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गुजरात से हिन्दुत्व गुट के लिए आई बुरी खबर, साहित्य परिषद चुनाव में मिली करारी हार

Pro. Hemantkumar Shah Pro. Hemantkumar Shah | 5h ago · 5 min read
गुजरात से हिन्दुत्व गुट के लिए आई बुरी खबर, साहित्य परिषद चुनाव में मिली करारी हार

गुजराती साहित्य परिषद में पूरे गुजरात में से क़रीब 3500 सदस्य हैं और उनमें से इस चुनाव में 1,548 लोगों ने मतदान किया था।

पिछले महीने आयोजित गुजराती साहित्य परिषद के चुनाव में साहित्य परिषद के अध्यक्ष पद पर तीन साल के कार्यकाल के लिए जाने-माने कहानीकार किरीट दूधात ने सरकारी साहित्यकार मानी जाने वाली उषा उपाध्याय को भारी बहुमत से हराकर कल हुई मतगणना में जीत हासिल की है। किरीट दूधात को 824 वोट मिले हैं और उषा उपाध्याय को 566 वोट मिले हैं। इस तरह किरीट दूधात 258 वोटों के भारी अंतर से निर्वाचित हुए हैं। इतना ही नहीं, बल्कि साहित्य परिषद की 40 सदस्यों वाली मध्यस्थ समिति में भी उनका पैनल भारी बहुमत से निर्वाचित हुआ है।

कहा जा रहा है कि इस नतीजे ने साहित्य परिषद को एक बार फिर सरकारी साहित्य परिषद बनने से रोक दिया है। गुजरात सरकार की गुजराती साहित्य अकादमी में स्वायत्तता नहीं रह गई है और उसके खिलाफ अनेक गुजराती साहित्यकार पिछले डेढ़ दशक से लगातार संघर्ष करते रहे हैं। लेकिन इसी साहित्य अकादमी के वर्तमान अध्यक्ष और परम मोदीभक्त माने जाने वाले भाग्येश झा के पूर्ण आशीर्वाद और तमाम सहायता के बावजूद उषा उपाध्याय अध्यक्ष पद का चुनाव हार गई हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले दो वर्षों से सरकारी साहित्य अकादमी द्वारा गुजराती साहित्य के अनेक कार्यक्रमों में उषा उपाध्याय को बढ़ावा दिया जा रहा था। एक जानकारी यह है कि केवल पिछले एक वर्ष में ही साहित्य अकादमी द्वारा गुजरात के विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आयोजित लगभग 40 साहित्यिक कार्यक्रमों में उषा उपाध्याय किसी न किसी रूप में अतिथि और वक्ता के तौर पर उपस्थित रहती थीं। साहित्य अकादमी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारी सरकारी खर्च पर गुजरात में जगह-जगह साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए और उनमें साहित्यकारों को आकर्षित करने का प्रयास किया। इसके बावजूद गुजराती साहित्यकारों ने उषा उपाध्याय को आवश्यक वोट नहीं दिए, यह एक संकेत देने वाली बात है। इसी लिए यह भी कहा जा रहा है कि यह भाग्येश झा की व्यक्तिगत तौर पर हार है.

गुजराती साहित्य परिषद में पूरे गुजरात में से क़रीब 3500 सदस्य हैं और उनमें से इस चुनाव में 1,548 लोगों ने मतदान किया था। पहली बार इतना भारी मतदान होने के कारण ऐसा प्रचार किया जा रहा था कि भगवा टोली साहित्य परिषद पर कब्जा जमा सकेगी, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।

किरीट दूधात और उनके पैनल के मुकाबले उषा उपाध्याय और उनका पैनल ‘परिवर्तन मंच’ के नाम से चुनावी मैदान में उतरे थे। लेकिन साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने उस भगवा परिवर्तन को एक बार फिर खारिज कर दिया है और इस तरह सरकारी साहित्य अकादमी, भाजपा, भाजपा की सरकार तथा आरएसएस को साहित्य परिषद में घूसने नहीं दिया है ऐसा माना जाता है. इससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि उषा उपाध्याय महात्मा गांधी द्वारा 1920 में स्थापित गुजरात विद्यापीठ में गुजराती की प्राध्यापक रही थीं और जब गुजरात विद्यापीठ पर संघियों ने कब्जा कर लिया, तब वे पूरी तरह मौन रही थीं।

