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BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप; उपाध्यक्ष ने मांगा इस्तीफा

TCN Desk TCN Desk | 2h ago · 7 min read
BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप; उपाध्यक्ष ने मांगा इस्तीफा

BCI के को-चेयरमैन ने 150 करोड़ रुपये के फंड को एक निजी ट्रस्ट में ट्रांसफर करने की जांच कराने की मांग की है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सह-अध्यक्ष वाई.आर. सदाशिव रेड्डी ने काउंसिल के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को पत्र लिखकर 15 दिनों के भीतर उनके इस्तीफे की मांग की है। साथ ही उन्होंने काउंसिल के 150 करोड़ रुपये के फंड को एक निजी ट्रस्ट में ट्रांसफर करने, काउंसिल के पदों पर “परिवार के सदस्यों की नियुक्ति” और 2012 से मिश्रा के लगातार पद पर बने रहने जैसे मामलों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।

कानूनी समाचार वेबसाइट Bar and Bench की रिपोर्ट के अनुसार, रेड्डी 22 अगस्त की तारीख वाले अपने पत्र में लिखा है मनन कुमार मिश्रा 15 दिनों के भीतर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन पद से इस्तीफा दें। मिश्रा की अध्यक्षता में BCI उन मानकों से भटक गई है, जिनकी उससे अपेक्षा की जाती है।


रेड्डी ने कहा,

बार काउंसिल ऑफ इंडिया किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। उसके पास मौजूद हर रुपया एक ट्रस्ट के रूप में रखा गया है। वह जिस भी शक्ति का इस्तेमाल करती है, वह संसद द्वारा अधिवक्ताओं के हित के लिए दी गई शक्ति है, न कि उस व्यक्ति के लाभ के लिए जो उस समय चेयरमैन की कुर्सी पर बैठा हो।

उन्होंने BCI की एक विशेष बैठक बुलाने और BCI के खातों के साथ-साथ मिश्रा के चेयरमैन रहते स्थापित किए गए BCI Trust PEARL - First नामक ट्रस्ट का स्वतंत्र ऑडिट कराने की भी मांग की। इसके अलावा, रेड्डी ने मांग की कि मान्यता की मांग करने वाले लॉ कॉलेजों से BCI द्वारा आगे किसी भी तरह का भुगतान स्वीकार करने पर रोक लगाई जाए।


यह कदम ऐसे समय में आया है जब हाल ही में मिश्रा को एक पत्र जारी करने को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा था। उस पत्र में चेतावनी दी गई थी कि हैदराबाद के NALSAR के जिन छात्रों को लॉ स्कूल के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की भागीदारी के विरोध में चलाए गए अभियान के पीछे पाया जाएगा, उन्हें अधिवक्ता के रूप में नामांकन से रोक दिया जाएगा। हालांकि, कुछ ही घंटों बाद इस निर्देश और मामले की प्रस्तावित जांच को वापस ले लिया गया था। BCI सदस्य रेड्डी ने मिश्रा से इस्तीफे की मांग करते हुए इस प्रकरण का भी उल्लेख किया है।

रेड्डी ने कहा कि 13 अगस्त को विश्वविद्यालय के स्नातक बैच को नामांकन से रोकने वाला निर्देश तब जारी किया गया, जब इससे संबंधित सामग्री बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष रखी ही नहीं गई थी। न तो परिषद में इस पर विचार-विमर्श हुआ था और न ही इस तरह का निर्देश जारी करने के लिए परिषद ने कोई प्रस्ताव पारित किया था।

रेड्डी के पत्र में कहा गया है कि,

देर से ही सही, खेद व्यक्त किया गया, लेकिन मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि चेयरमैन के पद का इस्तेमाल कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले पूरे बैच को धमकाने के लिए किया गया—ऐसे युवा पुरुषों और महिलाओं को, जिनके पास न शक्ति थी और न आवाज—और केवल एक राय रखने के बदले उन्हें पेशे से बाहर रखने की धमकी दी गई।

मिश्रा के इस्तीफे की मांग के लिए रेड्डी ने BCI में अनियमित नियुक्तियों को भी एक आधार बताया है। रेड्डी का दावा है कि BCI के कई कर्मचारी मिश्रा के करीबी हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी नियुक्ति बिना किसी विज्ञापन या पारदर्शी चयन प्रक्रिया के की गई।

पत्र में फंड के कथित डायवर्जन को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि

वर्ष 2020 में “BCI Trust PEARL - First” नाम का एक नया ट्रस्ट पंजीकृत किया गया, जिसमें मिश्रा की पसंद के लोगों को ट्रस्टी बनाया गया। रेड्डी का आरोप है कि BCI के कई सदस्यों की आपत्तियों के बावजूद BCI के फंड से करीब ₹150 करोड़ इस ट्रस्ट को ट्रांसफर किए गए।

रेड्डी ने कहा कि बाद में इस ट्रस्ट के साथ पूर्व न्यायाधीशों सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जोड़ा गया, ताकि इसे ऐसी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा दी जा सके जिसका, इसके गठन के तरीके को देखते हुए, यह हकदार नहीं था। पत्र के मुताबिक, इसके बाद पुराना BCI ट्रस्ट निष्क्रिय हो गया।

