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सांप्रदायिकता के खिलाफ तन कर खड़े रहे प्रेमचंद

Satish Verma Satish Verma | 17h ago
सांप्रदायिकता के खिलाफ तन कर खड़े रहे प्रेमचंद

प्रेमचंद की कहानियों में हिन्दू मुस्लिम एकता का संदेश है।

आज हिन्दी के अप्रतिम साहित्यकार, उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की 146वीं जयंती है। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही में जन्मे प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।। प्रेमचंद की कहानियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 20वीं सदी में थी। अगर आप उनकी कहानियों का पुनर्पाठ करेंगे तो आपको ये बखूबी समझ में आ जाएगा कि सांप्रदायिकता का जो विषवेल आज समाज में फैल रहा है उसे प्रेमचंद ने पहले ही भांप लिया था। एक सजग रचनाकार दूरदर्शी होता है। प्रेमचंद ने अपने समय के जिस सच को कहानियों और उपन्यासों में बयां किया था, अचरज की बात है कि आज भी वही सच हमारे सामने मुंह बाए खड़ा है। तमाम प्रगतिशीलता, वैज्ञानिक चिंतन के बावजूद हम आज भी उसी अंधकूप में कैद है तो इसका मतलब है कि किसी ने हमारे आंखो पर पट्टी बांध रखी है।

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प्रेमचंद को पढ़ना और उनके किरदारों से परिचित होना, एक युवा मन के लिए उस समाज की असलियत को समझने जैसा था जिसमें हम रहते हैं। उनकी कहानियों ने पुरानी सोच को बदला और उनके शब्दों के ज़रिए कड़वा सच सामने आया। हिंदी साहित्य के इस आधुनिक और महान लेखक की कहानियां और उनके रचे हुए किरदार आज भी हमें समाज का आईना दिखाते हैं।

भारत में सांप्रदायिकता अपने सबसे वीभत्स और भयानक रूप में है। पूरा समाज इसकी संकीर्ण और असहिष्णु ताकत से खतरे में है। नफरती विचारधारा इतनी उग्र और वीभत्स रूप में दिखने लगी है कि एक संवेदनशील इंसान इससे लड़ने की ताकत तो जुटा पा रहा है लेकिन सांप्रदायिकता का दैत्य इतना शक्तिशाली हो गया है कि समाज का प्रगतिशील और वैज्ञानिक चिंतनधारा कभी-कभी निराश हो जा रहा है। लेकिन जब हम प्रेमचंद की कहानियों का पुनर्पाठ करते हैं तो हमें सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों से लड़ने के लिए साहस मिलती है।

प्रेमचंद की एक कहानी है ‘बासी भात में खुदा का साझा।' इस कहानी में प्रेमचंद दो पात्र जावेद अख्तर और मौलाना नदवी के बीच हुई बहस के माध्यम से ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं।

1934 में लिखी इस कहानी के मुख्य पात्र दीनानाथ को लंबी बेरोजगारी झेलने के बाद जब नौकरी मिली तो उसकी पत्नी गौरी ने कहा कि 'यह ईश्वर की कृपा और दयालुता का फल है'। दीनानाथ का कहना था कि' यह मेरी दौड़ धूप का नतीजा है, ईश्वर की क्या दयालुता? ईश्वर को तो तब जानता, जब कहीं से छप्पर फाड़ के भेज देते। फिर नौकरी के दौरान यह हुआ कि उनके सेठ ने खुश होकर उनकी तरक्की कर दी। साथ ही उनकी कर्तव्यपरायणता का हवाला देकर उन्हें बही खाते में हेरफेर करने को कहा ताकि उन्हें अपने हिस्सेदारों को मुनाफे में ज्यादा साझा न देना पड़े। दीनानाथ की ईश्वर निष्ठा उसे सदैव डराती थी कि इस अपराध का भयंकर दंड मिलेगा।

