घंटे भर के अंदर BCI ने तुगलकी आदेश लिया वापस, NALSAR के छात्रों पर लगा बैन हटाया
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा।
यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में नागरिक सर्वोच्च होता है। इस आप्त वाक्य को न्यायपालिका भी बखूबी समझती है, बावजूद लोकतंत्र में तानाशाह जैसा फरमान क्यों जारी किया जाने लगा है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और उसके लगभग डेढ़ दशक से अध्यक्ष रहे मनन कुमार मिश्रा ने सीजेआई सूर्यकांत के सम्मान में फरमान जारी कर दिया कि NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से इस साल ग्रेजुएट होने वाले सभी छात्र वकालत नहीं कर सकेंगे। लेकिन लोकतंत्र की ताकत का इन्हें शायद अंदाजा नहीं था।
गुरुवार को उनके इस फरमान का इतना विरोध हुआ कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को कुछ ही घंटों के भीतर अपना वह आदेश वापस लेना पड़ा, जिसने हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से इस साल ग्रेजुएट होने वाले सभी छात्रों के करियर पर रोक लगा दी थी। यह आदेश उन खबरों के बाद जारी किया गया था, जिनमें कहा गया था कि कैंपस के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध किया था।
Bar and Bench की एक रिपोर्ट के अनुसार, कानूनी शिक्षा और वकालत की सर्वोच्च नियामक संस्था BCI ने दिन में पहले एक अभूतपूर्व आदेश जारी करते हुए सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे इस साल NALSAR से ग्रेजुएट होने वाले किसी भी छात्र का वकील के रूप में नामांकन न करें। यह कार्रवाई कुछ छात्रों द्वारा चलाए गए कैंपस अभियान की मीडिया रिपोर्टों के आधार पर की गई थी।
इस फैसले के बाद राजनेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स की ओर से जबरदस्त तीखी आलोचना शुरू हो गई। छात्र मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को हाल में झुकने के लिए मजबूर करने वाली कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) ने एक और विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी।
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने X पर लिखा,
“क्या होगा अगर सारे लीगल कॉकरेच एक साथ आ जाएं?”
यह टिप्पणी मई में उनकी उस व्यंग्यात्मक पोस्ट की याद दिलाती है, जो भारत के चीफ जस्टिस द्वारा कुछ युवाओं की तुलना “कॉकरेच” यानी तिलचट्टों से किए जाने के बाद आई थी। उसी घटनाक्रम ने परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ Gen Z आंदोलन की जमीन तैयार की थी। सीजेआई सूर्यकांत की इस टिप्पणी के बाद देशभर में हुए व्यापक आंदोलन से नरेंद्र मोदी सरकार बैकफुट पर आई और 12 साल के भाजपा सरकार के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
नियमों के अनुसार, कानून की डिग्री पूरी करने और साल में दो बार आयोजित होने वाली ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने के बाद किसी व्यक्ति को वकालत के लिए नामांकित किया जा सकता है। BCI के चेयरमैन और BJP के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा द्वारा सभी राज्य बार काउंसिलों को भेजे गए पहले आदेश में कहा गया था कि,
अगले आदेश तक NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ का कोई भी छात्र, जिसने वर्ष 2026 में कानून की डिग्री प्राप्त की है, किसी भी राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं किया जाएगा।
आदेश में यह भी कहा गया था कि इस स्तर पर BCI यह नहीं मान रही है कि संबंधित प्रतिनिधित्व या अभियान में हिस्सा लेने मात्र से कोई व्यक्ति धारा 24A के तहत नामांकन के लिए अयोग्य हो गया है। हालांकि, आदेश में कहा गया कि BCI कुछ आवेदकों के मामले में पेशे में प्रवेश को नियंत्रित करने वाले नियामकीय पहलुओं” की जांच कर रही है। ऐसी जांच लंबित रहने के दौरान ग्रेजुएट छात्रों का नामांकन कर दिया गया तो इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसे बाद में पलटना मुश्किल होगा और वैधानिक जांच निष्प्रभावी हो सकती है।
लेकिन कैंपस में असहमति के खिलाफ इस कार्रवाई पर हंगामा बढ़ने के बाद मिश्रा ने नया आदेश जारी करते हुए पहले आदेश को “संशोधित” कर दिया।
दूसरे आदेश में कहा गया कि
सभी छात्र अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में नामांकन कराने के हकदार होंगे।”
इसमें कहा गया कि शुरुआती आदेश पर BCI के भीतर चर्चा के बाद सदस्य सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक NALSAR के 2026 बैच के अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और वे “अपमान” वाली गतिविधि में हिस्सा लेने के इच्छुक नहीं थे।
हालांकि, शुरुआती आदेश की आलोचना करने वाले कई लोगों ने यह सवाल उठाया था कि लोकतंत्र में किसी कैंपस कार्यक्रम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की प्रस्तावित भागीदारी का विरोध करना अपने आप में सजा देने योग्य कैसे हो सकता है।
BCI के दूसरे आदेश में कहा गया कि
इसलिए काउंसिल राज्य बार काउंसिलों में NALSAR छात्रों के नामांकन पर प्रतिबंध से संबंधित चेयरमैन के आदेश में संशोधन करती है। किसी भी छात्र को उसकी गलती के बिना नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा।
आदेश में आगे कहा गया कि कुछ विश्वसनीय स्रोतों से यह जानकारी मिली है कि कुछ शिक्षकों और बाहरी लोगों ने निर्दोष छात्रों को उकसाने में भूमिका निभाई थी। काउंसिल ने कहा कि वह NALSAR के वाइस-चांसलर की जांच रिपोर्ट का इंतजार करेगी और रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लॉ यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने अभियान चलाकर वाइस-चांसलर और अन्य अधिकारियों को दीक्षांत समारोह में जस्टिस सूर्यकांत को आमंत्रित नहीं करने के लिए राजी किया था। बताया गया कि इन छात्रों का तर्क था कि जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों पर कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं को लेकर जस्टिस सूर्यकांत का रुख स्थापित कानूनी न्यायशास्त्र के अनुरूप नहीं था।
BCI के चेयरमैन मिश्रा के पहले आदेश में कहा गया था कि.
कानून का ऐसा छात्र, जिसके मन में देश के सर्वोच्च न्यायिक पद के प्रति सम्मान नहीं है, उससे जिम्मेदार या समझदार वकील, शिक्षक या जज बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे लोग हमेशा पेशे के लिए बोझ साबित होंगे।
मई में जस्टिस सूर्यकांत के हवाले से ऐसी टिप्पणी सामने आई थी, जिसमें उन्होंने उन युवाओं की तुलना “कॉकरेच” और “परजीवियों” से की थी, जो उनके अनुसार संदिग्ध योग्यताओं के साथ पेशों में प्रवेश करते हैं और बाद में सोशल मीडिया या RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनकी टिप्पणी केवल फर्जी डिग्री जैसे मामलों में शामिल लोगों के लिए थी।
हाल ही में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने अपना दीक्षांत समारोह स्थगित कर दिया था, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत को शामिल होना था। ऐसी खबरें थीं कि उनकी मौजूदगी के खिलाफ संभावित छात्र विरोध को देखते हुए कैंपस प्रशासन को कार्यक्रम स्थगित करने की सलाह दी गई थी। हालांकि, संस्थान ने ऐसी कोई सलाह मिलने से इनकार किया था।