावेज हैं या वे सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त आवंटन के तहत पीढ़ियों से उस जमीन पर खेती करते आए हैं। लेकिन अब कुछ परिवारों को राजस्व अधिकारियों की ओर से बताया जा रहा है कि कानूनी रूप से वह जमीन उनकी नहीं है।

बोरठाकुर कहते हैं,

लोग एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं—अगर यह हमारी जमीन नहीं है, तो फिर हमारी जमीन कहां है?

उनका कहना है कि जब विस्थापन को टाला नहीं जा सकता, तब भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह वैकल्पिक जमीन की पहचान करे और प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा उपलब्ध कराए। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ स्थानीय निवासियों और GKLHRPC ने लगातार विरोध किया है। संगठन का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया भूमि अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े संरक्षणों का उल्लंघन करती है।