इस शंका ने उसके जीवन का उत्साह, आनंद और माधुर्य सब कुछ हर लिया। फिर मलेरिया फैला और उसके बेटे को बुखार आ गया। दीनानाथ को लगा कि दंड का विधान आ पहुंचा। लेकिन डाक्टर के इलाज से बेटा ठीक हो गया थोड़े समय बाद वह खुद बीमार हो गया। अब उसे लगा कि उसे ईश्वर का दंड अब अवश्य मिलेगा। लेकिन दीनानाथ मिथ्यावादी न था, बुद्धिवादी था। फिर भी ईश्वर की दया और दंड भावना संस्कार में बद्धमूल हो गई थी। उसका तर्कवाद और बुद्धिवाद इससे चोटिल होता रहता था। लेकिन जिंदगी बाकी थी, बच गया। ताकत आते ही दफ्तर जाने लगा। एक दिन उसकी पत्नी गौरी बोली कि जब वह बीमार था तो उसने उसके स्वस्थ होने के लिए भगवान से पचास ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प लिया था। दीनानाथ ने कहा कि' क्या मैं भगवान की दया से अच्छा हुआ हूँ?' पत्नी ने कहा मनौती पूरी करनी होगी।

पति ने कहा-'कभी नहीं, मैं भगवान को दयालु नहीं मानता। तुम्हारा ईश्वर दंड- भय से सृष्टि का संचालन करता है। फिर उसमे और मनुष्य में क्या फर्क हुआ?आतंक से शासन करना बर्बरता है। आतंकवादी ईश्वर से तो ईश्वर का न रहना ही अच्छा है। उसे हृदय से निकालकर मैं उसके दया और दंड दोनों से मुक्त हो जाना चाहता हूं। ऐसे आतंकमय जीवन के लिए मैं ईश्वर का अहसान नहीं लेना चाहता। बासी भात में खुदा के साझे की जरुरत नहीं। अगर तुमने ओज- भोज पर जोर दिया, तो मैं जहर खा लूँगा।'

कहानी का अंतिम वाक्य है कि पत्नी ' गौरी उसके मुँह की और भयातुर नेत्रों से ताकती रह गई। ' कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहानी द्वारा प्रेमचंद तर्क और वैज्ञानिक चेतना का संदेश दे रहे थे और वह भी एक शताब्दी पूर्व।

एक और कहानी 'जुलूस' में, प्रेमचंद उत्तर प्रदेश के एक शहर में विरोध प्रदर्शन और आंदोलन को संगठित करने वाले मुख्य सत्याग्रही के तौर पर इब्राहिम नाम के एक मुस्लिम पात्र को चुनते हैं। इस पात्र का चयन ही सब कुछ बयां कर देता है। इब्राहिम प्रगतिशील है, उसे बड़ी संख्या में लोग मानते हैं और वह गांधीवादी विचारों वाला—पूरी तरह अहिंसक व्यक्ति है। मौजूदा हालात में सांप्रदायिकता बहुत तेज़ी से बढ़ी है और इसके प्रायोजित प्रसार के कारण कई लोगों की जान भी गई है।

भारत को बहुसंख्यकवादी देश बनाने की सोच और कोशिश, हमारे देश की असल पहचान, एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के बिल्कुल उलट है। ऐसे समय में प्रेमचंद की कहानियां हमें लड़ने के लिए पर्याप्त वैचारिक ताकत और ऊर्जा देती है।

'कफन' में मजदूर वर्ग के ग्रामीणों का संघर्ष सामने आता है। वे परिवार का पेट भरने के लिए संघर्ष करते हैं, कर्ज में डूबे रहते हैं और अक्सर इस बोझ से बचने के लिए आत्महत्या कर लेते हैं। 'कफन' के पिता-पुत्र की जोड़ी ने अपनी बदकिस्मती को स्वीकार कर लिया है और उसी के साथ जीना सीख लिया है। यह दिखाता है कि समाज में 'भूख से मौत' कितनी आम है और कुछ लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसते हैं। पिता-पुत्र की जोड़ी आर्थिक तंगी के कारण बेटे की गर्भवती पत्नी को उसकी किस्मत पर छोड़ देती है। जब उसकी मौत हो जाती है, तो वे उसके अंतिम संस्कार का सामान खरीदने के लिए ज़मींदार से कुछ पैसे उधार लेते हैं। आखिरकार उन्हें एहसास होता है कि यह गलत है कि जिस महिला ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी अच्छे कपड़े नहीं पहने, उसके मरने के बाद उसके लिए कफ़न की मांग की जाए। इसलिए, वे उसके लिए सामान खरीदने पर पैसे खर्च करने के बजाय, उसका शुक्रिया अदा करते हुए भरपेट खाना खाते हैं।


