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क्या ज्ञानेश कुमार इतनी आसानी से अपना पद छोड़ देंगे?

Satish Verma Satish Verma | 1h ago · 12 min read
क्या ज्ञानेश कुमार इतनी आसानी से अपना पद छोड़ देंगे?

CEC ज्ञानेश कुमार को जो कानूनी वरदान मिला है वो तो भस्मासुर को भी नहीं मिला था।

आप दुनिया भर की व्यवस्थाएं खंगालते रहिए—भारत को छोड़कर ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त को इतनी मजबूत कानूनी ढाल मिली हो। हमारे मिथकीय भस्मासुर को भी ऐसा वरदान नहीं मिला था।

पौराणिक कथा के अनुसार, भस्मासुर ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर ऐसा वरदान मांगा था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह तत्काल भस्म हो जाएगा। मगर उसी वरदान में उसके विनाश का बीज भी छिपा था। आज के भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को भी एक तरह का बिन मांगा वरदान मिल गया है—वह “भस्म” नहीं होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस व्यवस्था के पक्ष में यह तर्क देते रहे हैं कि चुनाव आयुक्तों को कठोर फैसले लेने के लिए कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा मिलनी चाहिए, ताकि वे बिना किसी दबाव के काम कर सकें। अगर यही तर्क है, तो फिर देश के हर प्रशासनिक अधिकारी को भी ऐसा ही अभेद कवच क्यों न दे दिया जाए?

कांग्रेस और पूरा विपक्ष अब ये समझ चुका है ज्ञानेश कुमार को कानून के डर से नहीं सड़कों पर आंदोलन करके ही निपटाया जा सकता है। दो अक्टूबर से पूरा विपक्ष सड़क पर आंदोलन कर रहा है। 10 अक्टूबर को तो ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए मोदी सरकार ने दिल्ली में इमरजेंसी से हालात कर दिए, मास डिटेंशन हुआ। नेता, छात्र, पत्रकार से लेकर जिन पर भी शक हुआ पुलिस उसे हिरासत में ले रही थी।

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दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम सहित कई और जगहों पर डिटेंशन सेंटर बनाए गए थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 3000 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया जिसमें तीन राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्री सहित सीजेपी के नेता, कार्यकर्ता, सोशल एक्टिविस्ट, छात्र, पत्रकार सहित आम नागरिक भी शामिल हैं।

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राहुल गांधी के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के सांसदों ने लगातार चार दिनों तक ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए सड़कों पर आंदोलन किया, गिरफ्तारी दी, राष्ट्रपति को मेमोरेंडम दिया गया, लेकिन ज्ञानेश कुमार की हेकड़ी देखिए वो टस से मस नहीं हुए। उन्हें कानूनी वरदान जो मिला हुआ है भस्म नहीं होने का।
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सुप्रीम कोर्ट ने गत सोमवार को स्पष्ट कर दिया कि ज्ञानेश कुमार को निलंबित नहीं किया जा सकता। फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर कोर्ट का रूख सख्त जरूर था,क्योंकि इसमें सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट को ही ज्ञानेश कुमार ने अपना ढ़ाल बना लिया था। सीजेआई सूर्यकांत इस पर हड़क गए और सीईसी ज्ञानेश कुमार को झूठा करार देते हुए अपने बचाव में स्पष्ट किया कि कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी तरह के कोई बदलाव को एप्रूव ही नहीं किया है। सोमवार को वोट चोरी के सरगना ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सोमवार को दो याचिकाओं पर सुनवाई हुई।

एक में इंडियन एक्सप्रेस की खबर को आधार बनाकर उन 14 बिंदुओं की जांच की मांग की गई है जिसमें ज्ञानेश कुमार ने अन्य कमिश्नरों को अनदेखा कर एकतरफा निर्णय लिए।

दूसरी याचिका में ज्ञानेश के तत्काल निलंबन के साथ साथ पूरे मामले के लिए ज्यूडिशियल इंक्वायरी की भी मांग की गई है। निलंबन को तो कोर्ट ने खारिज कर दिया।

