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UCC क्या है और इस पर विवाद क्यों है?

Md. Tousif Md. Tousif | 1h ago · 7 min read
UCC क्या है और इस पर विवाद क्यों है?

UCC की बहस का सबसे जरूरी हिस्सा समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code- UCC) को BJP-NDA शासित सभी 21 राज्यों में लागू कर दिया जाएगा। मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होंने कहा कि,


हमने कई राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की है और मुझे भरोसा है कि 21 BJP-NDA शासित राज्यों में हम 2029 से पहले UCC लागू कर देंगे।” उन्होंने तीन तलाक को खत्म किए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि यह मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की सरकार की कोशिश का हिस्सा था।

UCC भाजपा के लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक एजेंडे के उन प्रमुख मुद्दों में से एक है, जो अभी तक पूरी तरह पूरा नहीं हुआ है। Indian Express की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में, जब मोदी सरकार ने पहली बार UCC को एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में आगे बढ़ाया था तब,

RSS से जुड़े एक सूत्र ने अखबार को बताया था कि कि इस विषय पर गहराई से अध्ययन और व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत है, क्योंकि इसका असर समाज के हर वर्ग पर पड़ेगा।

संघ की प्राथमिकता यह थी कि पहले BJP शासित राज्य अपने-अपने UCC लागू करें और बाद में केंद्र सरकार संभावित रूप से एक व्यापक केंद्रीय कानून पर विचार करे। मार्च 2024 में RSS के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने उत्तराखंड मॉडल का स्वागत किया और कहा कि इसका अध्ययन कर इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए।

हालांकि अमित शाह के बयान के बाद NDA गठबंधन के अंदर भी विरोध देखने को मिला-

JD(U) लगातार कहती रही है कि वह UCC के खिलाफ नहीं है, लेकिन चाहती है कि इसे थोपने के बजाय आम सहमति के जरिए आगे बढ़ाया जाए।
TDP ने भी चर्चा और विचार विमर्श की जरूरत पर जोर दिया है। 2024 में पार्टी ने कहा था कि वह मुस्लिम समुदाय के हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगी।

UCC क्या है?

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) यानी ऐसी Civil Laws की व्यवस्था जिसमें व्यक्ति के धर्म के आधार पर शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने, उत्तराधिकार और कुछ दूसरे पारिवारिक मामलों के लिए अलग-अलग नियम न हों। भारत में फिलहाल इन मामलों में सामान्य कानूनों के साथ अलग-अलग धर्म-जातियों के Personal Laws भी लागू होते हैं।

हिंदू पर्सनल लॉ को बड़े पैमाने पर 1955 के हिंदू मैरिज एक्ट और 1956 के हिंदू सक्सेशन एक्ट जैसे कानूनों के जरिए संहिताबद्ध किया जा चुका है। इसी तरह ईसाइयों और पारसियों के लिए विवाह और तलाक से जुड़े अलग कानून हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ अभी भी काफी हद तक असंहिताबद्ध है, हालांकि आजादी से पहले की केंद्रीय विधायिका ने 1937 का मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट और 1939 का Dissolution of Muslim Marriages Act जैसे कानून बनाए थे।

UCC का संवैधानिक आधार संविधान का आर्टिकल-44 है। इसमें कहा गया है कि,

राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।” लेकिन अनुच्छेद 44 राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy) का हिस्सा है और इसलिए इसे किसी अदालत के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता।

संविधान का आर्टिकल- 37 साफ तौर पर कहता है कि,

नीति-निर्देशक सिद्धांत कोर्ट द्वारा लागू करने योग्य नहीं हैं। हालांकि, साथ ही यह भी कहा गया है कि ये सिद्धांत देश के शासन के लिए मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है। इसलिए आर्टिकल-44 इसे एक संवैधानिक लक्ष्य निर्धारित करता है, लेकिन ऐसा सीधे लागू होने वाला अधिकार नहीं देता जिसके आधार पर कोई नागरिक अदालत से UCC लागू करने की मांग कर सके।

सरकार संसद में कानून बनाकर इसे लागू क्यों नहीं करती

लेकिन अब सवाल ये भी है कि UCC को केंद्र सरकार केन्द्रीय कानून के रूप में सामने क्यों नहीं लाती? दरअसल इसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक, दोनों तरह के कारण हैं। संविधान में विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार, जैसे Civil Law जुड़े मामले संविधान की समवर्ती सूची की Entry 5 में आते हैं। इसका मतलब है कि इन पर कानून बनाने की शक्ति संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों के पास है।

लेकिन इसके पीछे के राजनीतिक कारण ज्यादा महत्वपूर्ण है। एक राष्ट्रीय UCC को भारत में मौजूद पर्सनल लॉ और प्रचलित रीति-रिवाजों की विशाल विविधता से तालमेल बैठाना होगा, खासकर आदिवासी समुदायों और पूर्वोत्तर राज्यों में जो काफी जटिल हो सकता है।

चूँकि उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के किसी आदिवासी समुदाय की प्रथाएं छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे समुदाय से काफी अलग हो सकती हैं इसलिए दोनों जगह के लिए एक तरह का कानून समस्याएं खड़ी कर सकता है। इसलिए राज्यों के रास्ते से कानून बनाकर और लागू करके BJP अलग-अलग मॉडल को आजमा सकती है, स्थानीय रीति-रिवाजों से जुड़े मुद्दों को ध्यान में रख सकती है और देशव्यापी कानून की पूरी राजनीतिक और संवैधानिक जटिलता से पहले इसके लागू करने का अनुभव हासिल कर सकती है।

2018 में लॉ कमीशन ने क्या कहा?

