चीन के जवाब में अरुणाचल में बन रहे हाइड्रो प्रोजेक्ट के खिलाफ हिंसक हुआ प्रदर्शन
नदी किनारे बसे लोगों का आरोप है कि इससे उनके गांव, खेती, जंगल और पुरखों की जमीन डूब सकती है।
अरुणाचल प्रदेश में पीढ़ियों से आदिवासी समुदायों की जीवनरेखा रही सियांग नदी अब एक विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर विरोध का केंद्र बन गई है। राज्य सरकार 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना यानी एसयूएमपी को जल और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बता रही है। वहीं, नदी किनारे बसे लोगों को आशंका है कि इससे उनके गांव, खेती, जंगल और पुरखों की जमीन डूब सकती है।
सरकार का कहना है कि चीन की ओर से नदी के ऊपरी हिस्से में बनाए जा रहे विशाल बांध के संभावित प्रभावों से बचाव के लिए यह परियोजना जरूरी है। लेकिन स्थानीय समुदाय प्रारंभिक सर्वेक्षण का भी विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि सर्वेक्षण की अनुमति देना ऐसे निर्माण का रास्ता खोल सकता है, जो सियांग घाटी को हमेशा के लिए बदल देगा।
Hindustan Times की एक रिपोर्ट के अनुसार, विरोध अब ग्रामीणों और सुरक्षाबलों के बीच हिंसक झड़पों तक पहुंच चुका है। घायलों की संख्या पर अलग-अलग दावे, गिरफ्तारियां और पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर पाबंदियों ने विवाद को और गंभीर बना दिया है। वहीं, मुख्यमंत्री पेमा खांडू का कहना है कि बांध बनाने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। फिलहाल सरकार केवल यह जांचना चाहती है कि परियोजना तकनीकी और भौगोलिक रूप से संभव है या नहीं।
तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से पर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजना ने इस विवाद को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया है। यही नदी अरुणाचल प्रदेश में सियांग कहलाती है और असम में दूसरी नदियों से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनती है। इसके बाद यह बांग्लादेश में प्रवेश करती है। चीन की मेडोग परियोजना की अनुमानित उत्पादन क्षमता करीब 60,000 मेगावाट बताई गई है। जुलाई 2025 में चीन ने इसका निर्माण शुरू करने और लगभग 1.2 लाख करोड़ युआन के निवेश की घोषणा की थी।
भारतीय अधिकारियों को आशंका है कि ऊपरी हिस्से में पानी नियंत्रित किए जाने से नदी के प्रवाह में बदलाव, पानी मोड़े जाने या अचानक बड़ी मात्रा में छोड़े जाने जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। अरुणाचल सरकार का तर्क है कि एसयूएमपी का विशाल जलाशय ऐसे उतार-चढ़ाव का असर कम करेगा।

सीएम खांडू के मुताबिक,
चीन की परियोजना की अनुमानित जल भंडारण क्षमता 5.5 अरब घन मीटर है, जबकि सियांग परियोजना में लगभग 9.2 अरब घन मीटर उपयोग योग्य भंडारण संभव हो सकता है। हालांकि, इसकी वास्तविक उपयोगिता विस्तृत अध्ययन, अंतिम डिजाइन और संचालन व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
विवाद के केंद्र में प्रस्तावित पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट यानी पीएफआर है। इसके जरिए संभावित निर्माण स्थलों, जमीन और चट्टानों की स्थिति तथा परियोजना की तकनीकी संभावनाओं का अध्ययन किया जाना है। सरकार इसे निर्माण की मंजूरी से अलग प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच बता रही है। लेकिन विरोध की अगुवाई कर रहा सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम यानी एसआईएफएफ इसे बांध निर्माण की पहली सीढ़ी मानता है। संगठन ने सर्वेक्षण रोकने, प्रभावित इलाकों से सुरक्षाबल हटाने और स्थानीय समुदायों से सार्थक बातचीत की मांग की है।

