युद्ध की मार से सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में गिरावट, तेल उत्पादन में भारी कमी: विजन 2030 खतरे में?
तेल क्षेत्र में 20.4 फीसदी की कमी ने मोहम्मद बिन सलमान की विजन 2030 योजना और अर्थव्यवस्था के विविधीकरण की चुनौतियों को फिर सामने ला दिया है।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। ईरान के साथ युद्ध और यमन से जुड़े संघर्ष के बीच तेल उत्पादन तथा निर्यात पर पड़े असर का नतीजा अब देश की आर्थिक विकास दर में दिखाई देने लगा है। सऊदी अरब की जनरल अथॉरिटी फॉर स्टैटिस्टिक्स (GASTAT) ने 1 नवंबर को जारी अपने शुरुआती आंकड़ों में बताया कि 2026 की तीसरी तिमाही में देश की वास्तविक जीडीपी में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह तेल क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन रहा। तीसरी तिमाही में तेल से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में सालाना आधार पर 20.4 फीसदी की कमी आई। दूसरी ओर, गैर-तेल क्षेत्र में 1.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। सरकारी गतिविधियों में भी 2.7 फीसदी की गिरावट आई। इससे स्पष्ट है कि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिशों के बावजूद ऊर्जा क्षेत्र में आई गिरावट का बड़ा झटका लगा है।
यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सऊदी अरब पिछले कई वर्षों से अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी योजना 'विजन 2030' का एक प्रमुख मकसद यही है कि देश की आय के स्रोतों में विविधता लाई जाए। पर्यटन, मनोरंजन, निर्माण, तकनीक, परिवहन और निजी निवेश को बढ़ावा देकर एक ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार की जाए जो केवल तेल की कीमतों और उत्पादन पर निर्भर न रहे। लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस बदलाव के बावजूद तेल क्षेत्र में आई बड़ी गिरावट का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

तेल उत्पादन में गिरावट ने बिगाड़ा आर्थिक हिसाब
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है। उसकी सरकारी आय, विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता और आर्थिक योजनाओं के वित्तपोषण में तेल की अहम भूमिका है। इसलिए तेल उत्पादन में बड़ी गिरावट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इससे सरकारी राजस्व, निर्यात, निवेश और विकास परियोजनाओं पर भी दबाव पड़ सकता है।
GASTAT के आंकड़ों के मुताबिक, तीसरी तिमाही में तेल क्षेत्र की गतिविधियों में 20.4 फीसदी की गिरावट ने जीडीपी की सालाना विकास दर को 4.7 प्रतिशत अंक नीचे खींचा। इसके उलट गैर-तेल गतिविधियों ने 1.1 प्रतिशत अंक का सकारात्मक योगदान दिया। यानी गैर-तेल क्षेत्र में बढ़ोतरी ने अर्थव्यवस्था को कुछ सहारा जरूर दिया, लेकिन तेल क्षेत्र के नुकसान की पूरी भरपाई नहीं कर सकी।
ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर इस युद्ध का असर समझने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य की अहमियत को समझना जरूरी है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला यह समुद्री रास्ता दुनिया के तेल और प्राकृतिक गैस व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल और एलएनजी आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा सामान्य परिस्थितियों में इसी रास्ते से गुजरता है।
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों के बाद पश्चिम एशिया में युद्ध का दायरा बढ़ गया। इसके जवाब में ईरान की सैन्य कार्रवाई और क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने समुद्री परिवहन को बुरी तरह प्रभावित किया। होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बाधित होने के कारण खाड़ी के देशों के सामने तेल और गैस की आपूर्ति जारी रखने की चुनौती पैदा हो गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अपनी रिपोर्ट में इस संकट के कारण क्षेत्रीय व्यापार, परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़े असर का उल्लेख किया है।
सऊदी अरब ने इस संकट से निपटने के लिए अपने वैकल्पिक तेल परिवहन मार्गों का इस्तेमाल किया। देश की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन के जरिए फारस की खाड़ी के तट पर स्थित तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को लाल सागर के किनारे यानबू बंदरगाह तक पहुंचाया जा सकता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करना है। लेकिन समुद्री मार्गों में बाधा, ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों और पाइपलाइन से जुड़ी रुकावटों के कारण वैकल्पिक व्यवस्था भी पूरी तरह नुकसान की भरपाई नहीं कर सकी।
इसका असर सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के उत्पादन पर भी पड़ा। 3 नवंबर को जारी कंपनी के तीसरी तिमाही के नतीजों के अनुसार, उसका कुल हाइड्रोकार्बन उत्पादन पिछले साल के 1.33 करोड़ बैरल प्रतिदिन से घटकर 1.105 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया। हालांकि, ऊंची तेल कीमतों और कुछ अन्य कारोबारी कारणों से कंपनी का शुद्ध मुनाफा बढ़कर 36.25 अरब डॉलर हो गया। इससे एक महत्वपूर्ण फर्क समझ आता है: तेल की ऊंची कीमतें कंपनी के मुनाफे को बढ़ा सकती हैं, लेकिन यदि उत्पादन और निर्यात की मात्रा घट जाए तो उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
