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बीजेपी का संगठनात्मक भूचाल, जेन जेड से दूरी और भस्मासुर बनती राजनीति

Iqbal Ahmad Iqbal Ahmad | 3h ago · 7 min read
बीजेपी का संगठनात्मक भूचाल, जेन जेड से दूरी और भस्मासुर बनती राजनीति

अगर पार्टी की प्राथमिकताएँ नहीं बदलीं, तो संगठनात्मक भूचाल सिर्फ लक्षण बने रहेंगे, इलाज नहीं।

अगस्त 2026 में भारतीय जनता पार्टी के अंदर जो संगठनात्मक फेरबदल हुआ, वह सिर्फ नाम बदलने का खेल नहीं था। नितिन नबीन की नई टीम, अमित मालवीय की जगह दीपक म्हस्के का आना, स्मृति ईरानी और राम माधव जैसे चेहरों की वापसी। यह सब एक बड़े सियासी दबाव का नतीजा लगता है। बांकीपुर और दतिया के उप चुनाव के नतीजों ने पार्टी को झकझोर दिया। तीन दशक से सुरक्षित मानी जाने वाली बांकीपुर सीट प्रशांत किशोर के हाथ चली गई। वोट शेयर 60 प्रतिशत से ऊपर से गिरकर महज 34 प्रतिशत के आसपास आ गई। यह हार महज एक सीट की हार नहीं थी। यह उस मशीनरी पर सवाल था जो लंबे समय से अजेय मानी जा रही थी।

युवा, खासकर जेन जेड से जुड़ न पाने की समस्या अब साफ दिख रही है। कॉकरोच जनता पार्टी वाला आंदोलन महज परीक्षा लीक या बेरोजगारी का विरोध नहीं था। यह उस पीढ़ी का गुस्सा था जो रोजगार, शिक्षा की विश्वसनीयता और भविष्य की सुरक्षा माँग रही थी। पार्टी की पारंपरिक रणनीति—मंदिर, हिंदुत्व और सांस्कृतिक प्रतीक—इस पीढ़ी पर उतना असर नहीं कर पा रही जितना पहले करती थी। शहरी और पढ़े-लिखे युवा अब सिर्फ नारे नहीं सुनना चाहते। वे नतीजे चाहते हैं। उप चुनाव के नतीजों में शहरी सीटों पर वोट शेयर गिरना इसी का संकेत है।

इसी दबाव में पार्टी ने आनन-फानन में पूरा संगठनात्मक ढाँचा बदल डाला। आईटी सेल, जो 11 साल से अमित मालवीय के नेतृत्व में पार्टी का डिजिटल हथियार बना हुआ था, अब नए हाथों में है। म्हस्के का आना यह बताता है कि पार्टी खुद मान रही है कि पुरानी डिजिटल भाषा जेन जेड तक नहीं पहुँच रही। एआई वाले रील्स, फेक नैरेटिव और युवाओं तक सही संदेश पहुँचाने की बात अब खुलेआम हो रही है। लेकिन ढाँचा बदलने से समस्या हल हो जाए, यह जरूरी नहीं। समस्या जड़ में है—युवाओं की आकांक्षाओं और पार्टी की प्राथमिकताओं के बीच बढ़ती दूरी।

धर्म और नफरत आधारित राजनीति का सवाल और भी जटिल हो गया है। लंबे समय तक हिंदुत्व की लामबंदी पार्टी के लिए चुनावी पूंजी बनी रही। लेकिन अब वही पूंजी कहीं-कहीं भस्मासुर का रूप लेती दिख रही है। जब नफरत की भाषा बहुत तेज और दिखाई देने वाली हो जाती है, तो वह सिर्फ विपक्ष को नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के अंदर भी तनाव पैदा कर सकती है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार की छवि कड़ी और मुसलमानों के प्रति सख्त मानी जाती रही है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक यह कहते रहे हैं कि दिल्ली में बैठे नेतृत्व—मोदी और अमित शाह—इस कट्टरता के अतिरेक से असहज हो सकते हैं। कारण साफ है।

राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता चलाने के लिए गठबंधन, सामाजिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय छवि भी मायने रखती है। जब एक राज्य का मॉडल बहुत ज्यादा नफरत का प्रदर्शन करने लगे, तो वह केंद्र की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

यह कोई नया टकराव नहीं है। पार्टी के अंदर हमेशा से दो धाराएँ रही हैं—एक जो संगठनात्मक और चुनावी pragmatism पर जोर देती है, दूसरी जो वैचारिक शुद्धता और कठोर हिंदुत्व पर। योगी की शैली दूसरी धारा को मजबूत करती दिखती है।

लेकिन बांकीपुर उप चुनाव के नतीजे और युवा विरोध के बाद दिल्ली में यह सोच बढ़ी होगी कि नफरत की राजनीति अगर नियंत्रण से बाहर हो जाए तो वह खुद पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। जेन जेड के एक बड़े हिस्से के लिए रोजगार और भविष्य की सुरक्षा धर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। अगर पार्टी सिर्फ एक समुदाय के खिलाफ नफरत पर टिकी रहेगी, तो वह युवा वोटरों का बड़ा हिस्सा खो सकती है।

अब आंकड़ों की बात करें। वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में भारत की स्थिति मिश्रित है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2025 में भारत 38वें स्थान पर है। यह 2019 के 66वें स्थान से थोड़ा सुधरा हुआ है, लेकिन चीन टॉप 10 में दाखिल हो चुका है और अमेरिका, दक्षिण कोरिया जैसे देश कहीं आगे हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर भारत का खर्च अभी भी GDP का लगभग 0.8 से 0.9 प्रतिशत के आसपास है (2023-24 में 0.84 प्रतिशत, अनुमानित 2025-26 में 0.90 प्रतिशत)। तुलना करें तो चीन 2.4-2.6 प्रतिशत, अमेरिका 3 प्रतिशत से ऊपर और दक्षिण कोरिया 4-5 प्रतिशत खर्च करता है। यह अंतर सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि वैज्ञानिक अप्रोच और इनोवेशन में हम कहाँ खड़े हैं।

एआई के क्षेत्र में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिखती है। स्टैनफोर्ड के ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी इंडेक्स में भारत तीसरे स्थान पर पहुँच चुका है (अमेरिका और चीन के बाद)। आईपीसीआईडीई की रिपोर्ट में एआई परफॉर्मेंस में चौथा स्थान है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एआई टैलेंट पूल रखता है। जेनएआई पेटेंट फाइलिंग में पाँचवाँ स्थान है। लेकिन पूंजी और कंप्यूट इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी अभी भी बड़ी बाधा है। प्राइवेट एआई इन्वेस्टमेंट में अमेरिका अरबों डॉलर आगे है। अगर वैज्ञानिक सोच और शिक्षा की नींव मजबूत न हो, तो टैलेंट पूल भी पलायन कर जाता है। स्टैनफोर्ड रिपोर्ट में भारत एआई रिसर्च टैलेंट के नेट आउटफ्लो में सबसे ऊपर रहा। यानी प्रतिभा पैदा हो रही है, लेकिन देश में नहीं रुक पा रही।

यही जगह धार्मिक कट्टरता का अवसर लागत (opportunity cost) सामने आता है। जब राजनीतिक ऊर्जा और संसाधन नफरत की लामबंदी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक प्रतीकों की लड़ाई में खर्च होते हैं, तो वैज्ञानिक शिक्षा, रिसर्च फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान बंट जाता है। यह सीधा कारण-परिणाम का दावा नहीं है, लेकिन आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि प्राथमिकताएँ गलत दिशा में रही हैं। जेन अल्फा (लगभग 2010 के बाद पैदा हुई पीढ़ी) के स्कूलों की स्थिति देखिए। यूडीआईएसई+ 2025-26 के अनुसार,

