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MP के सरकारी अस्पताल में 6 महीनों में 80 बच्चों की मौत, BJP विधायक ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 4 min read
MP के सरकारी अस्पताल में 6 महीनों में 80 बच्चों की मौत, BJP विधायक ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल

अप्रैल से जून के बीच 34 और जुलाई से सितंबर के बीच 46 बच्चों ने दम तोड़ा।

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के एक सरकारी अस्पताल में पिछले छह महीनों के दौरान कम से कम 80 नवजात शिशुओं की मौत हुई है। बुधवार को प्रकाशित Indian Express की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से जून के बीच 34 और जुलाई से सितंबर के बीच 46 शिशुओं ने दम तोड़ा। इन मौतों के बाद अस्पताल में इलाज की व्यवस्था, डॉक्टरों की मौजूदगी और शिशुओं की देखभाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

अस्पताल प्रशासन ने मौतों की मुख्य वजह समय से पहले जन्म और जन्म के समय कम वजन बताया है। वहीं, कुछ परिवारों ने आरोप लगाया है कि उनके बच्चों को पर्याप्त और समय पर इलाज नहीं मिला। स्थानीय भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन ने भी अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाते हुए मामले की जांच की मांग की है।


बच्चों की मौत और इलाज में लापरवाही की शिकायतें मिलने के बाद स्थानीय विधायक राय ने शनिवार को अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। उन्होंने Indian Express को बताया कि,

अस्पताल पहुंचने पर वहां मौजूद आउटसोर्स कर्मचारियों ने शुरुआत में उन्हें भीतर जाने से रोकने की कोशिश की। विधायक के मुताबिक, कर्मचारियों ने कहा कि अस्पताल में विभागीय जांच और ऑडिट चल रहा है। राय ने आरोप लगाया कि उनके निरीक्षण के समय वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। उन्होंने बताया कि उन्हें डॉक्टरों की अनुपस्थिति, मरीजों से पैसे मांगने और बड़ी संख्या में नवजातों की मौत की शिकायतें मिली थीं।
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विधायक राय ने दावा किया कि,

पिछले तीन महीनों में 46 बच्चों की मौत सांस लेने में कठिनाई के कारण हुई। उनके मुताबिक, अस्पताल में ऐसे बच्चों के लिए वेंटिलेटर उपलब्ध है और उसकी निगरानी के लिए डॉक्टर की तैनाती होनी चाहिए, लेकिन रात में डॉक्टर मौजूद नहीं रहते। उन्होंने नर्सों के प्रशिक्षण पर भी सवाल उठाए।

विधायक ने कहा कि जिला अस्पताल में मुख्य रूप से गरीब परिवार इलाज कराने पहुंचते हैं। उन्होंने मांग की कि,

अगर जांच में डॉक्टरों की लापरवाही से बच्चों की मौत की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।

दूसरी ओर, सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नवकार ने अस्पताल का पक्ष रखते हुए कहा कि जिले के ग्रामीण इलाकों से गंभीर हालत वाले शिशुओं को यहां की विशेष नवजात देखभाल इकाई, यानी एसएनसीयू, में रेफर किया जाता है। इनमें कई बच्चे गर्भावस्था के छह, सात या आठ महीने में ही पैदा हो जाते हैं। नवकार के अनुसार, अस्पताल ने पिछले छह महीनों में 1,188 बच्चों का इलाज किया। इनमें 642 बच्चों का जन्म के समय वजन सामान्य से कम था। उन्होंने बताया कि काफी कम वजन वाले 582 बच्चों को उपचार दिया गया, जिनमें 1,100 ग्राम, 900 ग्राम और यहां तक कि 500 ग्राम वजन वाले नवजात भी शामिल थे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, जन्म के समय 2.5 किलोग्राम से कम वजन को कम जन्म वजन माना जाता है। नवकार ने कहा कि समय से पहले पैदा हुए और कम वजन वाले बच्चों में मृत्यु का जोखिम अधिक होता है। उन्होंने दावा किया कि ऐसी स्थिति में मृत्यु दर 48 प्रतिशत तक हो सकती है।
From Unicef Portal


अस्पताल का बचाव करते हुए नवकार ने कहा कि एसएनसीयू में नवजात मृत्यु दर 7.5 प्रतिशत से कम है और जबलपुर संभाग के अन्य जिलों से भी नीचे है। उन्होंने नवजात इकाइयों के लिए 10 प्रतिशत को अनुशंसित मृत्यु दर मानक बताया। हालांकि, राय ने इस आकलन पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि अस्पताल में दर्ज मौतों के आंकड़े पूरी स्थिति नहीं दिखा सकते, क्योंकि गंभीर हालत वाले कुछ नवजातों को दूसरे अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है। उन्होंने इसी आधार पर प्रशासन के तुलनात्मक दावे पर सवाल उठाया।

सिविल सर्जन नवकार ने जिला अस्पताल से जुड़े मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग से अधिक सहयोग की जरूरत भी बताई। उनके मुताबिक, अस्पताल ने विभाग से सहायता मांगी थी, लेकिन आवश्यक ड्यूटी व्यवस्था नहीं की गई।

इस बीच, बरघाट ब्लॉक के डुंगरिया गांव निवासी मनीष वारकड़े ने आरोप लगाया कि जुलाई में अस्पताल में भर्ती उनकी पत्नी को समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिली। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी को बरघाट से सिवनी रेफर किया गया था और नवजात की एसएनसीयू में भर्ती होने के बाद मौत हो गई।
जवारकाठी निवासी संजय उइके ने भी अपने बच्चे की मौत का विवरण दिया। उनके अनुसार, गर्भावस्था में जटिलताएं आने पर उनकी पत्नी को सिवनी भेजा गया था। बच्चा सातवें महीने में पैदा हुआ और उसका वजन लगभग 1.6 किलोग्राम था। डॉक्टरों ने परिवार को बताया था कि बच्चे की धड़कन कमजोर है।

उइके ने कहा कि कई दिन एसएनसीयू में रखने के बाद बच्चे को दूसरी मशीन पर स्थानांतरित किया गया और कुछ घंटों बाद उसकी मौत हो गई। परिजनों की शिकायतों और विधायक के आरोपों के बीच अस्पताल प्रशासन मौतों के पीछे समयपूर्व जन्म और कम वजन को प्रमुख कारण बता रहा है।