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विदेश में आरएसएस के 80 प्रतिशत सहयोगी संगठन रजिस्टर्ड तो भारत में क्यों नहीं?

TCN Desk TCN Desk | 15 Jul, 2026 · 5 min read
विदेश में आरएसएस के 80 प्रतिशत सहयोगी संगठन रजिस्टर्ड तो भारत में क्यों नहीं?

अमेरिका में आरएसएस सभी नियमों के पालन करता है जबकि भारत में आरएसएस पंजीकृत नहीं है।

भारत के बाहर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) नेटवर्क के 80% संगठन रजिस्टर्ड हैं । अमेरिका में आरएसएस सभी नियमों के पालन करता है जबकि भारत में आरएसएस पंजीकृत नहीं है। जानकार कहते हैं कि भारत में आरएसएस जानबूझकर रजिस्ट्रेशन से दूर है,जिससे जवाबदेही कम से कम हो। जैसे ऑडिट, डोनर डिटेल्स, FCRA नियम आदि से बच सके। सहयोग संगठनों के ज़रिए सारा काम चल जाता है।

पिछले महीने कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर कहा था कि RSS को खुद को रजिस्टर कराना चाहिए। इसके अगले ही दिन मोहन भागवत ने इस पर सफाई दी। केरलम में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, "दुनिया में बहुत-सी चीज़ें बिना रजिस्ट्रेशन के चल रही हैं। हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है और कई दूसरी चीज़ें भी रजिस्टर्ड नहीं हैं।" लेकिन उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि भागवत की बात पूरी तस्वीर नहीं दिखाती।

'सीइंग द संघ' (Seeing The Sangh) नाम के डेटासेट का विश्लेषण करने पर 'द वायर' (The Wire) ने पाया कि आरएसएस ने भले ही भारत में खुद को रजिस्टर नहीं कराया है, लेकिन विदेशों में उससे जुड़ी ज़्यादातर संस्थाएं बाकायदा रजिस्टर्ड हैं। यानी आरएसएस की सहयोगी संस्थाएं अलग-अलग देशों के कानूनों का पालन करती हैं, जबकि भारत में मुख्य संगठन खुद रजिस्ट्रेशन से बचता है। यह भी साफ नहीं है कि अलग-अलग देशों में आरएसएस का रुख अलग क्यों है।

'सीइंग द संघ' दुनिया भर में आरएस और उससे जुड़ी संस्थाओं का डेटा इकट्ठा करने वाला पहला बड़ा डेटासेट है। यह पेरिस स्थित CERI-Sciences Po के पास है और 'द कारवां' (The Caravan) ने इसे प्रकाशित और होस्ट किया है। इस डेटासेट के मुताबिक,आरएसएसका नेटवर्क भारत के बाहर 38 देशों तक फैला हुआ है। इसमें 2,502 संस्थाएं शामिल हैं, जिन्हें RSS के बड़े वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा माना गया है।


'द वायर' के विश्लेषण में सामने आया कि भारत के बाहर आरएसएस की दो-तिहाई से ज़्यादा सहयोगी संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं और वहां के कानूनों के मुताबिक काम करती हैं। डेटासेट में आरएसएस से जुड़ी कुल 2,502 संस्थाओं में से सिर्फ़ 747 बिना रजिस्ट्रेशन के हैं। यानी 70% से ज़्यादा संस्थाओं ने स्थानीय कानूनों के तहत खुद को रजिस्टर कराया है। अगर भारत में मौजूद आरएस की सहयोगी संस्थाओं को अलग कर दिया जाए, तो विदेशों में यह आंकड़ा 79% से भी ज़्यादा हो जाता है। यानी विदेशों में आरएसएस की हर 10 में से लगभग 8 सहयोगी संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं और स्थानीय नियमों का पालन करती हैं, जबकि भारत में आरएसएस खुद ऐसा नहीं करता।


