BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने कभी मोदी जी को कहा था मेरे प्रभु
2014 में BCI चेयरमैन रहते हुए मनन कुमार मिश्रा ने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के लिए खुले तौर पर प्रचार किया।
मनन कुमार मिश्रा यूं ही नहीं बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सात टर्म से चेयरमैन बने हुए हैं। मनन मिश्रा की कहानी 13 और 14 अगस्त की दरमियानी रात 12.37 बजे से नहीं शुरू होती है। इनकी कहानी तो 2014 से शुरू होती है जब 2014 में BCI चेयरमैन रहते हुए, मनन कुमार मिश्रा ने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के लिए खुले तौर पर प्रचार किया। मोदी की शान में इन्होंने इतने कसीदे गढ़े हैं कि बड़े-बड़े चारण- भाट के कद इनके सामने कमतर हो जाए। पिछले 12 वर्षों में ऐसे कई मौकों आए जब इन्होंने मोदीभक्ति का नायाब उदाहरण पेश किया है।
सोशल मीडिया एक्स पर हैदराबाद के आंत्रप्रेन्योर नयनी अनुराग रेड्डी ने मनन मिश्रा की मोदीभक्ति का कच्चा चिठ्ठा खोलते हुए 2014 से लेकर 2026 तक के ऐसे कई मौकों का टाइमलाइन शेयर किया है जब मोदी की शान में मिश्रा न सिर्फ कसीदे गढ़ रहे हैं बल्कि प्रदर्शनकारियों को अज्ञानी और देशद्रोही तक कह रहे हैं।
2014 में गांधीनगर में BCI के एक कार्यक्रम में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी की तुलना महात्मा गांधी से की थी। यहां तक कह दिए कि नरेंद्र मोदी की काया में महात्मा गांधी का पुनर्जन्म हुआ है। उन्होंने कहा कि वह ऐसा 17 लाख वकीलों के प्रतिनिधि के तौर पर कर रहे हैं। यह किसी व्यक्ति की निजी राजनीतिक राय नहीं थी।
मोदीभक्ति का आलम देखिए मनन मिश्रा ने यह बयान बतौर बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन के रूप में दिया था। वो एक राजनीतिक नेता के लिए प्रचार करते हुए पूरी कानूनी बिरादरी के नाम पर ये सब बोल रहे थे।
इसके बाद मिश्रा ने सीधे 2016 में पीएम मोदी को एक पत्र लिखा। इस पत्र में जिस संस्था की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए, उसके चेयरमैन द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा असाधारण थी। उन्होंने पीएम मोदी को पत्र लिखते हुए कुछ इस अंदाज में उन्हें संबोधित किया-
“मेरे प्रभु।”
“हमारे संरक्षक।”
“हमारे मार्गदर्शक।”
“दुनिया के सबसे कुशल और सक्षम नेता।
लेकिन इनमें सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली पंक्ति थी। “बार काउंसिल ऑफ इंडिया आपकी संस्था है। इसे एक बार फिर पढ़िए।
यह पत्र लिखते हुए मिश्राजी मोदीभक्ति की भावना में इतने बह गए कि वो यह भूल गए कि कानूनी पेशे का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था किसी एक व्यक्ति की निजी या राजनीतिक संस्था नहीं हो सकती।
फिर 2018 में मिश्रा ने BCI के चेयरमैन पद पर रहते हुए सार्वजनिक रूप से तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा से आग्रह किया कि वे रिटायरमेंट के बाद सरकार से कोई पद स्वीकार न करें। BCI ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा के लिए यह जरूरी है। लेकिन जब पूर्व CJI रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया, तो BCI ने इसका स्वागत करते हुए इसे “विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक पुल” बताया और इस नियुक्ति की आलोचना को “अनुचित और समय से पहले” करार दिया। संस्था वही थी।न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सवाल भी वही था। लेकिन जवाब बिल्कुल अलग था।
फिर 2019 में CAA विरोधी प्रदर्शन आए। इस मौके पर मिश्रा ने BCI के मंच का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनकारियों को गुमराह की जा रही “अनपढ़ और अज्ञानी भीड़” बताया। हांलाकि इस मौके पर उनकी मोदीभक्ति काम नहीं आई। उनका दांव उलटा पड़ गया। उनके इस बयान के बाद करीब 1,000 वकीलों ने इस बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि यह बार के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
मुद्दा यह नहीं है कि कोई CAA के समर्थन में था या विरोध में। सवाल यह है कि क्या कानूनी पेशे का प्रतिनिधित्व करने वाली एक वैधानिक संस्था के चेयरमैन को उस संस्था के अधिकार और प्रभाव का इस्तेमाल अपने विरोध के अधिकार का प्रयोग कर रहे नागरिकों के लिए इस तरह की भाषा में करना चाहिए?
