किसके कहने पर SIR में फॉर्म -6 बदला गया?
नागरिक का मताधिकार छीन लेना लोकतंत्र में बहुत बड़ा अपराध है।
‘इन्डियन एक्सप्रेस’ अख़बार में 23 सितम्बर के दिन चुनाव आयोग के SIR बारे में छपी खबर में जो एक अहम बात कही गई थी इसे देखते हुए यह लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और मोदी सरकार ही दोषी हैं।
इस रिपोर्ट में यह कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने यह चेतावनी दी थी कि फॉर्म – 6 में जो बदलाव किया गया था वह बदलाव "गैर-कानूनी" है और "अनधिकृत" है, इसे सरकार को भेजा जाना आवश्यक है। इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए ताकि पहली बार मतदान करने वाले युवा प्रताड़ित न हों। आश्चर्य की बात यह है कि दो चुनाव आयुक्तों की इस चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया गया।
इस बदलाव के कारण फॉर्म-6 में SIR से जुड़े प्रश्न शामिल हो गए, जिसे नए मतदाताओं को भरना होता है। इसमें तीन बातें थीं:-
उनका खुद का नाम 2000 के दशक में आयोजित एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में था या नहीं, या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उसमें था या नहीं, या उनका या उन लोगों का नाम इस में था या नहीं। इनके उत्तर देना वाकई में अनिवार्य नहीं था लेकिन इन तीन प्रश्नों के उत्तर दिए बिना कोई मतदाता फॉर्म-6 भरने में आगे नहीं बढ़ सकता था।
अधिकारिक रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि तीन में से दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंघ संधू और विवेक जोशी ने यह कहा था कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किए बिना ऐसी शर्तें फॉर्म-6 में नहीं रखी जा सकती। और ऐसे नियम चुनाव आयोग के परामर्श के बाद ही सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाते हैं।

16 मई, 2026 के दिन एसआईआर ढांचे के तहत फॉर्म-6 को बदलने के प्रस्ताव पर जवाब देते हुए चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं थीं। उन्होंने उल्लेख भी किया था कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा – 21(3) के तहत SIR "एक ही समय का कार्य है और अपवाद के रूप में है.” मतलब यह कि अगर आप ये तीन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पा रहें हैं तो आप का नाम मतदाता सूची में नहीं शामिल होगा।
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंघ संधू ने लिखा था कि फॉर्म-6 में दो चुनाव आयुक्तों के स्पष्ट मंतव्यों के बावजूद भी परिवर्तन किया गया था कि जो अनधिकृत था और गैरकानूनी था। भारत के लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार व्यक्ति का होता है:-
कोई व्यक्ति अपनी आयु, नागरिकता और निवास के आधार पर मत देने की योग्यता प्राप्त करता है, न कि इस आधार पर कि उसके माता-पिता ने पिछले SIR के दौरान अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज किया था या नहीं।

वास्तव में, फॉर्म-6 पर नया सवाल उन नए मतदाताओं के लिए सबसे अधिक मायने रखता है जिनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी अंतिम एसआईआर के बाद तैयार की गई मतदाता सूची में शामिल नहीं थे। ऐसे परिवार का 18 वर्षीय युवा सच्चाई के साथ पहले दो विकल्पों में से किसी को भी नहीं चून सकता था, और फॉर्म में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि यदि वे तीसरा विकल्प चूनते हैं तो आखिर में उन के साथ क्या होगा।
इसका महत्त्व इस लिए भी बढ़ जाता है कि फॉर्म-6 को बदलने के लिए पहले से ही एक स्पष्ट रास्ता मौजूद है। 2021 में संसद ने चुनाव आयोग को मतदाताओं से आधार नंबर एकत्र करने की अनुमति देने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में संशोधन किया था। फॉर्म-6 में वह बदलाव खुद आयोग द्वारा नहीं किया गया था। 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय ने मतदाताओं के पंजीकरण नियमों में तदनुरूपी परिवर्तनों को अधिसूचित किया और फॉर्म-6 को संशोधित भी किया। इसी कानूनी ढांचे के तहत इस वर्ष आयोग के समक्ष प्रस्तावित फॉर्म-6 में बदलाव लाया गया था।

सवाल इस बात का है कि तो फिर ये तीन प्रश्न के उत्तर अनिवार्य बनाये गए क्यों? इसका इरादा स्पष्ट रूप से यह था कि मतदाताओं को मतदाता सूची में से निकाल ही देना था। यही वजह है कि देश में मतदाता सूची में से 13 करोड़ लोग गायब हो गए।
अब चुनाव आयोग ने यह कहा है कि फॉर्म-6 की वजह से जिन के नाम मतदाता सूची में से निकाल दिए गए हैं उन के यहाँ फिर से BLO जायेंगे और फिर से सारी प्रक्रिया होगी। इसका अर्थ यही है कि अख़बार में यह खबर छपी और आन्दोलन हुआ इस लिए चुनाव आयोग ने फिर से फॉर्म-6 के बारे में यह निर्णय लिया। लेकिन बाद में यह सवाल तो उठता ही है कि किसके सूचना से यह सब हुआ था और क्यों हुआ था। इसका उत्तर मुख्य चुनाव आयुक्त के पास ही हो सकता है, और इसके लिए वे दोषी हैं। और यह सूचना देनेवाला सरकार में कौन थे? नागरिक का मताधिकार छीन लेना लोकतंत्र में बहुत बड़ा अपराध है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।