विजन 2030 की परीक्षा
मोहम्मद बिन सलमान ने 2016 में विजन 2030 की घोषणा की थी। इस योजना के तहत सऊदी अरब को तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था से निकालकर पर्यटन, उद्योग, मनोरंजन, तकनीक और निवेश के नए केंद्र के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश किया गया। नियोम जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
इस योजना के पीछे एक स्पष्ट आर्थिक तर्क है। तेल के भंडार सीमित हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें लगातार बदलती रहती हैं। ऐसे में किसी एक प्राकृतिक संसाधन पर निर्भर अर्थव्यवस्था लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकती। सऊदी नेतृत्व चाहता है कि आने वाले वर्षों में पर्यटन, निजी उद्योग और गैर-तेल कारोबार सरकारी आय तथा रोजगार के महत्वपूर्ण स्रोत बनें।
ताजा आंकड़ों में गैर-तेल क्षेत्र की 1.9 फीसदी वृद्धि इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। यह बताती है कि युद्ध और तेल उत्पादन में गिरावट के बावजूद अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में गतिविधियां जारी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि इतनी मजबूत है कि तेल क्षेत्र में आई बड़ी गिरावट की भरपाई कर सके? फिलहाल आंकड़े इसका सकारात्मक जवाब नहीं देते।
सरकारी गतिविधियों में 2.7 फीसदी की सालाना गिरावट भी ध्यान देने योग्य है। सऊदी अरब में सरकार की भूमिका निवेश, निर्माण और बड़े विकास कार्यक्रमों में काफी महत्वपूर्ण है। सरकारी खर्च में कमी का असर निजी क्षेत्र की गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। इसलिए अर्थव्यवस्था में विविधता लाने के लिए केवल नए उद्योगों को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके लिए स्थिर निवेश और मांग बनाए रखना भी जरूरी होगा।
गिरावट के बावजूद कुछ सुधार के संकेत
हालांकि सालाना आधार पर अर्थव्यवस्था में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन तिमाही आधार पर तस्वीर कुछ अलग है। मौसमी उतार-चढ़ाव को समायोजित करने के बाद जुलाई से सितंबर 2026 के बीच सऊदी अरब की जीडीपी में पिछली तिमाही के मुकाबले 1.3 फीसदी की वृद्धि हुई। इसी अवधि में तेल क्षेत्र की गतिविधियों में 5.7 फीसदी और गैर-तेल क्षेत्र में 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह संकेत देता है कि दूसरी तिमाही के मुकाबले आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुधार हुआ है। हालांकि, पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले अर्थव्यवस्था अब भी पीछे है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी युद्ध के आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। उसके आकलन के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक बाधा बनी रहने, ऊर्जा प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचने और निवेशकों का भरोसा कमजोर होने से सऊदी अरब की आर्थिक वृद्धि तथा उसकी विविधीकरण योजनाओं पर असर पड़ सकता है। हालांकि, देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार, अपेक्षाकृत मजबूत वित्तीय स्थिति और वैकल्पिक ऊर्जा परिवहन मार्गों जैसे सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।

युद्ध की आर्थिक कीमत और सऊदी अरब की चुनौती
सऊदी अरब के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे युद्ध के कारण तेल उत्पादन और निर्यात में आई बाधाओं से निपटना है, दूसरी तरफ विजन 2030 के तहत शुरू की गई बड़ी परियोजनाओं और आर्थिक बदलाव की रफ्तार भी बनाए रखनी है।
यमन से जुड़े संघर्ष का भी इस पूरे क्षेत्रीय संकट में महत्व है। हौथी समूह के हमलों और लाल सागर में समुद्री परिवहन को लेकर पैदा हुई असुरक्षा ने सऊदी अरब के सामने सुरक्षा और व्यापार से जुड़ी चुनौतियां बढ़ाई हैं।
सऊदी अरब के लिए यह संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षाएं केवल तेल बेचने तक सीमित नहीं हैं। वह खुद को वैश्विक निवेश, पर्यटन और व्यापार के केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। लेकिन इसके लिए क्षेत्र में स्थिरता, विदेशी निवेशकों का भरोसा और ऊर्जा निर्यात के सुरक्षित रास्ते जरूरी हैं।
ताजा आंकड़े सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था के पूरी तरह चरमराने की तस्वीर पेश नहीं करते। गैर-तेल क्षेत्र में वृद्धि और तीसरी तिमाही में तिमाही आधार पर आया सुधार बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में कुछ मजबूती बनी हुई है, लेकिन तेल उत्पादन में भारी गिरावट यह भी दिखाती है कि तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिशों के बावजूद सऊदी अरब अभी इस निर्भरता से बाहर नहीं निकल पाया है।
मोहम्मद बिन सलमान के विजन 2030 की असली परीक्षा अब यही है कि क्या सऊदी अरब युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच अपनी आर्थिक योजनाओं को जारी रख पाएगा, या तेल से होने वाली आय में गिरावट उसकी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की रफ्तार धीमी कर देगी। इसका जवाब आने वाले महीनों में तेल उत्पादन, सरकारी खर्च, विदेशी निवेश और गैर-तेल अर्थव्यवस्था की वृद्धि से मिलेगा।