Gen Z का यह संघर्ष देश को अंधेरे से बचाने के लिए है
गोबर और गोमूत्र वाले माहौल में शिक्षा के लिए संघर्ष पूरे देश के लिए उम्मीद की किरण है।
हम आने वाली पीढियों को क्या देकर जाएंगे?
पूरा बचपन बीता पंचतंत्र की कहानियाँ पढते हुए और उन मूल्यों को ग्रहण करते हुए जो इन कहानियों ने हमें सिखाने की कोशिश की।
मूर्खता से आगाह किया यानी हंस और कछुए की कहानी। ताक़त के सामने बुद्धि काम आती है यानी शेर और खरगोश की कहानी। झूठ के सहारे बनाई गई छवि स्थाई नहीं होती यानी नीले लोमड़ की कहानी। भारतीय ज्ञान परम्परा ने हमेशा सिखाया कि प्रश्न करो, प्रश्न से डरो मत। सच का साथ देने के लिए भले ही अपने गुरु की अवज्ञा करनी पड़े, घबराओ मत। सत्य के लिए किसी से न डरना- गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं। सच को सिर्फ इसलिए मत त्याग दो कि कोई शक्तिशाली है जो तुमसे ऐसा कह रहा है। जब हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में यह पढा था तब यही सोचा था कि अपनी परम्परा में से आलोचना और ज्ञान को कूड़े में फेंक कर हम अंधभक्ति कब से करने लगे?
किसने सिखाया यह कि डरो और सवाल मत करो? जितना झुकोगे उतना आगे जाओगे? कैसे भारतीय समाज लगातार झूठ, नकली छवि और अज्ञानता के गहरे कुएँ में उतरता गया? इसका जवाब अगर भारत की शिक्षा-व्यवस्था में नहीं तो और कहाँ है?
एयर कंडीशन से निकलने वाला पानी अमृत समझकर पीते लोगों का वीडियो देखा आपने? या गौ-मूत्र से कैंसर ठीक होने के दावे किए जाते देखे आपने? बाबाओं के प्रवचनों में हास्यास्पद सवाल करते और उनके उतने ही फूहड़ जवाब बाबा से मिलते हुए रील देखे आपने? बाबाओं के दरबार में मची भगदड़ में मरने वालों के लिए बाक़ी भक्तों की दलील सुनी थी आपने कि यह तो सौभाग्य था?
मेरे देश की जनता इतनी असहाय, निरुपाय कैसे हो गई? क्या शिक्षा से उसका भरोसा एकदम ही उठ गया? ऐसा तो नहीं कि उन्हें लगता है शिक्षा मुश्किल रास्ता है जिसपर चलकर जीवन में ठीक-ठाक तरीक़े से आजीविका हासिल नहीं की जा सकती, सामाजिक सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती है, हेल्थ केयर और सुरक्षित साफ़ खाना और हवा नहीं मिल सकती है? क्या हम भारत के लोग अपने सिस्टम से इतने निराश हो गए कि हमने हथियार डाल दिए, अपनी नागरिकता और अपने गुरूर को कुचल कर ऐसे चुनाव करने लगे जो सिर्फ़ ग़ुस्सा और बेचारगी दिखाते हैं हमारी? जैसे कुछ हो नहीं सकता, जैसे कुछ बदल नहीं सकता, जैसे सब सितारों के हाथ में है और सितारे गर्दिश में। शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध नाटक जूलियस सीज़र में कैसियस ब्रूटस से कहता है- ‘गलती सितारों की नहीं है, हमारी है’
“The fault, dear Brutus, is not in our stars,
But in ourselves, that we are underlings.”