2021 में BCI ने अपने नियमों में संशोधन किया और BCI या राज्य बार काउंसिलों के फैसलों की सार्वजनिक आलोचना को दंडनीय बनाने की कोशिश की। इसके परिणामस्वरूप निलंबन या अयोग्यता जैसी कार्रवाई भी हो सकती थी। इसके पीछे के सिद्धांत के बारे में सोचिए। वकीलों को नियंत्रित करने वाली संस्था, वकीलों को उसी संस्था की सार्वजनिक आलोचना करने से रोकने की कोशिश कर रही थी। इसका जबरदस्त विरोध हुआ। आखिरकार विवादित प्रावधानों को स्थगित कर दिया गया। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मिश्रा के नेतृत्व में BCI ने आलोचना को किस तरह देखा है।
फिर आया 2026। देश के युवा विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे। मिश्रा की प्रतिक्रिया थी कि,
छात्र आंदोलनों में “असामाजिक और राष्ट्र-विरोधी ताकतें” घुस गई हैं। उन्होंने कानूनी बिरादरी और बुद्धिजीवियों से उनका मुकाबला करने की अपील भी की।
सोचिए, ऐसी भाषा कितनी खतरनाक हो सकती है। अगर आवाज उठाने वाले युवाओं के प्रति पहली प्रतिक्रिया उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” बताना है, तो हम वकीलों की अगली पीढ़ी को असहमति के बारे में क्या सिखा रहे हैं? क्या सत्ता से सवाल करना खतरा है? BCI चेयरमैन का पद भारत के कानूनी पेशे के सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक है। उस पद पर बैठा व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जिसके रहते वकील बोलने में खुद को स्वतंत्र महसूस करे। डरे हुए नहीं। सरकार से सवाल करने के लिए स्वतंत्र रहें। जजों से सवाल करने के लिए स्वतंत्र रहें। असहमति जताने के लिए स्वतंत्र रहें। क्योंकि बार का अस्तित्व सत्ता और नागरिक के बीच खड़े होने के लिए है, सत्ता के साथ मिलकर नागरिक के खिलाफ खड़े होने के लिए नहीं। BCI उसके चेयरमैन की नहीं है। यह बार की संस्था है। और बार की स्वतंत्रता की शुरुआत एक बेहद सरल सिद्धांत से होती है। असहमति, देश के प्रति कोई द्रोह या गद्दारी नहीं है।
गौरतलब है कि मनन कुमार मिश्रा वरिष्ठ अधिवक्ता और बिहार से राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया था। वह देश में वकीलों और कानूनी शिक्षा की शीर्ष नियामक संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष भी हैं। मौजूदा विवाद में उनकी यह भूमिका केंद्र में है। बिहार के गोपालगंज जिले के रहने वाले मिश्रा ने छपरा के राजेंद्र कॉलेज से बीएससी (ऑनर्स) की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने पटना लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उन्होंने वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत गोपालगंज सिविल कोर्ट से की। इसके बाद 1982 में वह पटना हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता बने।
मिश्रा नवंबर 2014 से BCI का नेतृत्व कर रहे हैं। 2025 में उन्हें रिकॉर्ड सातवीं बार लगातार BCI का अध्यक्ष चुना गया। अध्यक्ष का कार्यकाल दो साल का होता है। कानूनी क्षेत्र के अलावा मिश्रा राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। भाजपा में शामिल होने से पहले उन्होंने 2010 का बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था। 2024 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया, जहां वह निर्विरोध निर्वाचित हुए।