दूसरे दिन मंगलवार को इंडिया गठबंधन के सांसदों ने संसद भवन के मकर द्वार से लेकर चुनाव आयोग के दफ्तर तक ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मार्च निकाला। राहुल गांधी बैरकेड पर चढ़े, तिरंगा फहराया। चुनाव आयोग के दफ्तर के ठीक बगल में आकाशवाणी के दफ्तर के सामने बरगद के पेड़ के नीचे राहुल और प्रियंका दिल्ली पुलिस को चकमा देकर धरना पर बैठ गए, साथ में और भी कई कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता भी बैठै।

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पूरे 9 घंटे तक दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर हाई वोल्टेज प्रदर्शन हुआ। और रात में दिल्ली पुलिस ने जबरन राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत 50 सांसदो को जबरन हिरासत में ले लिया और फिर कुछ घंटे के बाद छोड़ भी दिया।

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मोदी-शाह और ज्ञानेश कुमार पर इस आंदोलन का कितना असर हुआ ये फिलहाल कहा नहीं जा सकता लेकिन ज्ञानेश कुमार डर जरूर गए हैं। बुधवार को उनका एक कार्यक्रम था छत्तीसगढ़ में, जो कैंसल कर दिया गया। संभव है ज्ञानेश कुमार ने विरोध और प्रदर्शन के डर से छत्तीसगढ़ का अपना कार्यक्रम रद्द किया हो। ऐसा माना जा रहा है।

विपक्ष इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस पर कुछ ज्यादा ही फिदा नजर आ रहा है। यह वही अखबार है, जिसने आपातकाल के दौर में अपने “विद्रोही तेवर” के कारण अपनी एक अलग साख बनाई थी। हालांकि, बीते वर्षों में इसकी साख भी सेंसेक्स की तरह ऊपर-नीचे होती रही है। सत्ता पक्ष भी समय-समय पर इस अखबार पर मेहरबान दिखाई देता है। इंडियन एक्सप्रेस समूह के अखबारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और संघ विचारकों तक के कॉलम प्रकाशित होते रहे हैं। मोदी सरकार के मंत्री रामनाथ गोयनका पुरस्कार प्रदान करते हैं और सरकार के कामकाज के कसीदे भी पढ़े जाते हैं। कहना न होगा कि पिछले दो-तीन सालों से इंडियन एक्सप्रेस अखबार भी दैनिक जागरण के अंग्रेजी संस्करण की तरह दिखने लगा था। अपनी साख बचाने के लिए इंडियन एक्सप्रेस ने वही फार्मूला अपनाया जिसके लिए वो जाना जाता है- खोजी पत्रकारिता।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सत्ता की मर्जी के बिना मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को “पंचिंग बैग” बनाने वाली खबर प्रकाशित हुई? इस आशंका का सच होना भी संभव है और गलत होना भी।

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फिलहाल इतना जरूर है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार सोशल मीडिया पर भी “पंचिंग बैग” बन चुके हैं। जिसे मौका मिल रहा है, वह उन पर हाथ आजमा रहा है। लेकिन क्या सच में ज्ञानेश कुमार इतनी आसानी से अपना पद छोड़ देंगे?

सत्ता में शामिल सहयोगी दल भी अपनी-अपनी “फेस सेविंग” के लिए सवाल उठा रहे हैं। ताकि जनता को यह संदेश दिया जा सके कि चिराग पासवान से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक सभी बेहद निष्पक्ष और न्यायप्रिय नेता हैं। चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि स्पष्टीकरण से “जनता का भरोसा और मजबूत होगा।”

लेकिन ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक निर्धारित है। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला था। इससे पहले ही 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को ऐसा कानूनी कवच दिया जा चुका था, जिसने उसे और ज्यादा ताकतवर बना दिया है।

अब जरा 2023 में बने कानून की धारा 16 को ध्यान से पढ़िए। इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि यदि चुनाव आयुक्त अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कोई फैसला लेते हैं या कोई कार्य करते हैं, तो भारत की कोई भी अदालत उनके खिलाफ दीवानी या आपराधिक मामला न तो दर्ज करेगी और न ही उसकी सुनवाई करेगी।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर विपक्ष का यह आरोप सच साबित होता है कि जानबूझकर किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे गए, तो क्या इसे भी “आधिकारिक कर्तव्य” माना जाएगा? या फिर इसे आपराधिक साजिश की श्रेणी में रखा जाएगा?

