यह तो होना ही था, चंपत राय बचा लिए गए
चंपत राय की नजदीकी भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व से है।
यह तो होना ही था। चंपत राय बचा लिए गए। अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) ने ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय को क्लीन चिट दे दी है। SIT ने ट्रस्ट के पूर्व सदस्य अनिल मिश्रा को भी आरोपों से मुक्त कर दिया है। दान चोरी के आरोप सामने आने के बाद राय और मिश्रा दोनों ने अयोध्या राम मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।
अब बड़ा सवाल ये है कि चंपत राय पर जब सीधे आरोप लग रहे थे तो फिर उन्हें क्लीन चिट कैसे मिल गई। दरअसल चंपत राय की नजदीकी भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व से है। The Wire ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि,
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से चंपत राय की नजदीकी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2018 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के चुनाव के दौरान उन्होंने एक तरह की “वफादारी की परीक्षा” पास की थी। उस समय उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के खेमे के करीबी माने जाने वाले उम्मीदवार का समर्थन किया था। राय को विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और कट्टर हिंदुत्ववादी नेता अशोक सिंघल का भी करीबी माना जाता था। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अशोक सिंघल एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे थे।
अब ताजा घटनाक्रम यह है कि 17 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में विशेष जांच दल (SIT) को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। यह निर्देश उन कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिनमें श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावा के संग्रह में वित्तीय अनियमितताओं की अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते कहा कि,
हम याचिकाकर्ताओं या जनहित में काम करने वाले किसी अन्य वास्तविक व्यक्ति को भी यह अनुमति देते हैं कि वे उन पहलुओं के संबंध में सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को अपने सुझाव दे सकते हैं, जिनकी SIT द्वारा गहन जांच किए जाने की आवश्यकता हो सकती है। सॉलिसिटर जनरल का कार्यालय इन सुझावों को SIT को भेजेगा। हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि SIT इन सुझावों पर निष्पक्ष रूप से विचार करेगी।
उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सोमवार को अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में विशेष जांच टीम की अंतिम रिपोर्ट आगे की कार्रवाई के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंप दी। बता दें कि राय और मिश्रा ने चोरी के आरोप सामने आने के बाद 27 जून को ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद SIT ने मंदिर में दान प्रबंधन की प्रक्रिया को लेकर दोनों से पूछताछ की थी। सूत्रों के मुताबिक, पूछताछ के दौरान चंपत राय ने मंदिर में हुई दान चोरी में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया। उन्होंने कहा कि संदिग्धों को उनकी ही शिकायत के बाद गिरफ्तार किया गया था। सूत्रों के अनुसार, राय ने पुलिस को यह भी बताया कि चढ़ावा चोरी में किसी तरह की गड़बड़ी न हो, यह सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी थी और जैसे ही उन्हें अनियमितता की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत कार्रवाई की।
तीन सदस्यीय SIT का गठन राज्य सरकार ने 13 जून को ट्रस्ट के अनुरोध पर किया था। यह कदम मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले उठाया गया था। SIT की अध्यक्षता लखनऊ के मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने की। लखनऊ रेंज के पुलिस महानिरीक्षक किरण एस. और विशेष सचिव (वित्त) नील रतन कुमार इसके अन्य सदस्य हैं। समिति ने 23 जून को राज्य सरकार को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें कई सख्त सिफारिशें की गई थीं। प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन ने श्रीराम जन्मभूमि थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद 25 जून को मामले में FIR दर्ज की गई।
FIR में आठ लोगों—अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रामाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू—के साथ कुछ अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया। इन सभी को गिरफ्तार कर लिया गया है। इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(a) के तहत मामला दर्ज किया गया है। प्रारंभिक रिपोर्ट ही बाद में दर्ज की गई FIR और गिरफ्तारियों की कार्रवाई का आधार बनी। मामला ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर श्रीराम जन्मभूमि थाने में दर्ज किया गया था। FIR में नामजद सभी आठ आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं और फिलहाल जेल में हैं।
प्रारंभिक SIT रिपोर्ट में सामने आया था कि 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच काउंटिंग रूम यानी दान की नकदी गिनने वाले कमरे में करीब 70 बार नकदी चोरी की घटनाएं पकड़ी गई थीं। CCTV फुटेज में कर्मचारी बार-बार नकदी छिपाते और उसे बाहर ले जाते दिखाई दिए थे।
रिपोर्ट में ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा संयुक्त रूप से अपनाई जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन न किए जाने की ओर भी इशारा किया गया था। इसमें प्रवेश और निकास के समय कर्मचारियों की उचित तलाशी न होना भी शामिल था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अयोध्या में दर्ज मामले की जांच अब लखनऊ रेंज के IG किरण एस. की अध्यक्षता वाली दूसरी SIT की निगरानी में चल रही है।
यह विवाद पहली बार 7 जून को सामने आया था, जब समाजवादी पार्टी के नेता तेज नारायण ‘पवन’ पांडेय ने आरोप लगाया कि मंदिर में चढ़ावे के रूप में आए करीब 5 करोड़ से 7.5 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई है। 13 जून को मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध पर राज्य सरकार ने SIT गठित की। इसके बाद 15 से 20 जून के बीच अयोध्या में प्रारंभिक जांच की गई।
SIT ने दान प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया की जांच की। इसमें दान पेटियां, नकदी की गिनती, नकदी और कीमती सामान का भंडारण, लेखा प्रक्रिया, प्रवेश नियंत्रण और CCTV निगरानी शामिल थी। प्रारंभिक जांच में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई नकदी और कीमती वस्तुओं के प्रबंधन में प्रथम दृष्टया अनियमितताएं सामने आई थीं।
2019 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद मंदिर निर्माण की देखरेख के लिए भारत सरकार ने ट्रस्ट का गठन किया था। ट्रस्ट की वेबसाइट के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में इसके गठन की घोषणा की थी। ट्रस्ट के कुल 15 सदस्यों में से 12 सदस्यों को सरकार ने नियुक्त किया था, जबकि पहली बैठक में तीन अन्य सदस्यों का चयन किया गया था। ट्रस्ट द्वारा 21 मार्च को अयोध्या में हुई कार्यकारी समिति की बैठक में पेश किए गए विवरण के अनुसार,
1 अप्रैल 2025 से 28 फरवरी 2026 के बीच ट्रस्ट को 82.78 करोड़ रुपये का चढ़ावा प्राप्त हुआ था।