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क्या जन गण मन अंग्रेजों की तारीफ में लिखा गया है?

Ashok Kumar Pandey Ashok Kumar Pandey | 1h ago · 5 min read
क्या जन गण मन अंग्रेजों की तारीफ में लिखा गया है?

दरअसल यह पूरा विवाद उस समय के अंग्रेज परस्त अखबारों की रिपोर्टिंग के कारण खड़ा हुआ था।

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कतई जॉर्ज पंचम की प्रशस्ति में राष्ट्रगीत जन गण मन नहीं गाया था। यह एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है। फिर भी आरएसएस और भाजपा के लोग इसको लेकर हमेशा अनावश्यक विवाद को तूल देते रहते हैं। मैंने इसको लेकर The Credible History यू-ट्यूब चैनल पर विस्तार से एक वीडियो के जरिये सब कुछ बताया है और इस वीडियो को अब तक 37 लाख से अधिक लोगों ने देखा है।

अब जब एक बार फिर राष्ट्रगीत जन गण मन को लेकर भाजपाई और संघी झूठे नैरेटिव फैलाने की कोशिश कर रहे हैं तो इसे विस्तार से लेख के माध्यम से आपके समक्ष रखना ज्यादा जरूरी हो गया है, ताकि इनके झूठ और प्रोपेगेंडा पर से पर्दा उठ सके।

दरअसल यह पूरा विवाद उस समय के अंग्रेज परस्त अखबारों की रिपोर्टिंग के कारण खड़ा हुआ था। अंग्रेज परस्त अखबारों ने जानबूझकर ऐसी रिपोर्टिंग की जिससे ये लगे कि गुरुदेव ने जॉर्ज पंचम की तारीफ में यह गीत गाए थे। आज के दौर में ही नहीं, पहले भी कम शरारतपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं करते थे अखबार।

इस विवाद की जड़ क्या है और यह विवाद कितना सही है इसे समझने के लिए यह जानना ज्यादा जरूरी है कि वो कौन सा समय था और उस समय कौन सी घटनाएं हुईं थी। उस समय दो बड़ी घटनाएं हुई थीं और दोनों घटनाएं दरअसल जुड़ी हुई थीं।

ब्रिटेन के राजा एडवर्ड सप्तम की मृत्यु हुई थी और जॉर्ज पंचम ब्रिटेन के नए सम्राट बने थे। पहली घटना यह थी कि कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की राजधानी बनाया गया और दूसरी घटना यह थी कि बंगाल विभाजन का जो निर्णय लिया गया था उसे वापस ले लिया गया था। उस समय कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। जैसे कि उस समय परंपरा थी, जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए कलकत्ता के अधिवेशन में कार्यक्रम रखा गया था। जब वह अधिवेशन चल रहा था तो उस समय के अखबारों की रिपोर्टिंग को आधार बनाते हुए यह शोर शुरू हुआ और विवाद हुआ कि गुरुदेव रवींद्रनाथ ने जॉर्ज पंचम के स्वागत में उनकी तारीफ करते हुए प्रशस्ति गान किया है।

इन आरोपों का हवा दिया था एंग्लो इंडियन प्रेस से छपने वाले अखबार की वो रिपोर्टिंग जिसने पूरे घटनाक्रम को घालमेल कर खबर प्रकाशित की थी। The Englishman नाम का एक अखबार था जिसमें छपा था कि जॉर्ज पंचम के सम्मान में रवींद्रनाथ टैगोर के स्वरचित गीत के साथ कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए The Statesman अखबार ने लिखा कि बंगाली कवि रवींद्रनाथ ने सम्राट का स्वागत करने के लिए स्वरचित गीत गाया।

हांलाकि उसी कांग्रेस अधिवेशन की एक और खबर पूरे डिटेल में Bengali नाम के एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी जिसे लोग कोट नहीं करते हैं। इस खबर में पूरा सच सामने आया था। इस खबर को जब आप आर्काइव में विस्तार से पढ़ेंगे तो अंग्रेज परस्त अखबारों के शरारत और उनके झूठ पर से पूरा पर्दा उठ जाता है।