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कानून के जानकारों की दलील है कि चुनाव आयुक्त अदालत में जाकर धारा 16 का हवाला देकर खुद को बचा सकते हैं। इसलिए मौजूदा कानून के रहते किसी सीईसी की गिरफ्तारी या उनके खिलाफ मुकदमा चलाना बेहद मुश्किल और जटिल प्रक्रिया है।

यानी मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को 2023 के नए कानून की धारा 16 के तहत उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों या किए गए कार्यों के लिए आजीवन कानूनी प्रतिरक्षा हासिल है। मतलब गिरफ्तारी तो संभव नहीं है। वो भी आजीवन।

यानी वे रिटायर भी हो जाएं, तब भी उनके आधिकारिक कार्यों के लिए उन पर कानूनी कार्रवाई करना आसान नहीं होगा।

सके बरक्स राष्ट्रपति की स्थिति देखिए। भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति पर पद पर रहते हुए कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और न ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। लेकिन कार्यकाल समाप्त होने या पद से हटने के बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यानी राष्ट्रपति के लिए भी सुरक्षा स्थायी नहीं है।

लेकिन चुनाव आयुक्तों के मामले में 2023 का कानून एक अलग तरह का कवच खड़ा करता है। इतनी तगड़ी इम्यूनिटी दी गई है मुख्य चुनाव आयुक्त को।

जनवरी 2026 में एनजीओ लोक प्रहरी ने इस “फायरबॉल” को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत मिलने वाली आजीवन कानूनी प्रतिरक्षा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस भी जारी किया था।

लेकिन अब तक कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया है। और अब मामला फिर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर है। क्या सर्वोच्च अदालत उस “फायरबॉल” को भेद पाएगी, जिसे सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए तैयार किया है?

क्या दुनिया में कहीं और भी ऐसा है? अब जरा भारत की व्यवस्था की तुलना दुनिया के दूसरे देशों से कीजिए। अमेरिका में फेडरल इलेक्शन कमीशन के सदस्यों या स्थानीय चुनाव अधिकारियों को जीवन भर की कानूनी छूट नहीं मिली हुई है। स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन में भी ऐसी व्यवस्था नहीं है। यूरोप के किसी देश में चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से आजीवन छूट देने का ऐसा प्रावधान दिखाई नहीं देता। नॉर्डिक देशों में भी चुनाव अधिकारियों को ऐसी स्थायी कानूनी प्रतिरक्षा हासिल नहीं है।

डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देश पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन के मजबूत सिद्धांतों पर चलते हैं। वहां स्वतंत्र चुनाव प्राधिकरणों के अधिकारी भी कानून से ऊपर नहीं हैं। अफ्रीका में भी ऐसा कोई देश नहीं बताया जाता, जहां चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से आजीवन या स्थायी छूट हासिल हो।

यानी आप दुनिया भर की व्यवस्थाएं खंगालते रहिए—भारत को छोड़कर ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है, जहां चुनाव आयुक्तों को इतनी मजबूत कानूनी ढाल मिली हो।

कानून की किताब में यह भी दर्ज है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। अन्य चुनाव आयुक्तों को सीईसी की सिफारिश पर हटाया जा सकता है।

राहुल गांधी का आरोप है कि चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का संरक्षण प्राप्त है। उनके बयानों के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायतें भी दर्ज की गई हैं। विपक्षी दल संसद में महाभियोग के लिए लामबंद हो रहे हैं। लेकिन क्या संसद के दोनों सदनों में मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के बीच यह वास्तव में संभव है?


इसे “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी” वाली स्थिति भी समझा जा सकता है। इतिहास में आज तक कोई चुनाव आयुक्त या जज महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है। विपक्ष शायद यह कदम इसलिए उठाना चाहता है ताकि जमीन पर उसका विरोध दिखाई दे।
लेकिन यह मानकर चलना चाहिए कि संसद में ऐसा प्रस्ताव गिर भी सकता है। इस देश में किसी मंत्री को हटाना शायद आसान हो, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त का निर्माण किसी और धातु से हुआ है। ऐसा फायरवॉल, जिसकी कल्पना दुनिया के बहुत से राजनीतिक तंत्रों ने भी नहीं की होगी।

एक और सवाल है—आखिर यह मुद्दा इस वक्त इतना बड़ा क्यों बन गया?

