राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, PM मोदी पर टिप्पणी मामले में ट्रायल रुका
यह मामला 2018 में राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर राहुल गांधी की कथित टिप्पणियों से जुड़ा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित तौर पर ‘चोरों के सरदार’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ जैसी टिप्पणियां करने से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर अस्थायी रोक लगा दी है। हालांकि, अदालत ने मामले को खारिज नहीं किया है। राहुल गांधी की याचिका पर आगे विचार किया जाएगा। यह मामला 2018 में राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर राहुल गांधी की कथित टिप्पणियों से जुड़ा है।
Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने राहुल गांधी की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। गांधी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आठ सितंबर के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला रद्द करने से इनकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि नोटिस जारी किया जाए, जिसका जवाब चार सप्ताह में दिया जाए। इस बीच, निचली अदालत में आगे की कार्यवाही रुकी रहेगी। इस आदेश के बाद फिलहाल संबंधित मामले में मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ेगी। अब सुप्रीम कोर्ट गांधी की चुनौती और संबंधित पक्षों के जवाबों पर विचार करेगा।
यह मामला भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने एक महानगरीय मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि राहुल गांधी की टिप्पणियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भाजपा और उसके सदस्यों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती हैं। शिकायत पर मजिस्ट्रेट ने राहुल गांधी को समन जारी किया था।
शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रधानमंत्री को ‘चोरों के सरदार’ बताने का अर्थ भाजपा के अन्य सदस्यों को भी ‘चोर’ के रूप में पेश करना है। उनके मुताबिक, ऐसी टिप्पणी का असर केवल प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है। इसी आधार पर उन्होंने मानहानि की शिकायत करने का अधिकार होने का दावा किया।
बता दें कि राहुल गांधी ने पीएम मोदी के खिलाफ यह टिप्पणी राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर की थी।

राहुल गांधी ने मजिस्ट्रेट के समन और मामले की कार्यवाही को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी मुख्य दलील थी कि भाजपा कार्यकर्ता की शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। राहुल गांधी के पक्ष ने कहा कि संबंधित टिप्पणी में भाजपा या किसी अन्य राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया गया था। किसी निश्चित और पहचान योग्य समूह को भी निशाना नहीं बनाया गया था। हाईकोर्ट में राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पसबोला ने दलील दी कि जब कोई स्पष्ट रूप से प्रभावित व्यक्ति या समूह ही मौजूद नहीं है, तो शिकायतकर्ता को मुकदमा चलाने का कानूनी अधिकार नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि केवल यह अर्थ निकाल लेना कि टिप्पणी पार्टी कार्यकर्ताओं पर भी लागू होती है, आपराधिक मानहानि की कार्यवाही जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भाजपा एक पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और इसलिए उसकी पहचान एक निश्चित संगठन के रूप में की जा सकती है। हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के इस कथन का भी उल्लेख किया कि वह पिछले दो दशकों से भाजपा का सक्रिय सदस्य रहा है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के अनुसार,
प्रधानमंत्री भाजपा के सदस्य हैं। ऐसे में उन्हें ‘कमांडर-इन-थीफ’ बताने वाली टिप्पणी को शुरुआती स्तर पर केवल पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व तक सीमित मान लेना उचित नहीं होगा। अदालत ने कहा कि टिप्पणी का वास्तविक आशय क्या था और उसका पार्टी सदस्यों पर क्या प्रभाव पड़ा, इन प्रश्नों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान विचार किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई गैरकानूनी बात नहीं पाई और मामला रद्द करने से इनकार कर दिया। अपने निष्कर्ष के समर्थन में अदालत ने शशि थरूर से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया था कि पंजीकरण के कारण किसी राजनीतिक दल को एक निश्चित और पहचान योग्य संगठन माना जा सकता है।

राहुल गांधी की याचिका का विरोध करते हुए महाराष्ट्र के महाधिवक्ता डॉ. मिलिंद साठे ने कहा था कि,
अदालत को देखना चाहिए कि मानहानि के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं और टिप्पणी किसी निश्चित, पहचान योग्य समूह से संबंधित है या नहीं। उन्होंने दलील दी कि ऐसा समूह स्थापित होने पर उससे प्रभावित व्यक्ति शिकायत कर सकता है, इसलिए शुरुआत में ही कार्यवाही समाप्त नहीं की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता, राहुल गांधी और महाराष्ट्र सरकार की दलीलें सुनने के बाद फरवरी में फैसला सुरक्षित रखा था। अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यही है कि क्या कथित टिप्पणियां आपराधिक मानहानि बनती हैं और क्या किसी पार्टी का कार्यकर्ता शिकायत कर सकता है, जब टिप्पणी में पार्टी या उसके सदस्यों का स्पष्ट उल्लेख न हो। फिलहाल शीर्ष अदालत ने इस विवाद पर अंतिम निर्णय देने के बजाय सुनवाई पर अस्थायी रोक लगाई है।