उल्लेखनीय बात यह भी है कि स्वयं महात्मा गांधी भी गुजराती साहित्य परिषद का वार्षिक सम्मेलन अहमदाबाद में जब १९३८ में आयोजित हुआ था, तब उसके अध्यक्ष बने थे।

1905 में स्थापित गुजराती साहित्य परिषद का यह चुनाव बेहद गंदगी भरा हो गया था। इसका कारण यह था कि उषा उपाध्याय और उनके पैनल का समर्थन करने वाले कुछ साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने उषा उपाध्याय के ‘परिवर्तन मंच’ की जीत सुनिश्चित करने के लिए फेसबुक पर काफी अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल किया था । एक उदहारण. मुंबई निवासी सौरभ शाह एक जाने-माने लेखक हैं, जिनके उपन्यास पर आधारित ‘महाराज’ नाम की एक चर्चित फिल्म लगभग तीन साल पहले ही बनी थी। इस फिल्म में सूरत के वैष्णव समाज में धर्म के नाम पर फैले यौनदूषण को उजागर किया गया था। उन्होंने उषा उपाध्याय को खुला समर्थन दिया था। उन्हें और नरेंद्र मोदी के अंधभक्त माने जाने वाले नडियाद के पत्रकार जसवंत रावल को तो यही लगता था कि उषा उपाध्याय ही जीतने वाली हैं। सौरभ शाह फटाके लिए हुए अहमदाबाद में स्थित परिषद् प्रांगण में पहुँच चुके थे. लेकिन गुजराती साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की समझदारी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया!

संघी हिंदुत्व के एक ठेकेदार माने जाने वाले सौरभ शाह ने धर्मनिरपेक्ष लोगों के विरोध में अपने फेसबुक पर लिखी गई पोस्टों में पहले भी कई बार जिस अश्लील भाषा का प्रयोग किया था, क्या शायद वह साहित्य परिषद के मतदाताओं के ध्यान में था? और क्या उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिया कि उन्होंने ही उषा उपाध्याय को समर्थन दिया था? क्या उषा उपाध्याय ने स्वयं आगे बढ़कर उनका समर्थन लिया था? सौरभ शाह ने जसवंत रावल की एक FB पोस्ट को अपने फेसबुक पेज पर साझा करके किरीट दूधात के पक्ष में रहने वाले सभी लोगों को “अभद्र वामपंथी और असंस्कारी कांग्रेसी तथा उनके अनपढ़ चेलों-चपाटों.....और नामर्द” कहा था, यह भी एक हकीकत है। हालांकि, यह पता नहीं चला है कि उषा उपाध्याय ने इस भाषा को उचित ठहराया था या नहीं, लेकिन इस भाषा के बारे में उनकी लगातार बनी हुई चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।

हालांकि, यह कहा जाता रहा है कि जाने-माने पत्रकार, लेखक और धर्मनिरपेक्ष कर्मशील प्रकाश न. शाह जब छह साल पहले साहित्य परिषद के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब किरीट दूधात उनके विरोधी थे। और प्रकाश न. शाह के खिलाफ चुनाव हारने वाले हर्षद त्रिवेदी तीन साल पहले जब माधव रामानुज को हराकर साहित्य परिषद के अध्यक्ष बने थे, तब किरीट दूधात हर्षद त्रिवेदी के साथ थे। अब सवाल यह है कि गुजराती साहित्य परिषद अपनी अस्मिता और मूल स्वरूप को कैसे बनाए रखती है और राजकीय सत्ता की चापलूसी किए बिना साहित्य की सेवा का कार्य कैसे आगे बढ़ाती है।

Pro. Hemantkumar Shah

Pro. Hemantkumar Shah

प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।