21वें Law Commission ने 2018 में Family Law Reform पर जारी Consultation Paper में कहा था कि उस समय UCC “न तो जरूरी है और न ही फायदेमंद। इसके बजाय आयोग ने Personal Laws में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार करने की बात कही, जबकि भारत की विविधता को बनाए रखने पर जोर दिया। आयोग का जोर समुदायों के बीच “equality between communities” स्थापित करने के बजाय समुदायों के भीतर पुरुषों और महिलाओं के बीच “equality within communities” हासिल करने पर था। उसने पूर्ण एकरूपता थोपने के बजाय धीरे-धीरे और अलग-अलग चरणों में सुधार करने की बात कही।

22वें Law Commission ने 2023 में UCC के मुद्दे को दोबारा उठाया। उसने आम जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों से नए सिरे से राय मांगी। आयोग ने कहा कि 2018 के consultation को तीन साल से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। इसलिए इस मुद्दे की नए सिरे से समीक्षा करना जरूरी है।

कहां-कहां UCC पारित हो चुका है

चार BJP शासित राज्यों- उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने UCC से संबंधित कानून पारित किए हैं। इनमें उत्तराखंड ऐसा एकमात्र राज्य है, जहां फिलहाल यह कानून लागू है। उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में अपना UCC लागू किया। इसमें विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार से जुड़े समान नियम बनाए गए हैं। बहुविवाह पर रोक लगाई गई है और विवाह का रजिस्ट्रेशन जरूरी किया गया है। इस कानून की सबसे अलग विशेषता लीव-इन-रिलेशनशिप को रेगुलेट करना है।

गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में UCC बिल पारित किया। इसका मॉडल लगभग उत्तराखंड के मॉडल जैसा है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लीव-इन-रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान हैं तथा द्विविवाह पर रोक लगाई गई है।
असम ने मई 2026 में अपना UCC बिल पारित किया- इसमें भी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लीव-इन-रिलेशनशिप को शामिल किया गया है। बहुविवाह पर रोक है और लीव-इन-रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है।
मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में अपना बिल पारित किया- इसमें गोद लेने से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इसके अलावा तीन तलाक और निकाह हलाला से संबंधित प्रावधान भी इसमें हैं। यहां भी लीव-इन-रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था है और बहुविवाह पर रोक लगाई गई है। इन सभी कानूनों की एक महत्वपूर्ण समानता यह है कि अनुसूचित जनजातियों को इनके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड में संविधान के तहत विशेष प्रचलित कानूनों के तहत सुरक्षा प्राप्त कुछ समुदायों को भी छूट दी गई है।

विरोध और समर्थन क्यों हो रहा है

विपक्षी दलों ने आम तौर पर यह सवाल उठाया है कि BJP का UCC वास्तव में Gender equality का सुधार है या फिर बहुसंख्यकवादी ढांचे के जरिए अल्पसंख्यकों के Personal Laws में बदलाव करने की कोशिश है।

कांग्रेस ने गुजरात के बिल का विरोध करते हुए इसे “मुस्लिम विरोधी” बताया, जबकि मध्य प्रदेश में उसने कानून को RSS के एजेंडे के रूप में आलोचना की। असम में विपक्षी दलों ने भी व्यापक विचार विमर्श की मांग की और आदिवासी समुदायों को दी गई छूट तथा लीव-इन-रिलेशनशिप के रेगुलेशन को लेकर भी चिंताएं जताईं।

UCC की बहस का सबसे जरूरी हिस्सा समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है। संविधान का अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की रक्षा से संबंधित अधिकार देता है।

समर्थकों का सबसे बड़ा तर्क समानता है। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के नागरिक अधिकार केवल उसके धर्म के आधार पर अलग नहीं होने चाहिए। खासकर महिलाओं के मामले में समान कानून से विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और संपत्ति जैसे मामलों में एक समान कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। समर्थकों का दूसरा तर्क यह है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण कानूनी व्यवस्था जटिल होती है। यदि नागरिक मामलों में समान नियम हों तो व्यवस्था को सरल बनाया जा सकता है।

कानून के विरोध करने वालों चिंता धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और विविधता को लेकर है। उनका तर्क है कि भारत में अलग-अलग समुदायों की अपनी धार्मिक और सामाजिक परंपराएं हैं। यदि एक समान कानून बनाया जाता है तो कुछ समुदायों को लग सकता है कि उनकी पारंपरिक व्यवस्था पर राज्य का हस्तक्षेप बढ़ रहा है।

यहीं अनुच्छेद 25 और 29 की चर्चा होती है। विरोध करने वालों का सवाल यह है कि समान नागरिक कानून बनाते समय धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।
Md. Tousif

Md. Tousif

मोहम्मद तौसिफ़ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर नजर रखते हैं और ‘द क्रेडिबल हिस्ट्री’ में रिसर्चर के रूप में कार्यरत हैं।