पत्र में आगे कहा गया,

मुझे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के किसी ऐसे प्रावधान की जानकारी नहीं है, जो किसी वैधानिक नियामक संस्था (BCI) की मूल निधि को उसके अपने चेयरमैन द्वारा पंजीकृत निजी ट्रस्ट में ट्रांसफर करने की अनुमति देता हो। बार काउंसिल के किसी भी सदस्य ने आज तक ट्रस्ट डीड की प्रति नहीं देखी है।

रेड्डी ने आगे दावा किया कि उन्हें ऐसी शिकायतें मिली हैं कि BCI से मान्यता या मान्यता के नवीनीकरण की मांग करने वाले लॉ कॉलेजों से BCI Trust PEARL को ₹25 लाख से ₹1 करोड़ तक का “योगदान” देने के लिए कहा गया। पत्र में कहा गया है कि अगर ये आरोप सही हैं तो यह बेहद गंभीर मामला है। कानून के पाठ्यक्रमों को मंजूरी देने या उनकी मान्यता का नवीनीकरण करने की BCI की शक्ति धन जुटाने का लाइसेंस नहीं है। रेड्डी ने कहा कि ऐसे कृत्यों के परिणाम आज भारत में कानूनी शिक्षा की स्थिति में दिखाई देते हैं।

उन्होंने लिखा,

जिन कॉलेजों को कभी मान्यता मिलनी ही नहीं चाहिए थी, वे साल-दर-साल चलते जा रहे हैं और हजारों युवाओं को ऐसी डिग्री बेची जा रही है, जो उन्हें किसी काम के योग्य नहीं बनाती।”

पत्र में यह भी कहा गया है कि BCI द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर मिश्रा के परिवार के सदस्य हैं। साथ ही रेड्डी ने आरोप लगाया कि पूरी परिषद के समक्ष विचार-विमर्श किए बिना आदेश जारी करके राज्य बार काउंसिलों के भीतर गुटबाजी को बढ़ावा दिया गया।

रेड्डी ने मिश्रा के लंबे कार्यकाल पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि मिश्रा 2012 से लगातार करीब 14 वर्षों से विभिन्न कार्यकालों में चेयरमैन बने हुए हैं, और 2025 में भी उन्होंने एक और कार्यकाल हासिल किया। रेड्डी के अनुसार, यह उस रोटेशन यानी पद को अलग-अलग लोगों के बीच बदलते रहने के सिद्धांत से हटना है, जिसकी परिकल्पना संसद ने इस पद के लिए की थी। रेड्डी ने BCI कार्यालय के बाहर मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर अधिवक्ताओं के प्रदर्शन और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) की स्टूडेंट बार काउंसिलों द्वारा चेयरमैन के साथ मंच साझा करने से इनकार करने का भी जिक्र किया। उन्होंने इसे इस बात का संकेत बताया कि “बार का विश्वास खो चुका है।”

रेड्डी ने पत्र में लिखा,

मेरे मन में आपके प्रति कोई व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं है। मैंने इस परिषद में एक दशक तक आपके साथ काम किया है। और ठीक इसी वजह से, क्योंकि मैंने इतने लंबे समय तक इस संस्था को भीतर से देखा है, मैं साफ अंतरात्मा से यह कह सकता हूं कि जब तक आप चेयरमैन की कुर्सी पर बने रहेंगे, यह संस्था उबर नहीं पाएगी... इस देश के अधिवक्ता अपनी ही परिषद से वर्तमान में जो पा रहे हैं, उससे बेहतर के हकदार हैं। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि उन्हें वह अवसर दें।”

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई है, जिसमें मिश्रा के एक दशक से अधिक समय से BCI चेयरमैन पद पर लगातार बने रहने को चुनौती दी गई है और उन्हें पद से हटाने की मांग की गई है।

Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिवक्ता योगमाया एम.जी. द्वारा दायर इस रिट याचिका में मिश्रा के कार्यकाल और लंबे समय से इस पद पर बने रहने पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि मिश्रा पहली बार 2012 में BCI के चेयरमैन बने थे। 2014 में कुछ समय के अंतराल के बाद वह नवंबर 2014 में दोबारा इस पद पर लौटे और तब से लगातार चेयरमैन बने हुए हैं। मार्च 2025 में उन्हें एक बार फिर निर्विरोध चुना गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह उनका लगातार सातवां कार्यकाल है।


याचिका में मुख्य रूप से अप्रैल 2025 में BCI द्वारा अधिसूचित पांच साल के कार्यकाल को चुनौती दी गई है। गजट अधिसूचना में मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक दर्ज किया गया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि BCI नियमों के नियम 12(2) के तहत चेयरमैन और वाइस-चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष या उनकी सदस्यता समाप्त होने तक, इनमें से जो भी पहले हो, निर्धारित है। याचिका में कहा गया है कि कोई प्रशासनिक अधिसूचना नियमों में निर्धारित अवधि से अधिक कार्यकाल नहीं बढ़ा सकती।