विपक्ष अब तक राम मंदिर चंदा चोरी को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन राजनीति में मुद्दे कभी स्थायी नहीं होते। अब राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची से जुड़े विवादों को अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में ला दिया है।

उन्होंने आरोप लगाया,

“मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश ने वोट चोरी की है। वे देशद्रोही हैं। मैंने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था, लेकिन सरकार ने मेरी बात नहीं मानी। अपने 55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी उठाया था। उनका कहना था कि भारत में हर सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी होती है। इंदिरा गांधी बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद भी चुनाव हार गई थीं। फिर भाजपा के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ? उनके मुताबिक इसकी वजह ज्ञानेश कुमार हैं।

राहुल गांधी का आरोप है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में धांधली हुई और इसी वजह से मोदी-शाह सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी सामने नहीं आई।

इन आरोपों की सच्चाई का फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया को करना है। लेकिन इन आरोपों ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस जरूर तेज कर दी है। सबसे बड़ा सवाल- 13 करोड़ मतदाताओं का क्या होगा? लेकिन इस पूरी बहस में एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल दबा हुआ है। सवाल यह नहीं है कि मतदाता सूची को अपडेट क्यों किया जा रहा है। मृत लोगों, देश छोड़ चुके लोगों या स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए लोगों के नाम हटाना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।

सवाल उन लोगों का है, जो दशकों से मतदान करते आए हैं और अब “डिस्क्रिपेंसी” जैसे कारणों के चलते मताधिकार से बाहर होने की आशंका झेल रहे हैं।
13 करोड़! नेपाल की आबादी करीब तीन करोड़ है। यानी आप अपने ही देश में लगभग चार “बिना मताधिकार वाले नेपाल” खड़े कर रहे हैं—ऐसे लोग, जो अपने वोटिंग कार्ड के लिए दर-दर भटक सकते हैं।चार-चार नेपाल!

मताधिकार नहीं तो नागरिक जीवन का क्या अर्थ बचेगा? आधार कार्ड की स्थिति क्या होगी? पासपोर्ट पर क्या असर पड़ेगा? सरकारी दस्तावेजों और नागरिक अधिकारों की स्थिति क्या होगी? इन सवालों के स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं हैं। और अगर इतने बड़े पैमाने पर लोग मताधिकार से बाहर होते हैं, तो यह केवल चुनावी आंकड़ों का सवाल नहीं रह जाएगा। यह एक बड़ा मानवीय और नागरिक अधिकारों का सवाल बन जाएगा। जो लोग मर गए, देश छोड़ गए या स्थायी रूप से कहीं और चले गए, उनकी मतदाता सूची को अपडेट करना समझ में आता है।

लेकिन जो लोग दशकों से वोट देते आए हैं, उन्हें “डिस्क्रिपेंसी” के नाम पर मानसिक यंत्रणा झेलनी पड़े और अंततः उनके मताधिकार पर सवाल खड़ा हो जाए—तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह कितना मानवीय है?

और सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है— इन 13 करोड़ लोगों का होगा क्या? उन्हें मताधिकार से बाहर कर दिया जाएगा? उन्हें दोबारा सूची में शामिल होने के लिए सालों तक दफ्तरों और अदालतों के चक्कर लगाने होंगे? या कोई ऐसी व्यवस्था होगी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वास्तविक मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न हों?

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न सरकार इस सवाल पर पूरी तरह स्पष्ट है, न विपक्ष। और अभी तक सुप्रीम कोर्ट से भी इसका कोई अंतिम और स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आया है।

ऐसे में आशंका यह है कि मामला सिर्फ चुनाव आयोग बनाम विपक्ष नहीं रहेगा। यह धीरे-धीरे करोड़ों लोगों के नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल बन सकता है।

क्योंकि आखिर लोकतंत्र में सबसे बुनियादी सवाल यही है- जिस नागरिक के पास वोट देने का अधिकार ही नहीं बचा, उसके लोकतांत्रिक अस्तित्व की गारंटी कौन देगा?
Satish Verma

Satish Verma

सतीश वर्मा पेशे से पत्रकार हैं। हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता में इन्हें 20 साल से ज्यादा का अनुभव है।