हम ख़ुद पर ग़ुस्सा थे, हमने अपना पूरा घर जला लिया, हमने ऐसे चुनाव किए जिसने हमारे भीतर एक बेचारगी के एहसास को पुख्ता किया।
आस्था और भक्ति तो भारतीय समाज के डीएनए में है, उसे कोई निकाल नहीं सकता; लेकिन जो बेचारगी और निराशा हमारे चयन ने हमें दी उसने एक बड़े वर्ग को धीरे-धीरे अंधभक्त और अंधविश्वासी बना दिया। नतीजा यह हुआ कि जिसकी ज़िंदगी की राहें शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा मिलने से आसान होनी चाहिए थी उसका भरोसा ही ख़त्म कर दिया शिक्षा पर से। बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, उच्च शिक्षा महंगी ही होती जा रही है, पेपर लीक हो रहे हैं, भर्तियाँ नहीं निकलतीं, रिज़ल्ट नहीं आते, वेकेंसी नहीं भरतीं, स्थाई नौकरियाँ नहीं हैं, नौकरियों में सुरक्षा का एहसास नहीं है, एक फौजी को अग्निवीर बनाकर असहाय कर दिया।
हर वह चीज़ जो जीवन का स्तर ऊँचा उठा सकती है उसे व्यापक भ्रष्टाचार से निगल लिया।
हम बड़े-बड़े पोस्टर देख रहे हैं, उधर एक पुल गिर रहा है।
हम मूर्ति देख रहे हैं, उधर एक ट्रेन पटरी पर से उतर जा रही है।
हम मंदिर देख रहे हैं और उधर शिक्षा के मंदिर के किवाड़ आम आदमी के लिए बंद होते जा रहे हैं।
हम पिछले एक दशक में शिक्षा व्यवस्था को एक ऐसी व्यवस्था की तरह फेल होते देख रहे हैं जो जीवन को बेहतर बनाने की उम्मीद हर एक के भीतर जगा सके। अगर एक छात्र यूनिवर्सिटी में खड़े होकर वक़्त पर परीक्षा, वक़्त पर परिणाम और मनमानी फीस वृद्धि के लिए जवाबदेही नहीं मांग सकता, छोड़िए, वह साफ़ पानी तक नहीं मांग सकता तब क्या उम्मीद बची रह जाएगी उसके लिए?
हो सकता है आपके पास खोने के लिए कुछ हो। कोई पद, कोई नौकरी, कोई अवसर, एक कृपा दृष्टि, ‘उनकी’ गुड बुक्स में नाम, राज्यसभा की सीट, जज की कुर्सी मिलने की सम्भावना, जज की कुर्सी छूटने के बाद कोई और बड़ा पद मिलने की आस। इस युवा पीढी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है।
ये जो अभी 12, 15 या17 साल के हैं, इनसे आपने इतिहास पहले ही छीन लिया है। इन्हें इतिहास पुरुषों की जबरन कराई जाने वाली मुर्गा भिड़ंत से क्या मलतब? इनकी टेक्स्ट बुक्स में जितने खिलवाड़ हैं उतने ही खिलवाड़ इनके अभिभवाकों के साथ आपके व्ह्ट्सप ग्रुपों ने किया है।
अब इन बच्चों के हाथ में सिर्फ़ इनका वर्तमान है। ये जितनी प्रखरता से, तत्परता से अपने वर्तमान में शिक्षा के लिए लड़ेंगे उतना ही उज्ज्वल इस देश का भविष्य होगा। हम शायद इन्हें मूर्खता की विरासत नहीं सौंपना चाहते थे, लेकिन मूर्खता के आगे हमारा सम्पूर्ण आत्मसमर्पण इन्हें उस कगार तक ले ही आया जहाँ संघर्ष के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। ये लौट रहे हैं गाँधी के सत्याग्रह की ओर, अहिंसा के सहारे चल रहे हैं, अनैतिक सत्ताओं को होश में लाने के लिए। इनके पास खोने को कुछ नहीं। इन्हें तोड़ना पड़ेगा हमारी पीढी का रचा चक्रव्यूह।
Sujata
डॉ सुजाता दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, लेखिका और स्तंभकार हैं। समाज, स्त्री-अधिकार, लैंगिक समानता, साहित्य और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उनकी लेखनी अपनी बेबाक दृष्टि और संवेदनशील विश्लेषण के लिए जानी जाती है