Bengali अखबार ने लिखा था- बांग्ला कवि रवींद्रनाथ टैगोर के स्वरचित गीत से कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ। फिर अखबार लिखता है कि- अधिवेशन में जॉर्ज पंचम के प्रति विश्वसनीयता प्रकट करते हुए एक प्रस्ताव पास किया गया और फिर बच्चों की एक मंडली ने जॉर्ज पंचम के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए एक गीत गाया। बच्चों ने जो गीत गाया था उसे अंग्रेज परस्त अखबारों ने अपने रिपोर्टिंग में शामिल नहीं किया था।
इन अखबारों ने सारा मिक्सअप कर दिया था। दरअसल बच्चों ने जो जॉर्ज पंचम के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए गीत गाया था वो हिंदी में लिखा हुआ गीत था, जो रामभुज चौधरी ने जॉर्ज पंचम के प्रति सम्मान व्यक्त करते लिखा था। अब रामभुज चौधरी के गीत पर कोई चर्चा भी नहीं होती है। दरअसल सच ये है कि गुरुदेव ने जो स्वरचित गीत जन गण मन गाया था उससे कांग्रेस के अधिवेशन की शुरुआत हुई थी। फिर उसके बाद अधिवेशन में जॉर्ज पंचम के प्रति विश्वसनीयता प्रकट करते हुए एक प्रस्ताव पास किया और फिर उनके स्वागत में, सम्मान में रामभुज चौधरी रचित हिंदी गीत जो जॉर्ज पंचम की तारीफ में, उनकी प्रशस्ति में लिखा गया था, वो वहां बच्चों की टोली ने गाया था।

1911 की काँग्रेस की आधिकारिक रिपोर्ट कहती है-

कांग्रेस के 28 वें वार्षिक अधिवेशन के पहले दिन की कार्यवाही की शुरुआत वंदे मातरम के गायन से शुरू हुई। दूसरे दिन बाबू रवीन्द्रनाथ टैगोर के एक देशभक्ति गीत के गायन से कार्यवाही का आरंभ हुआ। शुभचिंतकों के संदेशों का पाठ किया गया और सम्राट जॉर्ज पंचम के प्रति निष्ठा का प्रस्ताव पास किया गया। इसके बाद जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी के स्वागत में लिखा गीत गाया गया।

असल में आप देखेंगे तो आप गुरुदेव रचित राष्ट्रगीत जन गण मन का पहला बंद देखेंगे तो आपको बात समझ में नहीं आएगी। लेकिन मैं आपके समक्ष दो बंद उस गीत का रखता हूं जिससे बिल्कुल पानी की तरह स्पष्ट हो जाएगा कि 'जन गण मन से' उनका अभिप्राय क्या था। वो छंद है-

अहरव तब आह्वान प्रचारित सुनु उसकी उदार वाणी

हिंदू, बौद्ध-सिख-जैन-पारसी-मुसलामान-क्रिस्तानी

पूरब-पश्चिम आते तुम्हारे सिंहासन के पास प्रेम हार है बनता

जन गण एक्य है विधायक, जय है भारत भाग्य विधाता

पतन-अभ्युदय-वंधुर-पंथा, युग-युग से धावित यात्री

हे चिर सारथी तुम्हारे रथ चक्र से मुखरित है दिन-रात्रि

भीषण क्रांति के बीच सुनाई देती है तुम्हारी तुम्हारी शंखध्वनि

संकट-दुख-त्राता जन-गण-पथ-परिचायक जय हे भारत भाग्य विधाता।

इस दोनों छंद को पढ़ते आपको समझ में आ गया होगा कि जन गण मन का क्या अभिप्राय था। रवींद्रनाथ से स्वंय एक युवा पुलिंद बिहारी सेन के आरोपों का जवाब देते हुए एक पत्र लिखकर विस्तार से बताते हुए लिखा था कि,

कांग्रेस के अधिवेशन का आयोजन चल रहा था। सरकार में प्रतिष्ठावान में मेरे एक मित्र ने जॉर्ज पंचम के जयगान के लिए विशेष रूप से मुझे अनुरोध किया। आश्चर्यचकित होने के साथ मेरे मन में गुस्सा भी हुआ। उसी की प्रबल प्रक्रिया में मैंने जन गण मन गीत में उस भारत भाग्य विधाता के जय की घोषणा की- पतन-अभ्युदय-वंधुर-पंथा, युग-युग से धावित यात्रियों के जो चिर सारथी हैं, जो जनता के अंतर्यामी पथ परिचारक हैं। मेरे राजभक्त मित्र भी समझ गए थे कि युग-युगांतर के वो मानव रथ चालक किसी भी हालत में पांचवे या छठे जॉर्ज नहीं हो सकते।

जन गण मन गीत उस जनता के प्रति समर्पित था जो युग-युग से संघर्ष कर रहे थे। इस संघर्ष के नायक यानि जनता के अधिकारों के लिए लड़ने वालों लोगों के प्रति समर्पित था यह गीत। इस बात को समझना जरूरी है सदियों से मनुष्य के संघर्ष में नायक की भूमिका जिसने निभाई उसकी प्रशंसा में गाया हुआ गीत है यह।

Ashok Kumar Pandey

Ashok Kumar Pandey

Ashok Kumar Pandey is the Managing Editor of The Credible News.