मानवाधिकार वकील और बांध विरोधी कार्यकर्ता एबो मिली ने चीन से खतरे के सरकारी तर्क पर सवाल उठाया है। उन्होंने भारत और चीन के बीच जल-बंटवारे की संधि की जरूरत बताई। उनके मुताबिक, सियांग के पानी का महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय क्षेत्र की हिमनदीय झीलों से भी आता है। मिली का आरोप है कि चीन द्वारा नदी पूरी तरह सुखा देने की आशंका बताकर ग्रामीणों को गुमराह किया जा रहा है। उनके लिए प्रस्तावित विशाल बांध ज्यादा तात्कालिक खतरा है।
30 सितंबर को खांडू के अपर सियांग दौरे के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सड़कें रोकीं। विरोध हिंसक होने पर कुछ वाहन क्षतिग्रस्त किए गए या आग के हवाले हुए। स्थानीय विधायक आलो लिबांग के आवास में भी तोड़फोड़ हुई।
4 अक्टूबर को सियांग जिले में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच फिर झड़प हुई। एसआईएफएफ महासचिव लिकेंग लिबांग ने 6 अक्टूबर की रिपोर्ट में दावा किया कि परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के 67 सदस्य घायल हुए। पुलिस ने आठ से अधिक सुरक्षाकर्मियों के घायल होने और दो महिलाओं सहित पांच लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी।
सियांग के पुलिस अधीक्षक कामदम सिकॉम के मुताबिक,
कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश के दौरान सुरक्षाकर्मियों पर हमला हुआ। सर्किल अधिकारी कालोंग तासिंग की शिकायत के अनुसार, निषेधाज्ञा के बावजूद करीब 100 से 150 प्रदर्शनकारी सुरक्षाकर्मियों की ओर बढ़े। पुलिस ने सीआरपीएफ सहायक कमांडेंट गजेंद्र सिंह सोनिगरा के हाथ पर गंभीर चोट आने की बात भी कही।
पुलिस के मुताबिक, भीड़ हटाने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। किसान संगठन ने अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया है। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। खांडू ने 11 अक्टूबर को कहा कि हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी, लेकिन सरकार ग्रामीणों की चिंताएं सुनने को तैयार है।

सियांग परियोजना का विचार नया नहीं है। वर्ष 2008 में इसके विकास प्रस्ताव को राष्ट्रीय महत्व मिला था। शुरुआती योजनाओं में 6,000 मेगावाट की सियांग अपर स्टेज-एक और 3,750 मेगावाट की स्टेज-दो परियोजनाएं थीं। बाद में बिजली उत्पादन, जल भंडारण और बाढ़ नियंत्रण वाली बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना का प्रस्ताव सामने आया। तकनीकी चुनौतियों, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और स्थानीय विरोध के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब पारोंग, दिते दिमे और उग्गेंग जैसे संभावित स्थलों पर चर्चा है, लेकिन अंतिम स्थान तय नहीं हुआ है। मंजूरी मिलने पर परियोजना एनएचपीसी लागू करेगी।
आदिवासी समुदाय के लिए सियांग केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि खेती, संस्कृति और सामूहिक पहचान का हिस्सा है। विरोधियों को गांवों, उपजाऊ जमीन, जंगलों, मत्स्य संसाधनों और सांस्कृतिक स्थलों के डूबने का डर है। कार्यकर्ताओं ने 27 गांवों के जलमग्न होने की आशंका जताई है, हालांकि वास्तविक विस्थापन विस्तृत आकलन के बाद ही स्पष्ट होगा।
भूकंप, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश के प्रति संवेदनशील पूर्वी हिमालय में इतने बड़े बांध की सुरक्षा भी चिंता का विषय है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि व्यक्तिगत हस्ताक्षर व्यापक सामुदायिक सहमति का विकल्प नहीं हैं। ऑल आदि यूथ एसोसिएशन ने पारंपरिक ‘केबांग’ संस्थाओं के जरिए संवाद की मांग की है। परियोजना का स्थान, व्यवहार्यता और पुनर्वास अभी अनिश्चित हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती राष्ट्रीय हितों के साथ उन समुदायों के अधिकार, आजीविका और भरोसे की रक्षा करने की है, जिनका जीवन पीढ़ियों से सियांग से जुड़ा है।