आरएसएस से जुड़ी ये संस्थाएं अलग-अलग कानूनी ढांचे के तहत रजिस्टर्ड हैं। कुछ निजी कंपनियां हैं, कुछ लॉबिंग या वकालत करने वाले संगठन हैं, जबकि कई गैर-सरकारी (NGO) और गैर-लाभकारी संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं। द वायर' ने आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेडकर से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया लेने के लिए दो ईमेल भेजे, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने RSS को "दुनिया का सबसे बड़ा NGO, जिसका समर्पण का सौ साल पुराना इतिहास है" बताया था।

2010 में आरएसएस की देशभर में करीब 40,000 शाखाएं थीं। अप्रैल 2014 तक यह संख्या बढ़कर 44,000 हो गई, जो 29,000 से अधिक स्थानों पर संचालित हो रही थीं। वहीं इस साल मार्च में RSS ने दावा किया कि अब उसकी 55,000 से ज़्यादा स्थानों पर 88,000 से अधिक शाखाएं चल रही हैं। इतना बड़ा संगठन होने के बावजूद RSS को वैसी निगरानी और जवाबदेही का सामना नहीं करना पड़ता, जैसी दूसरे NGO को करनी पड़ती है। दूसरे संगठनों को अपने खातों का ऑडिट कराना, दानदाताओं का रिकॉर्ड रखना और फंड के इस्तेमाल से जुड़े कई नियमों का पालन करना होता है। आरएसएस पर लंबे समय से नज़र रखने वाले कई विशेषज्ञ मानते हैं कि संगठन का रजिस्ट्रेशन से बचना जवाबदेही से दूर रहने की रणनीति हो सकती है।

पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय, जो 1980 के दशक से हिंदू दक्षिणपंथ की राजनीति पर अध्ययन कर रहे हैं, कहते हैं कि

आरएसएस हमेशा अपने सहयोगी संगठनों के ज़रिए काम करता रहा है, लेकिन खुद सीधे सामने आने से बचता है। उनके मुताबिक, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर लगे प्रतिबंध ने इस सोच को और मज़बूत किया कि संगठन औपचारिक रूप से रजिस्टर्ड न हो। आरएसएस की सोच शायद यही रही होगी कि अगर संगठन कागज़ों पर औपचारिक रूप से दर्ज नहीं होगा, तो भविष्य में किसी कार्रवाई की स्थिति में उसे सीधे ज़िम्मेदार ठहराना मुश्किल होगा।"

आरएसएस से जुड़े कई लोग भी मानते हैं कि संगठन और उसकी सहयोगी संस्थाएं एक मज़बूत नेटवर्क के तौर पर काम करती हैं। आरएसएस के विचारक और लेखक रतन शारदा ने 2025 में संगठन के मुखपत्र 'ऑर्गनाइज़र' में लिखा था कि आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है और यही पूरे "हिंदू परिवार" को एकजुट रखता है। लेकिन भारत में रजिस्ट्रेशन से इनकार करने का आरएसएस का रुख विदेशों में उसकी सहयोगी संस्थाओं के व्यवहार से मेल नहीं खाता।


डेटासेट के मुताबिक, भारत के बाहर आरएसएस की सबसे बड़ी मौजूदगी अमेरिका में है, जहां उससे जुड़े 107 संगठन मिले। इनमें कुछ संगठन सीधे आरएसएस से जुड़े हैं, जैसे विश्व हिंदू परिषद-अमेरिका (VHP of America), जो भारत की वीएचपी की अमेरिकी शाखा के रूप में काम करती है और वहां एक रजिस्टर्ड संस्था है। वहीं कुछ संगठन ऐसे भी हैं, जिन्होंने आरएसएस से जुड़े संगठनों के साथ कार्यक्रम किए या उनसे आर्थिक सहयोग प्राप्त किया। इन 107 संगठनों में से सिर्फ़ 10 बिना रजिस्ट्रेशन के हैं, जबकि बाकी 97 संगठन अमेरिका के अलग-अलग कानूनी प्रावधानों के तहत बाकायदा रजिस्टर्ड हैं।