देशभर के लगभग 14.6 लाख स्कूलों में पीने का पानी 99.5 प्रतिशत स्कूलों में उपलब्ध है, बिजली 95 प्रतिशत में है, लड़कियों के शौचालय 98.5 प्रतिशत में हैं। लेकिन कंप्यूटर सिर्फ 69.9 प्रतिशत स्कूलों में हैं, इंटरनेट 67.4 प्रतिशत में। लगभग एक लाख स्कूल अभी भी सिंगल टीचर के भरोसे चल रहे हैं।

एएसईआर 2024 के अनुसार,

कक्षा 3 के 76 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाते। कक्षा 5 के आधे से ज्यादा बच्चे साधारण भाग नहीं कर पाते। ये वही बच्चे हैं जो कल एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग और जलवायु विज्ञान की दुनिया में कदम रखेंगे।

शर्म की बात यह है कि जब देश भर में युवा परीक्षा पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता के मुद्दे पर सड़कों पर हैं। स्कूलों में पंखे, साफ पानी, पर्याप्त क्लासरूम, मेज-कुर्सी और प्रशिक्षित अध्यापकों की कमी अभी भी बनी हुई है। कई राज्यों में टीचर वैकेंसी हजारों में चल रही है। कर्नाटक जैसे राज्य अभी 15,000 शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं। बुनियादी सुविधाएँ सुधर रही हैं, लेकिन सीखने के परिणाम और डिजिटल पहुँच अभी भी कमजोर हैं।

जेन अल्फा इन स्कूलों में बैठकर भविष्य का सपना देख रहा है, जबकि राजनीतिक बहस मंदिर, मस्जिद और नफरत के इर्द-गिर्द घूम रही है।

निपटने का रास्ता आसान नहीं। एक ओर योगी जैसे नेताओं की लोकप्रियता और चुनावी ताकत है, दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर संतुलन बनाए रखने की मजबूरी। दिल्ली की सत्ता अब इस भस्मासुर को पूरी तरह काबू में नहीं रख पा रही, क्योंकि यह उसी राजनीति का विस्तार है जिसे लंबे समय तक बढ़ावा दिया गया। रोकने का उपाय अगर है तो वह वैचारिक कठोरता को थोड़ा पीछे कर, विकास, रोजगार, वैज्ञानिक शिक्षा और संस्थागत विश्वसनीयता पर फोकस करना होगा। लेकिन यह आसान फैसला नहीं। पार्टी के अंदर वैचारिक खेमा इसे कमजोरी मानेगा।

संगठनात्मक बदलाव, आईटी सेल का नया चेहरा और बिहार और मध्य प्रदेश के उप चुनाव की हार—ये सब एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय हैं। पार्टी अपनी मशीनरी को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वह युवाओं की भाषा समझ पाएगी? क्या वह नफरत की राजनीति को नियंत्रण में रख पाएगी या वह खुद पार्टी को निगल लेगी?

2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव इस सवाल का बड़ा जवाब देंगे। फिलहाल, बीजेपी सतर्क तो हो गई है, लेकिन सतर्कता से लेकर सुधार तक का रास्ता अभी लंबा है। सियासत में भस्मासुर जब जाग जाता है, तो उसे रोकना आसान नहीं होता। और जब स्कूलों में बच्चे बिना पंखे, बिना पानी और बिना पर्याप्त अध्यापक के बैठे हों, तब एआई की रेस में आगे निकलने का दावा खोखला लगता है। भविष्य उन बच्चों का है जो आज क्लासरूम में हैं। अगर प्राथमिकताएँ नहीं बदलीं, तो संगठनात्मक भूचाल सिर्फ लक्षण बने रहेंगे, इलाज नहीं।
Iqbal Ahmad

Iqbal Ahmad

इक़बाल अहमद पेशे से फ्रीलांस लेखक हैं और यू ट्यूब पर पाँच साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। द क्रेडिबल हिस्ट्री पर इनका साप्ताहिक शो ‘द मुस्लिम एंगल’ दर्शकों में लोकप्रिय है।