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चुनाव आयोग में तानाशाही का राज मोदी सरकार के 2023 के कानून में छिपा है?

Pro. Hemantkumar Shah Pro. Hemantkumar Shah | 2h ago · 4 min read
चुनाव आयोग में तानाशाही का राज मोदी सरकार के 2023 के कानून में छिपा है?

चुनाव आयुक्तों को Immunity दी गई, जो पहले के कानून में नहीं थी।

भारत एक लोकतंत्र है लेकिन इसे किस प्रकार तानाशाही में बदला जा रहा है इसका एक उत्तम उदहारण चुनाव आयोग में हुए कानूनन बदलाव है। संविधान में अनुच्छेद-324 से लेकर अनुच्छेद–329 तक चुनाव आयोग के बारे में प्रावधान किए गए हैं और वह स्वतंत्र और स्वायत्त रूप से काम कर सके इसके लिए भी प्रावधान हैं। लेकिन RSS के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी की सरकार ने चुनाव आयोग को अपनी जेब में डाल देने की साजिश 2023 में की।

आजकल चुनाव आयोग के बारे में जो बवाल खड़ा किया है, इसमें सब से ज्यादा महत्त्व का अगर कोई मुद्दा है तो वह है कानून में 2023 में हुआ सुधार। एक कानून है ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023’। यह कानून भारत की संसद द्वारा पारित एक कानून है। इस कानून ने पुराने निर्वाचन आयोग अधिनियम, 1991 का स्थान लिया है। इसके नए प्रावधान तय करते हैं कि शीर्ष चुनाव अधिकारियों को कैसे चुना जाता है, उन्हें क्या वेतन दिया जाता है और उन्हें क्या संरक्षण प्राप्त हैं।

सबसे बड़े दो सुधार पुराने कानून में किए गए। एक है चुनाव आयुक्तों का कैसे चयन होगा, कौन चयन करेगा इसके बारे में। 2023 के इस सुधार के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) का चयन करने वाली एक समिति होती है। समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इसके पहले क्या था?

पहले के 1991 के कानून में यह था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता शामिल थे इस चयन समिति में। लेकिन 2023 के कानूनी संशोधन के तहत मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया और उनके बदले में कैबिनेट मंत्री को दाखिल किया गया।
इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ही तय करेगी कि चुनाव आयुक्त कौन होगा, क्योंकि विपक्ष नेता तो एक ही होगा और दो सरकार के सदस्य हैं चयन समिति में। मतलब यह कि चुनाव आयुक्त के चयन में सरकार की मनमानी चलेगी यह तय किया गया। यह सरासर तानाशाही थी और है।

इस में एक बात यह भी यह है कि आयुक्त के नाम खोजने वाली एक खोज समिति (Search Committee) बनती है और वह नाम तय कर के चयन समिति को बताती है। कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली यह खोज समिति मुख्य चयन समिति को देने के लिए नामों की एक संक्षिप्त सूची (शॉर्टलिस्ट) तैयार करती है। इसमें भी सरकार ही सरकार है। मतलब यह कि सरकार की तानाशाही पूरी हो, यह सुनिश्चित किया गया।

फिर यह तय किया गया कि किस प्रकार चुनाव आयुक्तों को कानूनी संरक्षण (Legal Protection) मिले। उनको उन्मुक्ति (Immunity) दी गई, जो पहले के कानून में नहीं थी। मोदी सरकार का कानून यह कहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान दिए गए आधिकारिक कर्तव्यों के संचालन के लिए नागरिक या आपराधिक अदालती कार्रवाइयों से संरक्षण मिलेगा। इसका मतलब यह कि वे कुछ भी करें, उनके ऊपर कोई भी कानूनी कार्रवाई न पहले हो सकती है या न उनकी निवृत्ति के बाद। ऐसा प्रावधान पहले के 1991 के कानून में नहीं था।

इन सुधारों के बाद ही अभी जो तीन चुनाव आयुक्त हैं उनकी नियुक्ति की गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी मनमानी कर रहे हैं और बीजेपी किस प्रकार हर चुनाव जीत जाए इस पर काम करते हैं। इस का राज़ 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने जो कानून बनाया इसमें है।

अब देखिए कि यह कानून किस प्रकार संसद में पास हुआ। राज्य सभा में यह कानून 12 दिसंबर, 2023 के दिन पास हुआ जब कि विपक्ष ने इसका जमकर विरोध किया था। लोक सभा ने इसे 21 दिसम्बर, 2023 के दिन पास किया जबकि पूरे विपक्ष को हाउस से सस्पेंड किया गया था। मतलब यह कि विपक्ष सदन में था ही नहीं तब यह कानून पास हो गया था। इसका मतलब यह है कि पूरे कानून को भी तानाशाही ढंग से ही पास किया गया था।

संवैधानिक नैतिकता(constitutional morality) जैसा कुछ होना चाहिए ऐसा डा. भीमराव आम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था लेकिन नरेंद्र मोदी ने इसकी धज्जियाँ उड़ा दी और चुनाव सिर्फ नाम का हो, ताकि यह कहा जा सके कि भारत में लोकतंत्र है, लेकिन लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाय, इसका प्रावधान बड़ी बखूबी से किया गया।
Pro. Hemantkumar Shah

Pro. Hemantkumar Shah

प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।