बच्चों की थाली से गायब हो रहे फल व सब्जियां, भारत और पाकिस्तान की स्थिति सबसे गंभीर
वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि भारत में बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन की भारी कमी है।
कहते हैं कि बचपन में थाली में परोसी गई खाने की आदतें ही पूरी जिंदगी की सेहत की दिशा तय करती हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि आज दुनिया भर में करोड़ों बच्चों की थाली से पोषण के सबसे अहम स्रोत—फल, सब्जियां, दालें, बीन्स, मेवे और बीज—धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं।
डाउन टू अर्थ मैग्जीन के अनुसार, इसी चिंता को लेकर किए गए एक नए वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि,
दुनिया के अधिकांश बच्चे स्वस्थ विकास के लिए जरूरी फल, सब्जियां, दालें, बीन्स, मेवे और बीज पर्याप्त मात्रा में नहीं खा रहे हैं। इसका असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास के साथ-साथ भविष्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
यह अध्ययन टफ्ट्स यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया है और इसके निष्कर्ष प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ बच्चों के शारीरिक विकास, मस्तिष्क के विकास, सीखने की क्षमता, मानसिक चपलता और भविष्य में होने वाली कई गैर-संचारी बीमारियों से बचाव के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके बावजूद दुनिया के अधिकांश बच्चे विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई मात्रा से काफी कम फल और सब्जियां खा रहे हैं।
इस अध्ययन में 1990 से 2018 के बीच 185 देशों में किए गए 1,248 से अधिक आहार सर्वेक्षणों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें जन्म से लेकर 19 वर्ष तक के बच्चों और किशोरों के भोजन में पौधों पर आधारित पांच प्रमुख खाद्य समूहों—फल, बिना स्टार्च वाली सब्जियां, स्टार्च वाली सब्जियां (आलू को छोड़कर), दालें एवं बीन्स तथा मेवे एवं बीज—की खपत का आकलन किया गया। अध्ययन के अनुसार,
दुनिया भर में एक वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रतिदिन औसतन केवल 1.19 सर्विंग पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थ खाते हैं। 15 से 19 वर्ष के किशोरों में यह मात्रा बढ़कर 3.55 सर्विंग प्रतिदिन हो जाती है, लेकिन यह भी विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई मात्रा से काफी कम है। वहीं सभी आयु वर्गों को मिलाकर देखा जाए तो दुनिया के बच्चे औसतन प्रतिदिन सिर्फ 2.8 सर्विंग पौध-आधारित भोजन ही खा रहे हैं। अध्ययन में दुनिया के 25 सबसे अधिक आबादी वाले देशों की भी तुलना की गई। इसमें दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के पौध-आधारित पौष्टिक भोजन के मामले में पाकिस्तान और भारत सबसे निचले पायदान पर पाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक,
पाकिस्तान में दो साल से कम उम्र के बच्चे औसतन प्रतिदिन केवल 0.41 सर्विंग, जबकि भारत में 0.54 सर्विंग ही पौधों पर आधारित भोजन लेते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह फलों और बिना स्टार्च वाली सब्जियों का बेहद कम सेवन है। इथियोपिया भी इस सूची में सबसे पीछे रहने वाले देशों में शामिल है।
एक सर्विंग का मतलब क्या है?
अध्ययन में अलग-अलग आयु वर्ग के अनुसार एक सर्विंग का मानक भी तय किया गया है।
फलों के लिए:
- 6 से 11 महीने के शिशु: 49 ग्राम
- 12 से 24 महीने के बच्चे: 75 ग्राम
- 3 से 19 वर्ष के बच्चे और किशोर: 100 ग्राम
बिना स्टार्च वाली सब्जियों के लिए:
- 6 से 11 महीने: 44 ग्राम
- 12 से 24 महीने: 50 ग्राम
- 3 से 19 वर्ष: 100 ग्राम
आलू को छोड़कर अन्य स्टार्चयुक्त सब्जियों की एक सर्विंग क्रमशः 42 ग्राम, 47 ग्राम और 160 ग्राम निर्धारित की गई है। अध्ययन की सबसे अहम बात यह रही कि कई उच्च आय वाले देशों में बच्चों की उम्र बढ़ने के साथ फल और सब्जियों का सेवन घटता जाता है। अमेरिका इसका प्रमुख उदाहरण है। वहां दो वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रतिदिन लगभग 2.7 सर्विंग फल और सब्जियां खाते हैं, लेकिन 2 से 19 वर्ष की उम्र में यह घटकर 1.8 सर्विंग रह जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया के बच्चों में लगभग हर आयु वर्ग में पौधों पर आधारित खाद्य पदार्थों का सेवन सबसे कम है। इसके विपरीत पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों के बच्चे सबसे अधिक फल और विशेष रूप से बिना स्टार्च वाली सब्जियां खाते हैं। देशों की तुलना करें तो वियतनाम, कांगो और मेक्सिको के बच्चे सबसे अधिक पौध-आधारित भोजन लेते हैं, जबकि स्पेन, पाकिस्तान और ब्रिटेन इस मामले में सबसे पीछे हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अधिकांश क्षेत्रों में लड़कियां, लड़कों की तुलना में थोड़ा अधिक फल और सब्जियां खाती हैं। शहरों में रहने वाले बच्चों का भोजन ग्रामीण बच्चों की तुलना में अधिक संतुलित पाया गया। वहीं जिन परिवारों में शिक्षा का स्तर अधिक है, वहां बच्चों के भोजन में लगभग सभी प्रकार के पौध-आधारित खाद्य पदार्थों की मात्रा भी ज्यादा देखी गई।
रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि 1990 से 2018 के बीच दुनिया में पौध-आधारित भोजन का सेवन बढ़ा जरूर है, लेकिन यह सुधार अभी भी पर्याप्त नहीं है। सबसे चिंता की बात यह है कि इस पूरे दौर में दक्षिण एशिया ऐसा क्षेत्र रहा, जहां इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति दर्ज नहीं हुई। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सिडनी यरली का कहना है कि बचपन में विकसित होने वाली खानपान की आदतें पूरी जिंदगी स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। इसलिए बच्चों को पौष्टिक भोजन सुलभ और किफायती तरीके से उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। वहीं वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. डेरियस मोजाफेरियन के अनुसार,
यदि बच्चों को सही भोजन नहीं मिलता तो इसका असर केवल उनके शरीर पर ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क के विकास, ऊर्जा स्तर, सीखने की क्षमता, मनोदशा और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) पर भी पड़ता है।
आज स्थिति यह है कि बच्चों की थाली से हरी सब्जियां, दालें, फल और मेवे लगातार कम हो रहे हैं, जबकि जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों का सेवन तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल बचपन की पोषण संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि भविष्य में कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की नींव भी बन सकती है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बच्चों की थाली से फल और सब्जियों का लगातार गायब होना आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकेत है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में समाज को बढ़ती बीमारियों, कमजोर स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।