शराबबंदी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं सीएम सम्राट चौधरी?
NCAER ने कहा है कि बिहार में बिना किसी देरी किए शराबबंदी को हटा देना चाहिए।
बिहार में बिना किसी देरी किए तुरंत शराबबंदी को हटा देना चाहिए। यह सिफारिश नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने राज्य सरकार से की है। थिंक टैंक NCAER का यह शोध पत्र पिछले सप्ताह इंडिया पॉलिसी फोरम में पेश किया गया था जिसमें राज्य सरकार से पूर्ण शराबबंदी हटाने की सिफारिश की गई है।
NCAER की इस हालिया स्टडी ने पटना के राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। अध्ययन में शराबबंदी के कारण राज्य को हो रहे भारी राजस्व नुकसान और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने में इसकी विफलता का हवाला दिया गया है। इसके बाद इस बात पर चर्चा शुरू हो गई है कि करीब एक दशक पुरानी शराबबंदी नीति का राज्य पर क्या असर पड़ा है और क्या अब इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
इस अध्ययन ने विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को भाजपा पर यह आरोप लगाने का मौका दिया है कि वह शराबबंदी को ठीक से लागू नहीं कर सकी। वहीं, NDA के सहयोगी दलों ने शराबबंदी को और सख्ती से लागू करने की मांग की है। हालांकि, जनता दल (यूनाइटेड) के कम से कम एक नेता ने शराबबंदी वापस लेने के पक्ष में राय जाहिर की है।
सूत्रों के मुताबिक,
सत्तारूढ़ भाजपा इस बात से वाकिफ है कि शराब की बिक्री शुरू होने से राज्य के राजस्व में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन पार्टी इस बात को लेकर भी सतर्क है कि नीति में किसी तरह का बदलाव पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नाराज कर सकता है।
सूत्र ने कहा कि फिलहाल सत्तारूढ़ दल इस नीति की समीक्षा करने से पहले पर्याप्त समय लेगा। इस साल अप्रैल में बिहार में पूर्ण शराबबंदी के दस साल पूरे हुए। NCAER के अध्ययन के प्रमुख निष्कर्षों के मुताबिक,
शराबबंदी महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर अंकुश लगाने में सफल नहीं रही है। अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करते समय पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एक प्रमुख उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ अपराधों को कम करना था।
RJD के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता ने कहा कि यह अध्ययन राज्य सरकार की “पूरी तरह विफलता” को दिखाता है। उन्होंने कहा, “राज्य में सभी राजनीतिक दलों ने सर्वसम्मति से शराबबंदी लागू की थी। हम आज भी शराबबंदी के पक्ष में हैं। यह अध्ययन सरकार की पूरी तरह विफलता को दिखाता है। मामला केवल सालाना राजस्व नुकसान का नहीं है, बल्कि इसके कारण शराब की एक समानांतर काली अर्थव्यवस्था भी खड़ी हो गई है। इस तरह की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि राज्य सरकार आने वाले समय में आंशिक या पूरी तरह शराबबंदी से बाहर निकलने का रास्ता तलाश सकती है। JD(U) का आधिकारिक रुख शराबबंदी के समर्थन में है, लेकिन सीतामढ़ी से पार्टी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने इसकी समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा, “शराबबंदी कहीं भी सफल नहीं हुई है।”
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा, “यह सही है कि हमें राजस्व बढ़ाने के रास्ते तलाशने होंगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमें शराबबंदी हटा देनी चाहिए।” हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा, “बिहार को शराबबंदी को और सख्ती से लागू करने के लिए गुजरात मॉडल अपनाना चाहिए।” इससे पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य सरकार अपनी शराब नीति की समीक्षा नहीं करेगी। हालांकि राजनीतिक दलों के आधिकारिक रुख से अलग, सूत्रों का कहना है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर शराबबंदी को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। भाजपा के एक सूत्र ने कहा,
शराबबंदी के साथ-साथ वैकल्पिक नशीले पदार्थ ड्रग्स के इस्तेमाल में भारी बढ़ोतरी हुई है और शराब की एक समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था भी खड़ी हो गई है।
इसके अलावा, बिहार में हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री तभी फल-फूल सकती है, जब हम कम से कम आंशिक रूप से शराब की बिक्री की अनुमति दें।”
भाजपा सूत्र ने आगे कहा, “लेकिन एक बात तय है कि राज्य सरकार अपनी शराब नीति पर दोबारा विचार करने में अभी समय लेगी। नीति में किसी भी तरह का बदलाव पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नाराज कर सकता है। शराबबंदी वापस लेने का फैसला धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली प्रक्रिया है।”
Macro perspective of Bihar’s development achievements: Unfinished agenda and the way forward शीर्षक वाले इस अध्ययन को अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व वाली टीम ने पेश किया। अध्ययन में अवैध ड्रग बाजार के “तेजी से उभरने” और वैकल्पिक नशीले पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल की ओर ध्यान दिलाया गया है।
अध्ययन के मुताबिक,
शराबबंदी से राज्य के खजाने को हर साल भारी राजस्व नुकसान हो रहा है। अनुमान लगाया गया है कि अगर शराबबंदी हटा दी जाती है तो बिहार के राजस्व में 14 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। बिहार सालाना करीब 65,000 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाता है।
रिपोर्ट में शराबबंदी लागू करने से जुड़ी गंभीर चुनौतियों को भी रेखांकित किया गया है। इनमें व्यवस्था में भ्रष्टाचार, कानून लागू करने वाली एजेंसियों के संसाधनों पर बढ़ता दबाव और अनियंत्रित एवं खतरनाक जहरीली शराब से पैदा होने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य के खतरे शामिल हैं।
NCAER की स्टडी ने सिफारिश की है कि बिहार को पूर्ण शराबबंदी की जगह नियंत्रित और विनियमित शराब बिक्री की व्यवस्था की ओर वापस लौटना चाहिए और उस पर एक्साइज टैक्स लगाया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया, “एक्साइज ड्यूटी दोबारा लागू करने से कानून लागू करने वाली एजेंसियों के महत्वपूर्ण संसाधन मुक्त होंगे। साथ ही इससे वह जरूरी टैक्स राजस्व भी मिलेगा, जिसका इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और वास्तविक रोजगार सृजन जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में किया जा सकता है।”