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हिमंत सरकार और कोयला माफिया की मनमानी के कारण असम में बाढ़ मचा रही तबाही!

TCN News Desk TCN News Desk | 1h ago
हिमंत सरकार और कोयला माफिया की मनमानी के कारण असम में बाढ़ मचा रही तबाही!

असम में विपक्ष के पूर्व नेता देबब्रत सैकिया ने राज्य में आई प्रलंयकारी बाढ़ को मानव निर्मित आपदा बताया है।

असम में विपक्ष के पूर्व नेता देबब्रत सैकिया ने राज्य में आई प्रलंयकारी बाढ़ को मानव निर्मित आपदा बताया है। इसके लिए उन्होंने हिमंत बिसवा शर्मा की सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है। सैकिया ने आरोप लगाते कहा कि रेत, पत्थर और कोयला माफिया की मनमानी के कारण विनाशकारी बाढ़ आई है। इसके साक्ष्य में उन्होंने 2010 से 2024 के बीच प्रभावित इलाकों की सैटेलाइट तस्वीरों का हवाला दिया है। हालांकि असम सरकार ने ऊपरी असम के चार जिलों में आई इस अभूतपूर्व बाढ़ के लिए नागालैंड और बाढ़ प्रभावित जिलों में असाधारण रूप से हुई भारी वर्षा को जिम्मेदार ठहराया है।

The Telegraph के अनुसार, सैकिया ने हिमंत सरकार को निशाने पर लेते कहा कि यह बाढ़ बड़े पैमाने पर हो रही अवैध माइनिंग का नतीजा है। गुरुवार को एक्स पर एक पोस्ट में सैकिया ने नजीरा निर्वाचन क्षेत्र में आई भयानक बाढ़ का जिक्र कहते हुए कहा कि यह क्षेत्र सबसे ज़्यादा प्रभावित शिवसागर ज़िले के अंतर्गत आता है। उन्होंने कहा किअगर 2010 और 2024 के बीच इस इलाके की सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना की जाए, तो पता चलता है कि "डिखोव नदी के कभी हरे-भरे किनारे और प्राकृतिक बहाव वाले रास्तों को बेरहमी से खोदा गया है और उन्हें गड्ढों वाली बंजर जमीन में बदल दिया गया है।" बता दें कि डिखोव नदी नागालैंड से बहकर असम में आती है।

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कांग्रेस के पूर्व विधायक (जो तीन बार नजीरा से विधायक रहे) सैकिया ने कहा कि,

"हमारे प्राकृतिक संसाधनों की यह बेतहाशा और अनियंत्रित लूट ही नज़ीरा, शिवसागर, चरईदेव, जोरहाट आदि में मौजूदा तबाही की मुख्य वजह है। मैंने लगातार बीजेपी सरकार को चेतावनी दी है और सालों तक इस आने वाली तबाही के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, लेकिन उन्होंने हमारे नागरिकों के बजाय माफियाओं को बचाना चुना।"

उन्होंने आगे कहा कि "मैंने गुवाहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और डिखोव नदी के किनारों पर बड़े पैमाने पर हो रही अवैध माइनिंग के खिलाफ एक जनहित याचिका भी दायर की। 21 अक्टूबर 2019 को, हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह इस समस्या को रोकने के लिए तीन महीने के भीतर एक 'माइंस एंड मिनरल्स टास्क फोर्स बटालियन' का गठन करे। उन्होंने कहा कि , “अदालत के साफ़ निर्देशों के बावजूद, असम सरकार ने 22 दिसंबर, 2021 को विधानसभा में के माना कि 200 सदस्यों वाली इस टास्क फ़ोर्स का गठन अभी भी सिर्फ ‘प्रक्रिया में’ है। मैंने मार्च 2022 के विधानसभा सत्र में यह मुद्दा फिर से उठाया और जानना चाहा कि हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जंगल और खनिजों के अवैध खनन और उसके व्यापार को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए।”

गौरतलब है कि सैकिया की लगातार शिकायतों के बाद, 12 जनवरी, 2022 को असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (जल संसाधन, नजीरा सब-डिविजन) ने बामुनपुखुरी चाय बागान और संतक के पास अवैध खनन वाली जगहों का निरीक्षण किया और लिखित चेतावनी जारी की कि लगातार खोदाई से नदी का रास्ता बदल सकता है और भारी तबाही हो सकती है।

सैकिया का दावा है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली असम सरकार ने “माफिया को बचाने के लिए इस रिपोर्ट को दबा दिया”।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को टैग करते हुए सैकिया ने कहा कि उन्होंने 15 जून, 2024 को केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री को भी औपचारिक रूप से चेतावनी दी थी कि “लगातार हो रहे अवैध खनन के कारण डिखोव नदी का रास्ता बदलने का खतरा है और इससे भारी तबाही हो सकती है”।


सैकिया ने कहा कि,

“चेतावनियों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया” और नजीरा के लोग “अब इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं, अपने घर, अपनी आजीविका और अपने प्रियजनों को खो रहे हैं , क्योंकि हिमंत सरकार और खनन माफिया के बीच मिलीभगत है”।

सैकिया के अलावा, असम पब्लिक वर्क्स के महासचिव ध्रुबज्योति तालुकदार ने भी गुरुवार शाम एक टीवी शो के दौरान नागालैंड के नागानिमोरा इलाके में कोयला खनन के निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर को दिखाते हुए Google Earth की सैटेलाइट तस्वीरें दिखाईं है। असमिया युवा समाज की शिवसागर यूनिट ने भी नागालैंड के ऊपरी इलाकों में बड़े पैमाने पर खनन और पहाड़ काटने की बात उठाई है, जिसे ऊपरी असम के जिलों में बाढ़ का एक कारण माना जा रहा है।

गुवाहाटी के सीनियर जर्नलिस्ट सुशांत तालुकदार ने कहा कि, "प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बचाव के स्ट्रक्चरल और नॉन-स्ट्रक्चरल उपायों को मजबूत करके जान बचाई जा सकती है, संपत्ति के नुकसान को कम किया जा सकता है और खड़ी फसलों को बचाया जा सकता है। जब बाढ़ और कटाव जैसी आपदाएं इंसानी वजहों से और गंभीर हो जाती हैं, जैसे बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, नदी के तल से रेत और पत्थरों की अंधाधुंध खुदाई, और ऐसी दूसरी गतिविधियां जो नदी के इकोसिस्टम और वॉटरशेड को बर्बाद करती हैं, तो तबाही के पैमाने को कम करने के लिए इन वजहों से निपटना बहुत जरूरी हो जाता है।"

उन्होंने आगे कहा कि,

"अगर असम सरकार ने 2019 में ही माइनिंग माफिया द्वारा डिखो नदी और उसके बेसिन के किनारे कोयले, रेत और पत्थरों की अंधाधुंध खुदाई को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए होते तो नुकसान बहुत कम होता।

बता दें कि आधिकारिक तौर पर, असम का 40 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ की चपेट में रहता है। बाढ़ एक सालाना समस्या है, लेकिन इस बार इसने उन चार ज़िलों में भारी तबाही मचाई है जो आमतौर पर इससे बचे रहते थे। स्थानीय लोगों और प्रशासन के अनुसार, इन ज़िलों ने पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी थी। 19 और 20 जुलाई को सामान्य से ज़्यादा बारिश के 11 दिन बाद भी, सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िलों - चराइदेव और शिवसागर - के कई इलाके अभी भी पानी में डूबे हुए हैं। बाढ़ से निपटने के सरकार के तरीके की आलोचना हो रही है।