प्रेमचंद का आखिरी उपन्यास 'गोदान' ग्रामीण इलाकों में पैसे उधार देने की बुरी व्यवस्था और ताकतवर लोगों के हाथों किसानों को होने वाली परेशानी के बारे में बताता है। इस देश के लोगों को प्रेमचंद से जो सीखने की ज़रूरत है, वह है आपसी भाईचारा और सम्मान, जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी रचनाओं में किया है।

जाति और वर्ग जैसी ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयां लोगों के मन और समाज में इतनी गहराई तक बसी हुई हैं कि हम आज भी उन्हें खत्म करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। प्रेमचंद की रचनाओं में समाज के आम लोगों का दर्द सामने आता है। धर्म और जाति आज भी किसी व्यक्ति और परिवार की ज़िंदगी तय करने वाले मुख्य कारक हैं। यही वह बुनियादी पैमाना है जिससे एक इंसान दूसरे इंसान को परखता है।

1930 के दशक के उत्तर प्रदेश पर आधारित 'कर्मभूमि' उपन्यास वर्ग-भेद, अंतर-जातीय विवाह और मंदिरों में अछूतों के प्रवेश न कर पाने के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता है। आपको याद होगा कि तमिलनाडु में दो समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया, जब दलित समुदाय 'मुथराययर' के लोगों को एक स्थानीय मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया। जून 2019 में, राजस्थान के पाली में ऊंची जाति के लोगों ने एक दलित लड़के को मंदिर में घुसने की कोशिश करने पर बांधकर पीटा। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें हमलावर लड़के को पीटते हुए दिख रहे हैं, जबकि वह उनसे रुकने की गुहार लगा रहा था और कह रहा था कि वह कभी मंदिर में प्रवेश नहीं करेगा। जातिगत भेदभाव आज भी एक सच्चाई है। देश में सीवर की सफाई करते हुए मरने वाले ज़्यादातर लोग निचली जाति और वर्ग के होते हैं, और भले ही इस घिनौनी प्रथा को खत्म करने के लिए कागज़ों पर बहुत कुछ किया गया हो, ज़मीनी हकीकत आज भी निराशाजनक है।

प्रेमचंद की रचनाएं आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि जिन मुद्दों पर उन्होंने लिखा—भ्रष्टाचार, गरीबी, अन्याय और सामाजिक असमानता, वे आज भी हमारी सच्चाई का हिस्सा हैं। प्रेमचंद की रचनाएं सिर्फ़ कहानियां और उपन्यास नहीं हैं, वे ऐसे नैतिक सवाल हैं जिनके जवाब जरूरी हैं। क्या हम एक समाज के तौर पर सच में तरक्की कर रहे हैं, या हम बस अन्याय, शोषण, सांप्रदायिकता के कभी न खत्म होने वाले चक्र के मूक दर्शक बने हुए हैं?

यह अकारण नहीं है कि उनकी कहानी 'ईदगाह' के पाँच साल के हामिद के लिए लोगों के दिलों में हमेशा एक खास जगह रहती है। दिल को छू लेने वाली कहानी, जिसने अपने माता-पिता को खो दिया है और अपनी दादी के साथ बेहद गरीबी में रहता है। आज भी 'ईदगाह' कई पाठकों की पसंदीदा कहानी है, क्योंकि इसे पढ़ने के बाद पाठक संवेदनशीलता से इनवाल्व होते हैं।

प्रेमचंद की सरल लेखन शैली उन दिनों के हालात की साफ़ तस्वीर पेश करती थी जो आज भी प्रासंगिक है। प्रेमचंद की रचनाओं में संस्कृति, रिश्ते, अर्थव्यवस्था, जाति और वर्ग के अंतर इस बात पर रोशनी डालते हैं कि असल में किसी व्यक्ति को क्या चीज परेशान करती है। जीवन की कठोर सच्चाई, जैसे जाति और वर्ग, लोगों के दिमाग और आम समाज में इतनी गहराई से बसी हुई हैं कि हम आज भी उन्हें खत्म करने के तरीके ढूंढ रहे हैं।

प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से समाज में आम लोगों का दर्द सामने आता है। धर्म और जाति आज भी ऐसे प्रमुख कारक हैं जो किसी व्यक्ति और परिवार के जीवन को आकार देते हैं। यह वह बुनियादी पैमाना है जिससे एक इंसान दूसरे इंसान को मापता है।

Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।